गौतम चौधरी
भारत केवल एक राजनीतिक इकाई नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति, जातीय स्मृतियों और क्षेत्रीय अस्मिताओं का विराट संगम है। यही कारण है कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने देश को न तो पूर्णतः एकात्मक राज्य बनाया और न ही ढीले-ढाले संघ का रूप दिया। उन्होंने एक ऐसे संघीय ढाँचे की रचना की जिसमें राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय विविधता, दोनों का संतुलन बना रहे। किंतु स्वतंत्रता के बाद से समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि क्या भारत को अधिक केंद्रीकृत “यूनिट्री सिस्टम” की ओर बढ़ना चाहिए? इस बहस के केंद्र में प्रायः माधव राव सदाशिव गोलवलकर का नाम भी आता है।
पहले गोलवलकर के बारे में बता दें। माधव राव सदाशिव राव गोलवलकर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जिसे आज का सत्तारूढ़ दल भारतीय जनता पार्टी का वैचारिक अधिष्ठान माना जाता है, के दूसरे सरसंघचालक यानी प्रमुख थे। उन्हें डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार की मृत्यु के बाद वर्ष 1940 में सरसंघचालक के पद पर नियुक्त किया गया था। गोलवलकर का चिंतन मूलतः सांस्कृतिक राष्ट्रवाद पर आधारित है। उनके लिए भारत अनेक राष्ट्रीयताओं का समूह नहीं, बल्कि एक सनातन एकात्मक सांस्कृतिक राष्ट्र रहा है। इसी कारण वे भाषायी और प्रांतीय पहचान की राजनीति को राष्ट्रीय एकता के लिए संभावित चुनौती मानते थे। उनके विचारों में “एक देश, एक संस्कृति, एक राष्ट्र” की अवधारणा बार-बार उभरती है। आलोचकों ने इसे एकात्मक राज्य व्यवस्था की वैचारिक पृष्ठभूमि के रूप में देखा, जहाँ केंद्र सर्वाेपरि हो और राज्यों की स्वायत्तता सीमित, या ऐसा कहें नहीं के बराबर हो।
दरअसल, भारतीय संघवाद का जन्म किसी अकादमिक प्रयोग से नहीं, बल्कि ऐतिहासिक विवशताओं और सामाजिक वास्तविकताओं से हुआ है। विभाजन की त्रासदी, रियासतों का एकीकरण और भाषायी विविधता, इन सबने संविधान सभा को यह समझा दिया था कि भारत को केवल शक्ति के केंद्रीकरण से नहीं, बल्कि सहमति और साझेदारी से जोड़ा जा सकता है। इसलिए बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेड्कर ने एक मजबूत केंद्र की व्यवस्था तो बनाई, किंतु राज्यों को भी संवैधानिक अधिकार प्रदान किए। यही भारतीय संघवाद की आत्मा है।
लेकिन राष्ट्रवाद की एक धारा हमेशा यह मानती रही कि अत्यधिक संघवाद अंततः विखंडन और विघटन को जन्म देता है। दक्षिण भारत में द्रविड़ आंदोलन, पंजाब में खालिस्तानी अलगाववाद, पूर्वाेत्तर की असंतुष्टियाँ और कश्मीर का प्रश्न, इन सबको अक्सर केंद्रीकरण के पक्ष में तर्क के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह कहा गया कि यदि राष्ट्रीय पहचान सर्वाेच्च नहीं होगी तो क्षेत्रीय राजनीति राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को कमजोर कर देगी।
फिर भी इतिहास ने एक दूसरी सच्चाई भी सामने रखी। भारत को सबसे अधिक स्थिरता तब मिली जब राज्यों की आकांक्षाओं को लोकतांत्रिक स्थान दिया गया। भाषायी राज्यों के गठन का कभी विरोध हुआ था, किंतु वही व्यवस्था आगे चलकर राष्ट्रीय एकता की आधारशिला बनी। क्षेत्रीय दलों का उदय भी अंततः भारतीय लोकतंत्र के भीतर ही समाहित हो गया। इससे स्पष्ट हुआ कि विविधता को दबाने से अधिक प्रभावी उपाय उसे सम्मान देना है।
यहीं गोलवलकर की अवधारणा और भारतीय संवैधानिक यथार्थ के बीच मूल अंतरविरोध दिखाई देता है। सांस्कृतिक एकात्मता की इच्छा स्वाभाविक हो सकती है, किंतु भारत जैसे बहुलतावादी समाज में यदि वह राजनीतिक केंद्रीकरण का रूप लेने लगे तो लोकतंत्र की संघीय आत्मा पर दबाव बढ़ेगा और यह भारत की राष्ट्रीय एकता व अखंडता को भी नुकसान पहुंचा सकता है। राष्ट्र केवल एकरूपता से नहीं बनते, वे साझा सहमति, न्याय और सम्मान से भी निर्मित होते हैं।
विडंबना यह भी है कि जिन शक्तियों ने कभी अत्यधिक संघवाद पर संदेह व्यक्त किया था, वही आज भारतीय संघीय लोकतंत्र के सबसे बड़े राजनीतिक हितधारकों में शामिल हैं। गठबंधन राजनीति, वित्तीय विकेंद्रीकरण और राज्यों की बढ़ती भूमिका ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिक भारत को केवल आदेश से नहीं, संवाद से चलाया जा सकता है।
आज जब “एक राष्ट्र” की अवधारणा फिर से राजनीतिक विमर्श के केंद्र में है, तब यह स्मरण आवश्यक है कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। एक मजबूत राष्ट्र का अर्थ अनिवार्यतः एकरूप राष्ट्र नहीं होता। यदि संघवाद कमजोर पड़ता है तो केवल राज्य ही नहीं, लोकतंत्र भी कमजोर होगा। भारत की स्थिरता का भविष्य शायद इसी संतुलन में छिपा है, जहाँ राष्ट्रीय एकता और क्षेत्रीय स्वायत्तता परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे की पूरक बन सकें। यदि इसके अलग कुछ करने की कोशिश की गयी तो भारत के भविष्य के लिए बेहतर नहीं होगा।
