गौतम चौधरी
ईरान बनाम इजरायल-अमेरिका युद्ध के बहाने हम थोड़ी चर्चा अरब के इतिहास पर कर लेते हैं। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि इस्लाम से पहले अरब में कोई संस्कृति नहीं थी और असभ्य लोगों का निवास था। इस प्रकार की बात इस्लाम या फिर इब्राहिमिक सोच वाले जानकार करते हैं। साथ ही यह प्रचारित करते हैं कि जब अरब में इब्राहिमिक प्रभाव बढ़ा तभी से अरब में सभ्यता का विकास हुआ। लेकिन इतिहास एक बंद कोठरी नहीं होती है। हर सभ्यता का अपना इतिहास है और वहां की संस्कृति अपने हिसाब से बेहतर होती है। अरब का भी इतिहास कुछ ऐसा ही है। वह रोचक तो है ही साथ ही कई रहस्यों के परत को खोलने वाला भी है। तो आज हम उसी विषय पर चर्चा करते हैं।
अरब का इतिहास केवल इस्लाम के उदय से शुरू नहीं होता, बल्कि उससे पहले भी वहाँ एक जटिल धार्मिक और सांस्कृतिक व्यवस्था मौजूद थी। इस्लाम के आने से पहले अरब समाज में बहुदेववाद और मूर्ति पूजा व्यापक रूप से प्रचलित थी। प्रसिद्ध इस्लामी विद्वान Safiur Rahman Mubarakpuri ने अपनी चर्चित पुस्तक Ar-Raheeq Al-Makhtum में इस्लाम-पूर्व अरब की धार्मिक स्थिति का विस्तृत वर्णन किया है। इस पुस्तक के अनुसार, उस समय अरब समाज में सैकड़ों देवी-देवताओं की पूजा की जाती थी, जिनमें से कुछ विशेष रूप से प्रसिद्ध थे।
इस्लाम से पहले Kaaba केवल एकेश्वरवादी उपासना का केंद्र नहीं था, बल्कि वहाँ अनेक मूर्तियाँ स्थापित थीं। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार काबा में लगभग 360 मूर्तियाँ रखी हुई थीं। दार्शनिक और धर्मगुरु ओशो रजनीश ने अपने कई व्याख्यान में इस बात की चर्चा की है कि मक्का के काबा वाले स्थान पर 365 मूर्तियां थी और प्रत्येक दिन एक मूर्ति की पूजा होती थी। विभिन्न अरब क़बीले अपने-अपने देवी-देवताओं की मूर्तियाँ वहाँ रखते थे और उनकी पूजा करते थे। इस्लाम-पूर्व काल में अरबों के धार्मिक विश्वासों में प्रकृति, शक्ति और भाग्य से जुड़े कई देवी-देवता शामिल थे। इनमें तीन प्रमुख देवियों का विशेष महत्व था, जिन्हें सामूहिक रूप से “अरब की तीन देवियाँ” कहा जाता है।
इस्लाम-पूर्व अरब में तीन देवियाँ विशेष रूप से प्रसिद्ध थीं—Al-Lat, Al-Uzza और Manat। अल-लात (Al-Lat) को समृद्धि और उर्वरता की देवी माना जाता था। इसका मुख्य मंदिर Taif में स्थित बताया जाता है। कई अरब क़बीले इसे अत्यंत शक्तिशाली देवी मानते थे। अल-उज़्ज़ा (Al-Uzza) को शक्ति और युद्ध की देवी के रूप में देखा जाता था। इसका प्रमुख पूजास्थल Nakhlah Valley के आसपास बताया जाता है। कुछ क़बीले युद्ध से पहले इसकी पूजा करते थे। मनात (Manat) को भाग्य और नियति की देवी माना जाता था। इसका पूजास्थल Qudayd क्षेत्र के पास बताया जाता है। यात्रियों और तीर्थयात्रियों में इसकी विशेष मान्यता थी।
इन देवियों के अलावा भी अरब में अनेक छोटे-बड़े देवता थे। विभिन्न क़बीले अपने-अपने देवताओं की पूजा करते थे और धार्मिक अनुष्ठान करते थे। यह व्यवस्था कबीलाई पहचान और सामाजिक संरचना से भी जुड़ी हुई थी। मूर्ति पूजा के साथ-साथ कई अन्य धार्मिक प्रथाएँ भी प्रचलित थीं, जैसेक-बलि देना, मन्नत मांगना और देवताओं के नाम पर विशेष अनुष्ठान करना। कई बार इन धार्मिक मान्यताओं का उपयोग सामाजिक और आर्थिक प्रभाव बनाए रखने के लिए भी किया जाता था।
सातवीं शताब्दी में जब Muhammad ने एकेश्वरवाद का संदेश दिया, तो इस्लाम ने इन बहुदेववादी प्रथाओं का विरोध किया। इस्लाम का मूल सिद्धांत यह था कि ईश्वर एक है और उसकी कोई मूर्ति या प्रतिमा नहीं हो सकती। इस्लाम के प्रसार के बाद धीरे-धीरे मूर्ति पूजा की परंपरा समाप्त हो गई और काबा को एकेश्वरवादी उपासना का केंद्र बनाया गया। इस परिवर्तन ने अरब समाज की धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक संरचना को पूरी तरह बदल दिया।
यहां इस बात का उल्लेख करना जरूरी है कि अरबी समाज बेहद धार्मिक था। हिन्दुओं में जिस प्रकार प्रत्येक कुल और वंश के अपने-अपने देवी-देवताएं हैं, उसी प्रकार अरब में भी था। खुद मोहमद साहब की जाति कुरैशों की अपनी कुल देवी थी। उनके समाज में उस देवी की बड़ी मान्यता थी लेकिन जब इब्राहिमिक चिंतन से अरब प्रभावित हो गया और इस्लाम का उदय हुआ तो एकेश्वरवाद के चिंतन को स्थापित करने के लिए खुद मोहम्मद और उनके समर्थकों ने देवी एवं दवताओं की मूर्ति को तोड़ दिया।
इस मामले में इतिहासकार रोचक तथ्यों को प्रस्तुत करते हैं। कहा जाता है कि नखलाह में अल-उज़्ज़ा नामक एक प्रसिद्ध देवी का मंदिर था। देवी Al-Uzza का प्रमुख पूजास्थल Nakhlah Valley में माना जाता था, जो Mecca और Taif के बीच का क्षेत्र था। कई अरब क़बीले इस देवी को अत्यंत शक्तिशाली मानते थे। युद्ध से पहले या महत्वपूर्ण निर्णयों के समय लोग उसकी पूजा करते थे और बलि चढ़ाते थे। ऐतिहासिक इस्लामी स्रोतों में भी इस बात की चर्चा की गयी हे।
सातवीं शताब्दी में जब Muhammad ने एकेश्वरवाद का संदेश दिया, तो इस्लाम ने मूर्ति-पूजा और बहुदेववाद का विरोध किया। इस्लाम का मूल सिद्धांत यह था कि ईश्वर एक है और उसकी कोई प्रतिमा या मूर्ति नहीं हो सकती। 630 ईस्वी में Conquest of Mecca के बाद इस्लाम अरब में तेजी से स्थापित होने लगा। इसी क्रम में कई प्रमुख मूर्तियों और मंदिरों को हटाया गया।
इस्लामी ऐतिहासिक परंपराओं के अनुसार, पैगंबर मुहम्मद ने अपने प्रसिद्ध सेनापति Khalid ibn al-Walid को नखलाह भेजा। वहाँ उन्होंने देवी अल-उज़्ज़ा के मंदिर और उसकी मूर्ति को नष्ट कर दिया। इस संदर्भ में एक कथा भी प्रचलित है। जब सेनापती खालिद बिन वलीद नखलाह पहुंचा तो उसे वहां देवी की दो मूर्ति मिली। बताया जाता है कि उसमें से एक नकली थी। इस्लामिक सेनापती ने उसी मूर्ति को ध्वस्त कर दिया और वापस चला आया। जब वह मुहम्मद के पास पहुंचा तो मुहम्मद ने उसे कहा कि जब तुमने मूर्ति तोड़ी को कुछ विशेष दिखा। इस पर खालिद ने जवाब दिया नहीं। तब मोहम्मद साहब ने कहा कि जिस मूर्ति को तूने तोड़ा वह असली मूर्ति नहीं थी। नाराज खालित फिर नखलाह गया और इस बार उसने देवी की असली मूर्ति ढुंढ ली। सैनिकों के डर से देवी के मंदिर का पुजारी देवी के गले में तलवार बांध कर भाग गया और लोगों को बताया कि देवी अपनी रक्षा खुद कर लेगी। जैसे ही खालित देवी के मंदिर में प्रवेश किया वहां उसका सामना एक नंगी महिला से हुआ, खालिद ने बिना कुछ सोचे महिला का सिर धर से अलग कर दिया। फिर वापस मोहम्मद के पास आया और पूरी घटना के बारे में बताया। तब मोहम्मद ने कहा कि अब देवी की मृत्यु हो चुकी है। अब वहां देवी की कोई मूर्ति पूजा नहीं हागी। वह मंदिर देवी अल उज्जा की ही थी।
कहा जाता है कि इस घटना के बाद नखलाह में अल-उज़्ज़ा की पूजा की परंपरा समाप्त हो गई। यह घटना उस व्यापक धार्मिक परिवर्तन का प्रतीक मानी जाती है, जिसमें इस्लाम के उदय के साथ अरब समाज बहुदेववाद से एकेश्वरवाद की ओर बढ़ा।
नखलाह में अल-उज़्ज़ा के मंदिर का अंत केवल एक धार्मिक स्थल का ध्वंस नहीं था, बल्कि यह उस बड़े सामाजिक-धार्मिक परिवर्तन का हिस्सा था जिसने पूरे अरब क्षेत्र की आस्था, संस्कृति और राजनीतिक व्यवस्था को बदल दिया। इस घटना के बाद धीरे-धीरे अरब में बहुदेववादी पूजा-पद्धतियाँ समाप्त होने लगीं और एकेश्वरवाद इस्लामी समाज का आधार बन गया।

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