जयसिंह रावत
पश्चिम एशिया में ईरान और इजरायल के बीच बढ़ता युद्ध अब केवल क्षेत्रीय तनाव का विषय नहीं रह गया है, बल्कि इसके प्रभाव अब वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और आम जनजीवन तक स्पष्ट रूप से महसूस किए जा रहे हैं। इस भीषण संघर्ष की आंच सुदूर हिमालय स्थित करोड़ों सनातन धर्मावलंबियों की आस्था के केंद्र, बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और यमुनोत्री तक पहुंच रही है। आगामी 19 अप्रैल को अक्षय तृतीया से शुरू हाने जा रही इस वर्ष की चारधाम यात्रा न केवल महंगी होने जा रही है अपितु इस संघर्ष का असर विदेशी श्रद्धालुओं के आगमन पर पड़ने की भी पूरी आशंका है।
इस साल की चारधाम यात्रा के लिये गंगोत्री एवं यमुनोत्री के कपाट अक्षय तृतीया पर 19 अप्रैल को, केदारनाथ के 22 अप्रैल को तथा बदरीनाथ के कपाट 23 अप्रैल को खुल रहे हैं। इसलिये ऋषिकेश में यात्रा का उद्घाटन 14 या. 15 अप्रैल को होने की संभावना है।चारधाम यात्रा उत्तराखंड की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। हर वर्ष लगभग 50 लाख श्रद्धालु देश-विदेश से इन पवित्र धामों के दर्शन के लिए आते हैं लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं। युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और गैस की कीमतों में उछाल आया है, जिसका सीधा असर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देश पर पड़ रहा है। पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की कीमतों में वृद्धि का असर पहाड़ी क्षेत्रों तक भी कई गुना बढ़कर पहुंचता है। इसलिये चारधाम यात्रा की पूरी लागत संरचना प्रभावित होना स्वाभाविक है।
इस संकट का सबसे पहले असर परिवहन पर पड़ता है। इस हिमालयी तीर्थ यात्रा का अधिकांश हिस्सा सड़क मार्ग से तय किया जाता है, जहां टैक्सी, बस और निजी वाहनों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। ईंधन महंगा होने से इन सेवाओं के किराए बढ़ना स्वाभाविक है। इसके साथ ही, पहाड़ों में आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति मैदानी क्षेत्रों से होती है। जब परिवहन महंगा होता है, तो खाद्य सामग्री, होटल सेवाएं और अन्य जरूरी सुविधाएं भी महंगी हो जाती हैं जो सीधे श्रद्धालुओं की जेब पर बोझ डालता है। ऋषिकेश से लेकर चारों धामों तक लगभग 1300 किमी लम्बे यात्रा मार्ग हजारों की संख्या में होटल, रेस्तरां और ढाबे स्थाई और सीजनल आधार पर चलते हैं। भोजन और चाय-नास्ते के केन्द्र प्रायः एलपीजी से चलते हैं। इन दिनों सारे देश में रसोई गैस की किल्लत चल रही है जिसका असर चारधाम यात्रा पर भी पड़ना स्वाभाविक है। इस किल्लत के चलते भोजन आदि की कीमतों में कम से कम 20 प्रतिशत तक उछाल आने की संभावना है, जिसका सीधा असर तीर्थ यात्रियों की जेबों पर पड़ेगा।
चारधाम यात्रा में परिवहन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी निभाने वाली ऋषिकेश स्थित टीजीएमओयू ट्रांसपोर्ट कंपनी के अध्यक्ष जितेन्द्र सिंह नेगी के अनुसार अगर यु़द्ध के हालात नहीं सुधरे और रसोई गैस की स्थिति नहीं सुधरी तो इस साल की चारधाम यात्रा बहुत बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। इस बार चारधाम यात्रा के लिये 3000 हजार बसें तय की गयी हैं जिनकी बुकिंग शुरू हो गयी है। देश के विभिन्न कोनों से बसों की बुकिंग कर आने वाले तीर्थ यात्री अपना कीचन भी साथ लाते हैं और उनको यात्रा के दौरान रसोई गैस उपलब्ध करानी होती है, जो कि इस स्थिति में बहुत कठिन है। नेगी के अनुसार यात्रियों के कुछ दलों ने बसों की बुकिंग केंसिल करा दी है।
इसका दूसरा महत्वपूर्ण पहलू यह है कि चारधाम यात्रा केवल श्रद्धा का विषय नहीं, बल्कि एक व्यापक आर्थिक तंत्र है। उत्तराखंड के लाखों परिवारों की आजीविका प्रत्यक्ष और पारोक्ष रूप से इस यात्रा से जुड़ी हुई है। होटल व्यवसायी, ढाबा संचालक, टूर ऑपरेटर, गाइड, घोड़ा-खच्चर मालिक, फूल-प्रसाद विक्रेता, सभी की आय का बड़ा हिस्सा इसी यात्रा से आता है। जब यात्रा महंगी होती है, तो स्वाभाविक रूप से यात्रियों की संख्या प्रभावित होती है, विशेषकर मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोग अपनी यात्रा स्थगित या सीमित कर सकते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पर सीधा नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
युद्ध का एक और प्रभाव अंतरराष्ट्रीय यात्राओं पर भी देखा जा रहा है। खाड़ी देशों और यूरोप से आने वाली उड़ानों के मार्ग में बदलाव और हवाई किराए में वृद्धि के कारण प्रवासी भारतीयों और विदेशी पर्यटकों की संख्या में कमी आने की आशंका है। यह वर्ग आमतौर पर अधिक खर्च करता है और स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है। उनकी अनुपस्थिति से पर्यटन क्षेत्र की आय में गिरावट आ सकती है। केदारनाथ जैसे दुर्गम क्षेत्रों में हेलीकॉप्टर सेवाएं एक महत्वपूर्ण साधन बन चुकी हैं लेकिन एविएशन टर्बाइन फ्यूल की कीमतों में वृद्धि के कारण इन सेवाओं के किराए में भी बढ़ोतरी होना तय है। इसके अलावा, यदि युद्ध लंबा चलता है, तो वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हो सकती है, जिससे विमानन क्षेत्र में स्पेयर पार्ट्स और तकनीकी संसाधनों की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है।
उत्तराखंड के सुदूर हिमालयी क्षेत्रों में स्थित ये धाम भले ही भौगोलिक रूप से दूर हों, लेकिन वैश्विक अर्थव्यवस्था के उतार-चढ़ाव से अछूते नहीं हैं। यह परस्पर जुड़ाव आधुनिक विश्व की एक सच्चाई है, जहां एक क्षेत्र में युद्ध का प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर बैठे लोगों के जीवन पर पड़ता है। इस स्थिति में स्थानीय स्तर पर भी नवाचार की आवश्यकता है। पर्यटन से जुड़े लोगों को अपनी सेवाओं की गुणवत्ता और विविधता बढ़ानी होगी, ताकि कम संख्या में आने वाले यात्रियों से भी बेहतर आय प्राप्त की जा सके। स्थानीय उत्पादों, हस्तशिल्प और पारंपरिक भोजन को बढ़ावा देकर अतिरिक्त आय के स्रोत विकसित किए जा सकते हैं।
चारधाम यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है। इसे वैश्विक अस्थिरता के दौर में भी सुचारु और सुरक्षित बनाए रखना एक सामूहिक जिम्मेदारी है। सरकार, प्रशासन और समाज को मिलकर इस दिशा में प्रयास करने होंगे, ताकि आस्था की यह यात्रा आर्थिक संकट का शिकार न बने। ईरान- युद्ध की आंच ने यह स्पष्ट कर दिया है कि आज का विश्व कितना परस्पर जुड़ा हुआ है। ऐसे में आवश्यक है कि हम न केवल तात्कालिक चुनौतियों का सामना करें बल्कि दीर्घकालिक रणनीतियों के माध्यम से अपने महत्वपूर्ण धार्मिक और आर्थिक तंत्रों को मजबूत बनाएं। चारधाम यात्रा की निरंतरता और उसकी गरिमा को बनाए रखना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
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