रतनपुर वाली नानी की पंडुब्बा यानी जल छाया की कहानी

रतनपुर वाली नानी की पंडुब्बा यानी जल छाया की कहानी

हम उस पीढ़ी के हैं, जिसमें बचपन के दिनों में हमलोगों ने अनगिनत भूत-प्रेत की कहानियाँ सुनीं होगी। कभी दादी से तो कभी नानी से, या फिर किसी अन्य बुजुर्ग से। मैं तो इस प्रकार की कथाओं में पूरा तल्लीन हो जाता था। दरअसल, मैं जिस गांव का रहने वाला हूं, उस गांव के ठीक पास से बागमती नदी आज भी बहती है। मानों बागमती मेरे पूरे गांव को ही अपने आगोश में समेटे हो। वैसे मेरा घर गांव के मध्य में था लेकिन दक्षिण दिशा पूरा खाली था। नदी तक कोई बसाहट नहीं थी। उन दिनों नदी के किनारे गांव के लोगों को जलाया जाता था। आज भी हमारे गांव के मरने वालों की लाश बागमती के किनारे ही जलती है लेकिन उन दिनों नदी के ठीक किनारे कुछ खाली जीमन छोड़ी हुई थी। उसी में पूरे गांव की लाश जलाई जाती थी। अब तो गांव में बिजली भी है और सड़क भी। उन दिनों गांव में ये दोनों आधुनिक सुविधाएं नहीं थी। हम सभी भाई-बहनों की संख्या कुल 9 थी। गर्मी के दिनों में रात ढ़लने के साथ ही हम सभी भाई-बहने अपनी-अपनी चारपाई बिछाकर उसपर लेट जाते थे। फिर बीच में दादी की चारपाई भी लग जाती थी और कहानी प्रारंभ हो जाती थी। ‘‘श्याम करन घोड़ा लंगी तलवार, हजमा रे घींच, दसैंई की डाईन”, आदि-आदि कई कहानियां बार-बार सुनने के बाद भी मन नहीं भरता था। अब तो कई कहानियां याद भी नहीं है लेकिन उसके कुछ अंश आज भी स्मृतियों का हिस्सा है।

मेरे यहां, खास कर किस्सा सुनाने के लिए एक वृद्ध आया करते थे, उनका नाम गोनर गीरी था। गजब के किस्सगो थे। मानों उनकी आवाज में जादू हो। जब किस्सा कहने लगते थे तो, इतने तल्लीन हो जाते कि उन्हें रात का ज्ञान ही नहीं रहता था। जब रात ज्यादा हो जाती थी, तो हमारे बाबा कहते थे, “गोनर अब डंटी-तराजू बीच में पहुंच गया है, बच्चे सो गए होंगे।’’ बावजूद इसके मैं जगा रहता था। गोनर गिरी, जतबरिया के रहने वाले थे। किसी जमाने में मेरे यहां खेती-बारी का काम संभालते थे, साथ ही हमारे गांव के महादेव मंदिर के पुजारी भी थे। वैसे थे तो वे तीन भाई लेकिन गोनर और मिश्री गिरी मंदिर पर बारी-बारी से पूजा करने आते थे। दोनों भाइयों का छः-छः महीने का समय होता था। दोनों भाईयों ने बांट रखा था। बाद में तीसरे भाई, विष्णुनी गिरी का भी प्रवेश हुआ और वही भाई महादेव मंदिर का स्थाई पुजारी हो गया। विष्णुनी गिरी खुद तो नहीं रहे, अब उनका बेटा दीपक गिरी, हमारे मंदिर पर पूजा करता है। अब तो दीपक के भी बच्चे बड़े हो गए होंगे।

मैं इतनी बात बताने की मनःस्थिति में नहीं था लेकिन प्रशंग प्रारंभ हुआ तो सोचा अपने गांव के बारे में भी थोड़ी जानकारी साझा कर दूं। जारे के दिनों में हमारे दरवाजे पर बड़ा-सा घूरा यानी अलाव जलाया जाता था। वहां पूरे टोले के लोग आते थे और अपने-अपने तरीके से कहानियां सुनाते थे। बात उन्हीं दिनों की है। भूत, प्रेत, चुड़ैल, सिरकट्टा, पंडुब्बा, डायन आदि की कई कहानियां ऐसे मौकों पर सुनी-सुनायी जाती थी। मेरी दृष्टि में यह लोक जीवन का एक ऐसा भाग था, जिसमें रोमांच, साहस, कल्पना का अद्भुत समिश्रण हुआ करता था। उन्हीं दिनों पंडुब्बा यानी जल छाया की कथा मैंने कई बार सुनी। जो मेरी स्मृति में है, मैंने सोचा अपने पाठकों से साझा कर दूं। आज उसकी साहित्यिक व्याख्या आपलोगों के सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। आपको अच्छा लगेगा। इसे केवल आनंद और रोमांच के लिए पढ़ें। इसकी सत्यता तो मैंने भी कभी परखने की कोशिश नहीं की।

पंडुब्बा, यानी “पानी का भूत।” यह पात्र लोककथाओं में गहराई से रचा-बसा है। गांव-देहात में पूछ लीजिए, लगभग हर किसी ने इसका नाम सुना होगा। यह अंधविश्वास पीढ़ी-दर-पीढ़ी केवल मौखिक परंपरा के सहारे आज तक जीवित है। संभव है कि यह किसी कल्पनाशील मस्तिष्क की उपज हो, पर इसकी कथा सुनते ही आज भी आप को रोमांचित कर देगा। भूत-प्रेत की कहानियां हमारे ननिहाल में ज्यादा कही-सुनी जाती थी। मेरा ननिहाल दरभंगा जिले के कमतौल में है। गांव तो बड़ा है लेकिन मेरी रतनपुर वाली नानी इस प्रकार की कहानी की माहिर थी। भाव-भंगिमा बनाकर वही सुनाती थी थी। हम बच्चे जब भी उनसे भूत की कहानी सुनाने की ज़िद करते, तो वे अपनी भाव-भंगिमा में प्रारंभ हो जाती थी। फिर अपनी “सच्ची भूत कथाओं” की सूची में से कभी सिरकट्टा तो कभी पनडुब्बा की कहानी सुनाती थी। रतनपुर वाली नानी के पास तो भुतहा कहानियों का व्यापक संग्रह था लेकिन मुझे पनडुब्बा की कहानी ही ज्यादा रोचक लगती थी।

नानी शुरुआत करती –
“पांडुब्बा पानी में रहता है!” फिर वे एक ग्रामीण किसान की कल्पनात्मक छवि खींचतीं, जो नदी में डूबकर असमय मृत्यु का शिकार हो गया हो। उसमें कमतौल का ही कोई किसान या फिर भूमिहीन मजदूर हुआ करता था। कभी-कभी कोई छोटा व्यापारी, या फिर मल्लाह भी होता था। कहा जाता है कि वह रात में टंकी मइन यानी तालाब के किनारे बैठा अपने घर को निहारता रहता है। रात के समय या फिर दिन के दोपहर में यदि कोई साहस कर पानी के पास चला जाए, तो वह रहस्यमय ढंग से उसके सामने प्रकट होता है और पूछता है –
“तुम्हारे पास तंबाकू है? थोड़ा तंबाकू दोगे?” कभी-कभी वह बीडी, या अन्य वस्तुओं की भी मांग करता और वह बार-बार यही पूछता रहता। जैसे ही कोई उसे तंबाकू देने को तैयार होता, वह उसका हाथ पकड़कर उथले पानी से गहरे पानी की ओर खींच ले जाता। नानी हमें समझातीं-यदि कभी कोई अजनबी इस तरह कुछ माँगते दिखे, तो उसे अनदेखा कर देना। तभी जान बच सकती है।

नानी अपनी कहानी को और विश्वसनीय बनाने के लिए एक व्यक्तिगत अनुभव भी सुनाती थीं। वे बतातीं कि एक बार, एक रात जब वह गाँव के बरतर वाले गढ़े के पास पहुंची तो किसी ने उसे टोका और कहा थोड़ा चूना देना तो। नानी ने उस आवाज के प्रतिउत्तर में कोई जवाब नहीं दिया, नहीं तो वह उस दिन बच नहीं पाती। हमारी नानी की ओर इशारा करते हुए बोली बरहसेर वाली दीदी तो उस दिन हमें बचा ली, नहीं तो वह सीधे सुरधाम चली जाती। उस रात दोनों बरतर से भागते हुए अपने घर आयी थी। यहां बता दें, उन दिनों ज्यादातर गांव की महिलाएं नित्य क्रिया के लिए रात को बाहर ही जाया करती थी। रतनपुर वाली नानी जब अपनी कहानी में पांडुब्बा की नकल करते हुए तंबाकू माँगतीं, तो उनकी आँखों में एक अजीब-सी चमक उभर थी, जो डरावनी तो थी ही, रोमांचक भी लगती थी। ऐसा लगता मानो सचमुच जल-भूत सामने खड़ा हो। वे अपनी कल्पना में प्राण फूँक देती थीं।

रतनपुर वाली नानी की वह भाव आज भी मन से मिटता नहीं-जैसे वे सचमुच पांडुब्बा बनकर मेरे सामने प्रगट हुई हो और तंबाकू मांग रही हो। कभी मेरा तो कभी मेरी बहन का हाथ पकड़कर नानी दिखातीं कि पंडुब्बा कैसे हाथ खींचती है। उनकी शैली इतनी यथार्थपूर्ण होती कि लगता, हम कहानी सुन नहीं, उसे जी रहे हैं।

कुछ लोग इस कथा में और भी डरावना तत्व जोड़ देते हैं। कहते हैं कि पांडुब्बा इंसान को नदी की गहराई में ले जाकर उसकी आँखों, नाक और कानों में रेत भर देता है। मुँह में भी रेत भर देता है, ताकि वह कभी ऊपर न आ सके। कल्पना कीजिए-कितना भयावह दृश्य प्रस्तुत होता होगा। आज वे सारी कहानियाँ केवल स्मृतियाँ बनकर रह गई हैं। मेरी रतनपुर वाली नानी अब इस दुनिया में नहीं हैं। उसके गए कई वर्ष बीत गए लेकिन नानी का चेहरा अभी भी मेरी स्मृतियों में कैद है। रतनपुर वाली नानी के ठीक बगल में मेरी अपनी नानी भी बैठी रहती थी। बस चुप लेकिन उसके चेहरे में इतना भाव था की कथा मानों उसके उपर से गुजर रहा हो।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »