त्रिपुरा हिंसा : अफवाहों से बचे, न हों फर्जी खबरों के शिकार

त्रिपुरा हिंसा : अफवाहों से बचे, न हों फर्जी खबरों के शिकार

हसन जमालपुरी

त्रिपुर हिंसा के पीछे का कारण बांग्लादेश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हुए हिंसा की प्रतिक्रिया बतायी जा रही है लेकिन इसमें सबसे बड़ी भूमिका नकारात्मक सोशल मीडिया की है। अभी हाल ही में त्रिपुरा पुलिस ने एक बयान सार्वजनिक कर इस बात की पुष्टि की है। पुलिस ने दावा किया है कि ऐसे 102 सोशल मीडिया अकाउंट्स पाए गए हैं, जो कथित तौर पर फर्जी खबरें फैलाकर धार्मिक समूहों के बीच दुश्मनी बढ़ा रहे हैं।

त्रिपुरा पुलिस ने फेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब अधिकारियों को इन खातों के बारे में जानकारी देने का भी आदेश दिया है, जहां से त्रिपुरा में हिंसा की घटनाओं के संबंध में विभिन्न नकली और भड़काऊ पोस्टिंग की गई थी। पिछले कई दिनों में, राज्य पुलिस ने 68 ट्विटर खातों, 31 फेसबुक प्रोफाइल और दो यूट्यूब खातों के खाताधारक के खिलाफ एक दर्जन से अधिक आपराधिक आरोप दर्ज कराए हैं। इन खातों के खिलाफ मुख्य तौर पर आरोप लगाया गया है कि ये सांप्रदायिक व संवेदनशी मामलों को बिना वजह गैरकानूनी तरीके से सार्वजनिक किया है। जिसके परिणामस्वरूप सांप्रदायिक हिंसा की घटनाएं हुईं। इसी प्रकार की बातें बांग्लादेश में हुई हिंसा के बारे में भी बतायी जा रही है। उस हिंसा को बढ़ा-चढ़ा कर प्रस्तुत किया गया और लोगों को आपस में लड़ाने की कोशिश की गयी। इसका प्रभाव त्रिपुरा में तो देखने को मिला ही गोया महाराष्ट्र के भी कई शहरों में दिखा।

कुछ मीडिया घरानों ने 29 और 30 अक्टूबर को बांग्लादेश की सीमा से लगे त्रिपुरा के दो उत्तरी जिलों में हिंसा की घटनाओं की सूचना दी, जिसे बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के खिलाफ सांप्रदायिक हिंसा के प्रतिशोध के रूप में शुरू किया गया बतया गया था। हालांकि, कई मीडिया हाउस (जैसे टीओआई) ने त्रिपुरा के डीजीपी वीएस यादव के हवाले से बताया कि ‘‘कोई मस्जिद नहीं जलाई गई’’, जिन्होंने दावा किया कि साझा की गई तस्वीरें नकली हैं और देश के बाहर की तस्वीरों को इस परिप्रेक्ष्य के साथ जोड़ कर दिखाया जा रहा है। त्रिपुरा, डीआईजी नॉर्दर्न रेंज लालहिमंगा डारलोंग ने भी कहा, ‘‘सोशल मीडिया में अतिरंजित और विकृत अफवाहें फैलाई जा रही थी, जो दो धार्मिक समुदायों के बीच उच्च तनाव फैला सकती थी।’’ जैसा कि कुछ राष्ट्रीय मीडिया घरानों द्वारा रिपोर्ट किया गया था की त्रिपुरा के छोटे इलाकों में हिंसा की कुछ घटनाओं की सूचना मिली थी, लेकिन उन घटनाओ को मुस्लिम विरोधी हिंसा का रूप देने के लिए असत्यापित, नकली समाचार, चित्र और वीडियो प्रसारित करके मामले को सोशल मीडिया के माध्यम से आगे बढ़ा दिया गया था। हालांकि, इनमें से अधिकांश चित्र या फिर वीडियो भारत के नहीं थे। इस जन माध्यमों पर प्रसारित की जाने वाली सामग्री पाकिस्तान एवं बांग्लादेश से मंगवाए गए थे।

इस पृष्ठभूमि में, प्रत्येक भारतीय, चाहे वे हिन्दू हो या मुसलमान, सतर्क रहना चाहिए। जन माध्यम अंतरताना के माध्यम से संचालित इन विभाजनकारी ताकतों, जो सांप्रदायिक सद्भाव को नुकसान पहुंचाते हैं, उससे दूर रहना चाहिए और जब कभी भी प्रतिक्रिया दें तो उससे पहले किसी विश्वस्थ माध्यमों के द्वारा घटना के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध कर लें। यहां एक बात कहना उचित होगा कि हर संप्रदाय में देश हित और राष्ट्र की चिंता करने वाले संगठन मौजूद हैं। साथ ही हमारी पुलिस और सरकारें भी हमारे खिलाफ नहीं है। इसलिए इन माध्यमों के द्वारा प्राप्त सूचनाओं पर भरोसा करना उचित होगा।

भारतीय मुसलमानों को विशेष रूप से जागरूक रहने की जरूरत है और गलत सूचनाओं के बारे में जागरूक करने और अपने धर्म और पहचान के बारे में झूठी खबरें फैलाने वालों की पहचान करके उनके खिलाफ समाज को सतत सतर्क करते रहने की जरूरत है। क्योंकि हम अपने देश व समाज में शांति बनाए रहने के प्रति प्रतिबद्ध हैं। हम किसी को भी अपनी पहचान और धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल झूठे औचित्य, कलह और वैमनस्य के अपराध के लिए नहीं करने दे सकते। मुसलमान भारत की अखंडता, शांति और प्रगति के अभिन्न अंग हैं। इसलिए, हमें देश की लोकतांत्रिक यात्रा में अपनी हिस्सेदारी को समझना चाहिए और संवैधानिक आदर्शों को बनाए रखने और संजोने का प्रयास करना चाहिए, जिससे हमारा देश, जिसे हमारे पुरखों ने अपनी खून से सींचा है, उसमें शांति रहे और दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत कर सकें।

सरकार के अधिकार पर सवाल उठाने वाली किसी भी घटना को देश के कानून से निपटा जाना चाहिए। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस देश का कानून सबके लिए बराबर है। हमें अपने संविधान पर विश्वास और गर्व करनी चाहिए। जब तक यह जिंदा है तब तक हमारा अधिकार कायम है। कानून पर भरोसा रखें, वह अपराधियों को दंड देगा। कानून के पहरूओं को भी भारतीय संविधान का आदर करना चाहिए। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो देश के अल्पसंख्यकों का विश्वास कानून से उठ जाएगा। जांच एजेंसी और कानून के रक्षकों को पक्षपातपूर्ण नहीं होना चाहिए और किसी भी प्रकार की घटनाओं के बारे में निश्चित निष्कर्ष पर आना चाहिए, जिससे कानून के शासन में अल्पसंख्यकों के विश्वास को कायम रखा जा सके।

(आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई लेना देना नहीं है।)

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