भारत के मुसलमानों को अपना दीन और वतन दोनों प्यारा है

भारत के मुसलमानों को अपना दीन और वतन दोनों प्यारा है

गौतम चौधरी 

अभी हाल ही में बिहार के बांका जिले में एक मदरसे में भयानक विस्फोट हुआ और देखते ही देखते पूरा मदरसा धराशायी हो गया। दूसरी घटना उत्तर प्रदेश की है। बाराबंकी जिले में एक मस्जिद को स्थानीय प्रशासन के आदेश पर तोड़ दिया गया। इन दोनों संवेदनशील घटनाओं पर जो मुसलमानों की प्रतिक्रिया आयी है वह बेहद महत्वपूर्ण है। दोनों स्थानों पर हुई घटना के बाद सियासतदां अपनी रोटी सेकने की पूरी कोशिश की लेकिन मुसलमानों की ओर से शालीन एवं भारतीय संविधान के अनुकूल प्रतिक्रिया अयी। इससे यह साबित हो गया है कि भारत में बसने वाले मुसलमान अपनी हकों के साथ अपनी जिम्मेदारियों को बखूबी समझते हैं और समय आने पर उसका पालन भी करते हैं। 

कुरान-ए-पाक में कहा गया है, ‘‘ऐ ईमान वालो, नमाज और सब्र के जरिए अल्लाह से मदद मांगो, बेशक अल्लाह सब्र करने वालों के साथ है।‘‘ (कुरान 2ः153) पवित्र कुरान की यह आयत ईमान वालों को निर्देशित करता है कि अगर आप धैर्य के साथ अपने ईमान पर कायम हैं तो निश्चित रूप से परम पिता परमात्मा आपकी सहायता करेगा और अंतिम विजय आपकी ही होगी। इसी सिद्धांत पर भारत के मुसलमानों ने इन दोनों घटनाओं पर धैर्य का परिचय दिया। 

बांका जिले के मोदरसे में विस्फोट के बाद बिहार की सत्तारूढ़ गठबंधन सरकार के एक बड़बोल विधायक ने बेहद नकारात्मक प्रतिक्रिया दी थी लेकिन उस प्रतिक्रिया पर मुसलमानों के किसी जिम्मेदार धार्मिक या राजनीतिक नेताओं ने तबज्जो नहीं दी। मीडिया में एक-दो दिनों तक बात रही फिर वह खत्म हो गयी। ऐसे संवेदनशील मामलों में राजनीतिक नेताओं की बयानबाजी से जाने-अनजाने असामाजिक तत्वों एवं देश के दुश्मनों को लाभ मिल जाता है। इसलिए ऐसे मामलों में बयानबाजी से नेताओं को बचना चाहिए और मामले को जांच एजेंसी पर छोड़ देनी चाहिए। बयानबादी के कारण जांच की प्रक्रिया में भी खलल पड़ता है। मुसलमानों ने तो इसपर पूरा ध्यान रखा लेकिन अन्य पक्ष के नेताओं ने अनड़गल बयानबाजी कर नाहक माहौल को खड़ाब करने का काम किया। 

उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में सरकारी जमीन पर एक मस्जिद बना दी गयी थी। प्रशासन ने मस्जिद को तोड़ने का आदेश दिया। अमूमन यह सोच लिया जाता है कि जब किसी धार्मिक स्थल को तोड़ा जाएगा तो उसके अनुयाई उसका विरोध करेंगे लेकिन यहां इसका ठीक उलटा हुआ। जब उत्तर प्रदेश पुलिस मस्जिद को तोड़ने पहुंची तो स्थानीय मुसलमानों ने उनका साथ दिया। 

दरअसल, शांति और भाईचारे का संदेश इस्लामी भावना का अंग है, जिसे सभी मुसलमानों को पालन करना चाहिए। पैगंबर मोहम्मद के इस रुख को सही ठहराने के लिए इतिहास में बहुत सारे उदाहरण है जो शांति पर हिंसा को कभी प्राथमिकता नहीं देता। पैगंबर मुहम्मद जानते थे कि शांति समाज में खुशी और एकता लाती है। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी में मस्जिद विध्वंस के दौरान यूपी पुलिस के साथ सहयोग करते हुए भारतीय मुसलमानों ने इस पहलू का अक्षरसह पालन किया है। पैगंबर-ए-इस्लाम सदा इस बात पर जोर देते थे कि विकास के लिए विभिन्न समुदायों के बीच शांति व भाईचारा जरूरी है। शांति अपनाना और प्यार फैलाना पैगंबर द्वारा कठिन परिस्थितियों से निपटने के लिए दिखाया गया सच्चा मार्ग है। 

बाराबंकी के मुसलमानों ने बिना सोचे समझे प्रतिक्रिया देने के बजाय, न केवल पुलिस को अपना काम करने दिया अपितु उसका सहयोग भी किया। यहां यह भी बता दें कि बाराबंकी के मस्जिद तोड़े जाने से हर मुसलमान खुश ही नहीं था। कुछ ऐसे भी थे जो नाराज थे लेकिन उन्होंने बिना कोई हल्ला मचाए अदालत का दरवाजा खटखटाया लेकिन स्थानीय स्तर पर हिंसा का सहारा नहीं लिया। भारतीय मुसलमानों ने दिखाया कि हिंसा, मृत्यु, प्रिय की हानि और निर्दोष मनुष्यों की हत्या अधार्मिक है और इस्लामी शिक्षाओं के विरुद्ध है।

‘‘ईश्वर रिफ्क (कोमलता) को अनुदान देता है जो वह आंफ (हिंसा) को नहीं देता है।’’(अबू दाऊद 4/255) बाराबंकी मस्जिद के मुद्दे की जानकारी रखने वाले जानते थे कि मस्जिद का निर्माण अवैध भूमि पर किया गया है और इस प्रकार की मस्जिदों में नमाज अदा करना इस्लाम में जायज नहीं है। इस्लाम में अवैध जमीन पर मस्जिद का निर्माण गैर धार्मिक माना गया है। नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद जब प्रशासन मस्जिद को गिराने गयी, तो किसी भी व्यक्ति ने विरोध नहीं किया और घर के अंदर रहे। कुछ मुसलमानों ने पुलिस की कार्रवाई में उन्हें नैतिक रूप से सहयोग भी किया। हालांकि, राजनीतिक मकसद वाले संगठनों ने मुसलमानों के इस मुद्दे को उत्पीड़न का मुद्दा बनाकर उजागर करने की कोशिश की। जिसे कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को बदनाम करने की पूरी कोशिश की। ऐसी विषम  परिस्थितियों में, भारतीय मुसलमानों ने अनुकरणीय राष्ट्रीय चरित्र का परिचय दिया है। जब बात सामने आयी तो मीडिया में चल रहे दुष्प्रचार का भी पर्दाफाश हो गया।

मोहम्मद-ए-इस्लाम ने हमेशा प्यार, शांति, ईमानदार व्यवहार, भाईचारे, धैर्य की वकालत की और दुनिया में शांति और सद्भाव बनाए रखने के लिए एक सार्वभौमिक अपील की है। बांका और बाराबंकी के दोनों ही मामलों में न्याय पाने के लिए न्यायिक प्रणाली में विश्वास दिखाने वाले, पुलिस व जांच एजेंसियों का समर्थन करने वाले और तनावपूर्ण परिस्थितियों में भी शांत बनाए रखने वाले वाले सभी भारतीय मुसलमानों द्वारा इसका अक्षरसह पालन किया जाना, चमत्कार से कम नहीं है। यदि ऐसा कहा जाए कि यह केवल भारत में ही संभव है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। इसलिए जब दुनिया के सिरफिरे मुसलमान आईएसआईएस के नेतृत्व में इस्लामिक जिहाद के नाम पर सीरिया, इराक आदि देशों में बेगुनाहों का कत्ल कर रहे थे तो भारत के मुसलमान शांति का संदेश दे रहे थे। उस दौर में पश्चिम से लेकर मध्य-पूर्व तक अधिकतर मुसलमानों ने अल-बगदादी का समर्थन किया लेकिन भारत के मुसलमान स्थिर रहे क्योंकि उन्हें अपना दीन और अपना वतन दोनों प्यारा है। 

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