#वृतांतों की #यात्रा : #संन्यास बड़ा या #गृहस्थ?
अक्षपाद् गौतम
भारतीय दार्शनिक परंपरा में आदि शंकराचार्य, रामानुजाचार्य और मध्वाचार्य को वेदांत के तीन प्रमुख स्तंभ माना जाता है। इनमें रामानुजाचार्य का विशिष्ट स्थान इसलिए है कि उन्होंने दर्शन को केवल बौद्धिक विमर्श तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे समाज के व्यापक वर्गों तक पहुँचाने का प्रयास किया।
तमिलनाडु के श्रीपेरुम्बुदूर में जन्मे रामानुजाचार्य ने विशिष्टाद्वैत वेदांत का प्रतिपादन किया। उनके अनुसार ब्रह्म एक है, किंतु जीव और जगत उससे पूर्णतः पृथक भी नहीं हैं और पूर्णतः अभिन्न भी नहीं। ईश्वर, जीव और प्रकृति का यह संबंध उनकी दार्शनिक दृष्टि की आधारशिला है। इस दर्शन का व्यावहारिक निष्कर्ष था कि प्रत्येक जीव ईश्वर का अंश है और इसलिए प्रत्येक मनुष्य सम्मान का अधिकारी है।
रामानुजाचार्य की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने भक्ति को जन्म या जाति की सीमाओं से ऊपर रखा। श्रीवैष्णव परंपरा में उपलब्ध अनेक ग्रंथों और जीवन-चरितों में वर्णन मिलता है कि उन्होंने समाज के उन वर्गों को भी वैष्णव भक्ति से जोड़ा, जो लंबे समय तक धार्मिक जीवन के केंद्र से दूर रहे थे। उन्होंने तमिल भक्ति साहित्य श्नालयिर दिव्य प्रबंधम्श् को व्यापक प्रतिष्ठा दिलाई और उसे वेदों के समान आदर देने की परंपरा को सुदृढ़ किया। इससे स्थानीय भाषा में उपलब्ध आध्यात्मिक साहित्य को अभूतपूर्व सम्मान मिला।
रामानुजाचार्य के जीवन की सबसे प्रसिद्ध घटनाओं में तिरुकोष्टियूर में अष्टाक्षरी मंत्र ‘ॐ नमो नारायणाय’ का सार्वजनिक उद्घोष है। परंपरा के अनुसार, जब उन्हें यह मंत्र गोपनीय रखने का निर्देश दिया गया, तब उन्होंने उसे मंदिर के शिखर से सबके लिए घोषित किया। उनका तर्क था कि यदि इस मंत्र से लोगों का कल्याण होता है, तो उसका ज्ञान किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहना चाहिए। यद्यपि इस घटना का स्वरूप मुख्यतः परंपरागत जीवन-चरितों से ज्ञात होता है, फिर भी यह उनकी समावेशी दृष्टि का अत्यंत प्रभावशाली प्रतीक बन चुकी है।
रामानुजाचार्य ने संगठन निर्माण पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने अपने अनुयायियों के मार्गदर्शन के लिए 74 सिंहासनाधिपतियों की नियुक्ति की, जिससे श्रीवैष्णव परंपरा का व्यापक विस्तार हुआ। उनके अनेक शिष्यों में विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आए लोग शामिल थे। इससे यह स्पष्ट होता है कि उनके लिए आध्यात्मिक पात्रता का आधार जन्म नहीं, बल्कि भक्ति और आचरण था।
इतिहासकार यह स्वीकार करते हैं कि रामानुजाचार्य ने अपने समय में सामाजिक समरसता को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। हालांकि यह कहना कि उन्होंने अकेले ही जाति व्यवस्था को समाप्त कर दिया या उसके पूर्ण उन्मूलन का कार्यक्रम चलाया, ऐतिहासिक दृष्टि से अतिशयोक्ति होगी। अधिक संतुलित निष्कर्ष यह है कि उन्होंने धार्मिक जीवन में सहभागिता का दायरा विस्तृत किया और भक्ति को सामाजिक समावेशन का माध्यम बनाया।
उनकी सहस्राब्दी जयंती के अवसर पर हैदराबाद के मुचिन्तल में स्थापित ‘स्टैच्यू ऑफ इक्वैलिटी’ केवल एक विशाल प्रतिमा नहीं है, बल्कि उनके उस संदेश का प्रतीक है जिसमें ईश्वर की कृपा सभी के लिए समान मानी गई है। यह स्मारक आधुनिक भारत को यह याद दिलाता है कि आध्यात्मिक परंपराएँ तभी जीवंत रहती हैं जब वे समाज के प्रत्येक वर्ग के लिए खुली हों।
आज जब जाति, पहचान और सामाजिक न्याय पर नए सिरे से बहस हो रही है, तब रामानुजाचार्य का जीवन हमें एक महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। स्थायी परिवर्तन केवल वैचारिक घोषणाओं से नहीं आता, बल्कि धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक व्यवहार में समावेशिता लाने से आता है। यही कारण है कि एक सहस्राब्दी बाद भी रामानुजाचार्य केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि भारतीय समाज में समरसता और आध्यात्मिक समानता के प्रेरक के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
इस आलेख में मैंने उन दावों से परहेज़ किया है जिन पर इतिहासकारों में गंभीर मतभेद हैं, जबकि उन तथ्यों को स्थान दिया है जिनका आधार श्रीवैष्णव परंपरा, जीवन-चरितों और आधुनिक इतिहासलेखन में अपेक्षाकृत अधिक स्वीकार्य है। यह रूप समाचार-पत्र, पत्रिका या आपके जनलेख जैसे मंच पर प्रकाशित करने के लिए अधिक उपयुक्त रहेगा।
