भारत की आजादी में मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी की भूमिका

भारत की आजादी में मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी की भूमिका

स्वातंत्र समर में मुस्लिम नायक, भाग-3

इफ्तेखार अहमद

1857 ईस्वी की प्रथम स्वतंत्रता के पश्चात हिंदुस्तान पूरी तरह से अंग्रेजों के कब्जे में आ गया परंतु सरज़मीन-ए- हिंदुस्तान को फिरंगियों को दासता कबूल न थी। अंदर ही अंदर लोगों में क्रांति की ज्वाला धधक रही थी। इस चिंगारी को हवा देने में 1866 में स्तगपित दारुल उलूम देवबंद की भूमिका अहम रही है। इस संदर्भ में यह कहा जा सकता है कि उन दिनों देवबंद तालीम के साथ-साथ बर्तानिया हुकूमत की मुखालिफत का मज़बूत केंद्र बन गया था। उस वक्त देवबंद के अगुआ सख्शियत में मौलाना कासिम नानातवी, हाजी आबिद हुसैन, शेखुल हिन्द मौलाना महमुदुल हसन देवबंदी, मौलाना राशीद अहमद गंगोही, मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी, मौलाना हुसैन अहमद मदनी प्रमुख थे। आज़ादी की लड़ाई में इनका किरदार नाकाबिले फरामोश है। मौलाना शेखुल हिन्द के द्वारा चलाया गया “तहरीक -ए – रेशमी रूमाल” ने अंग्रेज़ों की जड़ें हिला कर रख दी। इस तहरीक (आंदोलन) के कद्दावर नेतृत्व में से एक इमाम-ए-इंक़लाब मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी थे। मौलाना सिंधी शेखुल हिन्द के प्रिय शिष्य थे। आज की कड़ी में मौलाना सिंधी के किरदार के बारे में चर्चा करेंगे जिसने न केवल हिंदुस्तान में बल्कि ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विदेशों में रहे भारतीयों के साथ साथ कई मुल्कों को भारत को आज़ाद कराने के लिये गोलबंद किया। आज़ादी इसी तड़प ने उन्हें इमाम-ए-इंक़लाब बना दिया।

मौलाना उबैदुल्लाह की पैदाइश 10 मार्च 1872 को पंजाब के जिला सियालकोट के एक गांव में खत्री परिवार में हुआ था। मौलाना के जन्म के चार माह पहले पिता की मृत्यु हो गई थी, दो वर्ष बाद दादा भी चल बसे। बाद में चाचा के यहाँ परवरिश पाई।बारह वर्ष की उम्र में अपने हम जमाअत (सहपाठी) से लेकर मौलाना उबैदुल्लाह पाटली की किताब “तोहफतुल हिन्द” पढ़ी और इसके बाद शाह इस्माइल रहट की किताब तकवियतुल ईमान पढ़ी। इन किताबों ने मौलाना के मस्तिष्क में गहरी छाप छोड़ी। इस्लाम, कुरआन और जीवन के रहस्य को जानने की दिलचस्पी ने उन्हें इस्लाम के काफी करीब ला दिया। महज 15 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया तथा अपना नाम बोटा सिंह के बदले नया नाम उबैदुल्लाह रखा। मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी अपनी प्रारम्भिक शिक्षा प्राप्त करने के बाद 1888 में देवबंद दारुल उलूम में दाखिला लिए।जहां उन्होंने मौलाना अबु सिराज, मौलाना राशीद अहमद गंगोही तथा मौलाना महमुदुल हुसैन समेत कई विद्वानों से गहराइयो से इस्लामी विषयों का अध्ययन किया साथ ही फ़िक़ह (तर्क) और दर्शन में भी अपनी मज़बूत पकड़ बनाई। देवबंद से फारिग होने के बाद 1891 में मौलाना अबुल हसन ताज अमरोटी के पास जिला अमरोट चले गए।वहीं आपकी शादी हुई। मौलाना सिंधी 1897 तक अमरोट में ही रहकर दर्स व तदरीस और मुताला कुतुब में मशगूल रहे। इसी दौरान नशर व इशाअत का एदारा महमूद अल मुताबीअ कायम किया और सिंधी ज़ुबान में एक महानामा” हिदायतुल अख्वान “के नाम से शुरू किया।

शेखुलहिन्द के हुक्म से 1901 में हैदराबाद के नज़दीक पीरझुंड में दारुल रशायद कायम किया और वहीं सालों तक इल्मी व सियासी काम को अंजाम देते रहे। पुनः शेखुल हिन्द के बुलावे पर वापस देवबंद आगये। देवबंद में मौलाना सिंधी ने छात्रों की तंज़ीम “जमीयतुल अंसार” में अहम खिदमात अंजाम दिए। मौलाना सिंधी के क्रियाकलापों से देवबंद के छात्रों एवं शिक्षकों में आज़ादी के जोश भर दिए और देवबंद इंक्लाबियों को पैदा करने ज़रख़ेज़ ज़मीन बन गई।देवबंद में अपना काम अंजाम तक पहुंचाने के बाद शेखुल हिन्द के अनुरोध पर मौलाना सिंधी ने अपना काम दिल्ली मुन्तक़िल (हस्तांतरित) कर दिये और यहां पर उन्होंने हकीम अजमल खान तथा डॉ मुख्तार अंसारी के साथ मिलकर सियासी और इल्मी बेदारी में लग गए। मौलाना सिंधी ने यहां “नाज़रतुल मआरिफ़ अलकुरानीय “के नाम से दीनी तरबियती मरकज की बुनियाद रखी।इसी जद्दोजेहद के दौरान तहरीक रेशमी रूमाल का आगाज़ 1913 ईसवी में शेखुल हिन्द मौलाना महमुदुल हसन ने किया। उन्होंने कहा था – “यह वही तहरीक है जिसके ज़रिया मुल्क की आज़ादी के लिए एक ऐसी शमां जलायी गई थी जिसकी रौशनी में सफर करते हुए हिंदुस्तान को आज़ादी की दौलत मयस्सर आयी।” शेखुल हिन्द इस तहरीक के रूहे रवां और अमीर थे तथा जांबाज सिपाही आला रुक्न मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी थे जिसने तहरीक को पाये तकमील तक पहुंचाये। इस आंदोलन को मजबूती देने में मौलाना हुसैन अहमद मदनी, हकीम नुसरत हुसैन, मौलाना अज़ीज़ गुल पेशावरी, मौलाना वहीद अहमद मदनी आदि ने नुमाया किरदार अदा किए।

तहरीक रेशमी रूमाल का मकसद ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ एक ऐसी चक्रब्यूह की रचना करनी थी, जिसमें देश की अंदरूनी बगावत के साथ – साथ अन्य बैरूनी मुल्कों की सहायता प्राप्त करना था ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन का दंश झेल रहे थे। इसके लिए शेखुल हिन्द ने इंतहाई खामोशी और राजदारी के साथ मुल्क के विभिन्न हिस्सों में मरकज़ स्थापित किए और उन तमाम मरकज़ पर पैग़ाम पहुंचाने का खुफिया कार्यक्रम किया जिसके लिए तहरीक रेशमी रूमाल का इंतखाब अमल में आया।इस तहरीक को प्रत्येक स्तर पर मज़बूत करने की पहल की जा रही थी कि इसी दौरान प्रथम विश्व युद्ध की घोषणा हो गई। शेखुल हिन्द के लिए यह एक सुनहरा मौका था कि ब्रतानिया हुकूमत की मुखालिफत कर रहे देशो से मदद हासिल किया जाए, इसी उद्देश्य की प्राप्ति हेतु शेखुल हिंद के कहने पर मौलाना सिंधी काबुल आ गए। यहां उन्होंने अफगानी शासक मीर हबीबीबुल्लाह खान की मदद से काबुल में एक अस्थायी सरकार की बुनियाद रखी गयी। इस सरकार में राजा महेंद्र प्रताप सिंह राष्ट्रपति, मौलाना बरकतुल्लाह भोपाली, प्रधानमंत्री और खुद मौलाना सिंधी विदेश मंत्री बने।

उस वक्त ब्रिटिश साम्राज्य के मुखालिफ जर्मनी ने इस अस्थाई सरकार को मान्यता दी। मौलाना सिंधी सात साल तक काबुल में क़याम फरमाए।प्रथम विश्व युद्ध के बाद जर्मनी बिखर चुकी थी। अफगानिस्तान की सरकार के साथ ब्रिटिश हुकुमत से संधि हो हो गई। नतीजतन मौलाना सिंधी को रूस जाना पड़ गया, उसने अपनी आँखों से रूसी क्रांति को देखने का मौका मिला । क्रांति ने मौलाना के जीवन में एक नया इंक़लाब बरपा कर दिया। किन्तु मौलाना की मुलाकात लेनिन से किसी कारणवश नहीं हो पाई। मौलाना सीने में इंक़लाब की ज्वाला लिए 1923 में तुर्की के लिए रवाना हो गए। उस वक़्त तुर्की अतातुर्क कमाल पाशा के नेतृत्व में नई करवट ले रहा था। मौलाना सिंधी यहां चार साल क़याम फरमाए, फिर वे इस्तांबुल में तीन माह क़याम कर योरोप की तारीख को गहराई से अध्धयन किया। इस्तांबुल से ही भारत की आज़ादी के चार्टर जारी किया। तत्पश्चात मौलाना सिंधी मक्का चले गए। अरब में अल सऊद की सरकार बन चुकी थी। मौलाना सिंधी 10 वर्षों तक मक्का की सरज़मीन पर पढ़ने पढ़ाने का कार्य करते रहे। वह चाहते थे भारत अंग्रेजों द्वारा शासन नहीं करे बल्कि भारत भारतीयों द्वारा शासन करेगा।यही कसक उन्हें वतन लौटने के लिए मजबूर किया। 1938 में भारतीय राष्ट्रीय कॉंग्रेस के अनुरोध पर ब्रिटिश सरकार की अनुमति से अरब से करांची के बन्दरगाह पर उतरे और दिल्ली रवाना हो होगये। आपने शाह वलूलल्लाह के फलसफे को समझने के लिए दिल्ली, लाहौर, करांची, पीरझुण्ड में बैअतुल हिकमत मरकज़ खोले जहां सरगर्मी से नौजवानों को तरबियत फरमाते रहे।

मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी वक्त और हालात को देखते हुए अंग्रेज़ों के खिलाफ गांधी जी के हथियार “अहिंसा” को सही मानते थे। 1944 में मौलाना सिंधी अपनी बेटी से मिलने पंजाब जाते हैं और वहीं गंभीर बीमारी से पीड़ित हो जाते हैं। आखिरकार 21 अगस्त 1944 ईस्वी को मौलाना की रूह परवाज़ कर जाती है। इमामे इंक़लाब मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी अपनी बेशकीमती ज़िन्दगी का बेश्तर हिस्सा मुल्क को आज़ाद कराने में लगा दिया, जो नाकाबिले फरामोश है। ऐसे महापुरुष के पदचिन्हों पर चलकर ही भारत की गंगा जमनी तहज़ीब को अक्षुण्ण रखा जासकता है। बकौल मौलाना सिंधी – “दुनिया की तमाम उलझने खत्म हो सकती हैं अगर जाहिल ख़ामोश रहे और आलिम हक बोलने लगे।” इमामे इंक़लाब मौलाना उबैदुल्लाह सिंधी को सादर श्रद्धांजलि।

नोट : जल्द ही इसकी अगली किस्त लेकर आपके सामने प्रस्तुत होंगे।

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