तो क्या इस युद्ध को अमेरिकी साम्राज्यवाद के पतन की पटकथा मान लेनी चाहिए?

तो क्या इस युद्ध को अमेरिकी साम्राज्यवाद के पतन की पटकथा मान लेनी चाहिए?

द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका ने मध्य पूर्व की राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और ऊर्जा भू-राजनीति में केंद्रीय भूमिका निभाई है। तेल संसाधनों की सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और अपने प्रमुख सहयोगियों की रक्षा जैसे कारणों से अमेरिका लंबे समय तक इस क्षेत्र का सबसे प्रभावशाली बाहरी खिलाड़ी बना रहा। लेकिन 21वीं सदी के तीसरे दशक में यह प्रश्न अधिक गंभीरता से उठने लगा है कि क्या मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभुत्व का युग समाप्त हो रहा है, या केवल उसका स्वरूप बदल रहा है।

ऊपर जो प्रश्न उठाए गए हैं, उसका उत्तर सामान्य तरीके से देना कठिन है। जितनी जटिलता मध्य पूरव में दिखती है उतना ही जटिल इसका उत्तर भी है। मसलन, मध्य पूर्व में अमेरिकी प्रभाव का निर्माण कई दशकों की रणनीतिक नीतियों का परिणाम है। अमेरिका ने क्षेत्र के कई देशों के साथ सुरक्षा समझौते किए और सैन्य ठिकाने स्थापित किए। विशेष रूप से इज़राइल के साथ उसकी घनिष्ठ रणनीतिक साझेदारी ने क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित किया। इसके अलावा सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और अन्य खाड़ी देशों के साथ ऊर्जा और रक्षा सहयोग ने भी अमेरिका की स्थिति को मजबूत बनाया। लंबे समय तक तेल आपूर्ति की सुरक्षा और समुद्री मार्गों की रक्षा अमेरिकी नीति के प्रमुख उद्देश्य रहे।

हाल के वर्षों में वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है। अन्य बड़ी शक्तियाँ भी मध्य पूर्व में सक्रिय हो गई हैं। विशेष रूप से चीन और रूस ने इस क्षेत्र में अपने आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधों को मजबूत किया है। इसके साथ ही शीत युद्ध के समय सोवियत रूस के खिलाफ संयुक्त राज्य अमेरिका के नेतृत्व में आया सैन्य संगठन नाटो के सदस्य देशों में भी अविश्वास पैदा हुआ है। यह अविश्वास अमेरिकी नेतृत्व के द्वारा एक पक्षीय निर्णय और दादागीरी से उत्पन्न हुआ है। हाल के वर्षों में अमेरिकी नेतृत्व ने उग्र राष्ट्रवाद का परिचय देते हुए कई ऐसे निर्णय लिए जिसके कारण उसके पश्चिमी सहयोगियों में भारी असंतोष उत्पन्न हुआ है। यहां तक कि अमेरिकी नेतृत्व अब सहयोगियों के राष्ट्रीय हितों के खिलाफ भी निर्णय लेने लगा है।  

इधार मध्य पूरव के देशों में अमेरिकी दादागीरी को लेकर गोलबंदी प्रारंभ हो गयी थी। मध्य पूरव के देश अब अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपनी-अपनी सीमा से बाहर करना चाहते हैं। यहां तक कि इजरायल को भी अब्राहिमिक गोलबंदी में अमेरिकी हस्तक्षेप एक रोड़ा ही लगता है। दूसरी ओर चीन ऊर्जा आयात और बुनियादी ढाँचे में निवेश के माध्यम से क्षेत्रीय देशों के साथ गहरे आर्थिक संबंध स्थापित कर रहा है। यही नहीं रूस ने सुरक्षा सहयोग और सामरिक साझेदारी के माध्यम से मध्य पूरव में अपनी उपस्थिति बढ़ाने का प्रयास किया है। इन परिवर्तनों ने मध्य पूर्व को धीरे-धीरे एक बहुध्रुवीय प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र बना दिया है।

मध्य पूर्व के कई देश अब केवल एक महाशक्ति पर निर्भर रहने के बजाय संतुलित और व्यावहारिक विदेश नीति अपनाने लगे हैं। वे अमेरिका के साथ पारंपरिक सुरक्षा सहयोग बनाए रखते हुए चीन और रूस के साथ भी आर्थिक और तकनीकी संबंध विकसित कर रहे हैं। साथ ही अमेरिकी सैन्य ठिकानों को अपने-अपने देश से हटाना चाहते हैं। यह रणनीति उन्हें वैश्विक शक्ति प्रतिस्पर्धा के बीच अधिक स्वतंत्रता और विकल्प प्रदान करती है। परिणामस्वरूप, क्षेत्रीय देश अब पहले की तुलना में अधिक आत्मविश्वास के साथ अपनी विदेश नीति तय कर रहे हैं।

वैसे एकदम से ऐसा कहना कि मध्य पूरव में अमेरिकी प्रभाव कम हो जाएगा फिलहाल जल्दबाजी होगी लेकिन उसके संकेत मिलने लगे हैं। मध्य पूर्व की वर्तमान स्थिति को समझने के लिए यह मानना अधिक उचित होगा कि यहाँ अमेरिकी प्रभाव समाप्त नहीं हो रहा, बल्कि उसका पुनर्संतुलन हो रहा है। अमेरिका अभी भी क्षेत्र की प्रमुख सैन्य और कूटनीतिक शक्तियों में से एक है, लेकिन अब उसे अन्य वैश्विक शक्तियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना पड़ेगा। ईरान युद्ध अमेरिकी प्रभाव को कम करेगा या बढ़ाएगा इसका अंदाजा फिलहाल लगाना कठिन है लेकिन जो संकेत मिल रहे हैं वह अमेरिकी कूटनीति के लिए जटिल जरूर है। अमेरिका-इजरायल बनाम ईरान युद्ध में सबसे चौकाने वाला परिणाम यह है कि जहां एक ओर अमेरिका का घुर सहयोगी, युनाइटेड किंगडम, फ्रांस और स्पेन ने अमेरिकी आक्रमण का विरोध किया है वहीं दूसरी ओर मध्य पूरव के वे तमाम देश, जिसपर ईरान ने मिसाइल दागे उन्होंने वापस ईरान पर हमला नहीं किया बल्कि कुबैत ने तो कुछ अमेरिकी विमान को मार गिराया है। इसे अमेरिकी कूटनीति की हार ही कही जानी चाहिए।

मध्य पूर्व की भू-राजनीति आज पहले से अधिक जटिल और बहुध्रुवीय हो चुकी है। अमेरिकी प्रभुत्व पूरी तरह समाप्त होता हुआ नहीं दिखता, लेकिन यह स्पष्ट है कि क्षेत्रीय देशों के पास अब पहले से अधिक विकल्प हैं और वे अधिक संतुलित कूटनीति अपनाने लगे हैं। भविष्य में मध्य पूर्व की स्थिरता इस बात पर निर्भर करेगी कि वैश्विक और क्षेत्रीय शक्तियाँ प्रतिस्पर्धा के साथ-साथ सहयोग के रास्ते को कितना मजबूत कर पाती हैं। यदि संतुलित कूटनीति और संवाद को प्राथमिकता दी जाती है, तो यह क्षेत्र संघर्ष के बजाय सहयोग का नया मॉडल भी बन सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »