वोट के लिए आतंकवाद व देश हित से समझौता करते राजनीतिज्ञ

वोट के लिए आतंकवाद व देश हित से समझौता करते राजनीतिज्ञ

डॉ. सूर्य प्रकाश अग्रवाल

आतंकवादी निरोधक दस्ता (एटीएस) ने जान पर खेल कर अंसार गजवातुल हिंद के दो आतंकवादी मिनहाज व मसीरुद्दीन को लखनऊ से गिरफ्तार किया फिर उनसे पूछताछ के बाद कई और आतंकवादी प्रदेश के विभिन्न शहरों से पकड़े गए जो इन आतंकवादियों की मदद कर रहे थे। एटीएस की इस साहसिक कार्यवाही को समाजवादी पार्टी के मुखिया ने पुलिस का ढ़ोंग बताया तथा कहा कि उत्तर प्रदेश पुलिस पर भरोसा नहीं है। इसी प्रकार बहुजन समाज पार्टी की मुखिया ने कहा कि पुलिस की इस कार्यवाही को चुनाव नजदीक आ जाने के कारण एटीएस ने इस तरह की कार्यवाही की है। दोनों राजनीतिज्ञ प्रदेश में कई पदों की शोभा बढ़ा चुके है तथा बहुत परिपक्व राजनीतिज्ञ हैं। अब इन्हें यह भी बता देना चाहिए कि चुनाव के कितने दिन पूर्व पुलिस को आतंकवादियों को गिरफ्तार करने की कार्यवाही रोक देनी चाहिए तथा पुलिस को यह घोषणा कर देनी चाहिए कि अब चुनावों का दौर चालू हो चुका है सो खुल कर खेलें।

देश में कहीं न कहीं पूरे वर्ष ही चुनाव चलते ही रहते हैं। राजनीतिज्ञों के इस तरह के बयान साहसिक पुलिस कर्मियों के मनोबल को तोड़ देते हैं। अब यदि ये दोनों राजनीतिज्ञ प्रदेश के सर्वोच्च पद पर होते तो शायद आतंकवादियों पर कोई कार्यवाही ही नहीं की जाती। दरभंगा पार्सल ब्लास्ट मामले में शामली  से राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने आतंकवादियों को गिरफ्तार किया गया था। 

दिल्ली के बाटला कांड पर भी वर्ष 2008 में कांग्रेस के नेता को नींद नहीं आई थी तथा आतंकवादियों की फोटो देख कर उनकी आंखों में आंसू छलक पड़े थे। स्वयं कांग्रेस के एक नेता ने इस प्रकार का बयान दिया था जो समाचार पत्रों में प्रकाशित भी हुआ था। बाटला कांड को अरविंद केजरीवाल, दिग्विजय सिंह, ममता बनर्जी आदि बड़े नेताओं ने फर्जी मुठभेड़ कहा था जबकि मौके से फरार आतंकी आरिज खान उर्फ जुनैद को अदालत ने मौत की सजा सुनाई तो तो इन नेताओं ने पूर्व में दिए अपने बयान वापस तक नहीं लिए। कु. मायावती को यह खुलासा करना चाहिए कि आतंकवादियों की गिरफ्तारी से कौन से लोग खुश नहीं होते तथा पुलिस संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्तार तब तक न करें जब तक कि चुनाव का दौर समाप्त नहीं हो जाए।

समुदाय विशेष के अधिकांश आतंकवादी होने के नाते राजनेता धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इस प्रकार के देशघाती बयान देते रहते हैं। अब यदि आतंकवादियों का मजहब इस्लाम है तो फिर कानून ऐसे बनाए जाने चाहिए कि देश में 35 करोड़ की जनसंख्या होते हुए भी अल्पसंख्यक होने के नाते उन्हें छोड़ देना चाहिए।

प्रदेश में दुर्दांत अपराधियों की संपत्ति जब्त की जा रही है तथा तोड़ी जा रही है। यदि उनमें भी अधिकांश मुसलमान हो तो कुछ राजनेताओं को पेट में दर्द होता है। अब इन्हें कौन समझाए कि अपराधों में अधिकतर अल्पसंख्यक के लोग शामिल होते हैं तो पुलिस उनको गिरफ्तार करती है तो क्या पुलिस कोई गुनाह करती है?। आतंकवादियों ने मुंबई में दस वर्ष पूर्व 13 जुलाई को मुंबई के झावेरी बाजार, दादर व ऑपेरा हाउस में बम विस्फोट करके 26 लोगों की हत्या कर दी थी तथा अनगिनत निर्दोष लोग घायल हो गए थे। उत्तर प्रदेश में भी 2007 के आखिरी महीनों में वाराणसी, लखनऊ तथा फैजाबाद में बम विस्फोट हुए थे तथा 15 लोगों की जान गई थी एवम् कई लोग घायल हुए थे। रामपुर में भी सीआरपीएफ कैंप पर हमला हुआ तथा सात जवानों को शहादत देनी पड़ी थी गोरखपुर में भी आतंकवादियों ने बम विस्फोट किए थे।

समाजवादी पार्टी ने अपने चुनावी घोषणा पत्रा तक में कहा था कि सत्ता में आने के बाद जेल गए निर्दोष आतंकवादियों पर चल रहे मुकदमे वापस ले लिए जाएंगे। जब तक संदिग्ध आतंकवादियों को गिरफ्तार कर, जांच कर अदालत उन्हें निर्दोष सिद्ध न कर दे तब तक उन्हें निर्दोष कहना उस पुलिस बल का अपमान है जो कि अपनी जान जोखिम में डाल कर उन्हें जीवित गिरफ्तार करते हैं। वर्ष 2012 में सत्ता में रहते हुए समाजवादी के नेता ने संदिग्ध आतंकवादियों के मुकदमों को वापस लेने की पहल की थी परन्तु अदालतों ने ऐसा करने से उन्हें रोक दिया। अब यदि अदालतें राजनीतिक दबाव में अपने फैसले गलत करके आतंकवादियों को छोड़ देती है तो उत्तर प्रदेश में आतंकवादी घटनाओं की बाढ़ ही आ जाती। जिन आतंकवादियों को समाजवादी पार्टी के नेता निर्दोष बता रहे थे उनमें से अनेकों को उम्र कैद की सजा हुई ।

राजनीतिज्ञों को देश व राज्य हित सर्वोच्च स्थान पर रख कर अपने बयान देने चाहिए चुनावी हार व जीत तो लगी रहती है। उन्हें प्रदेश की पुलिस बल पर भरोसा करना ही होगा क्योंकि असंख्य पुलिसकर्मी उन राजनीतिज्ञों की सुरक्षा में दिन रात एक किए रहते हैं। प्रदेश की पुलिस व प्रशासन का मनोबल बढ़ाने के लिए उन्हें अल्पसंख्यकवाद का सहारा नहीं लेना चाहिए। क्या बहुसंख्यकों को आतंकवादियों की बंदूकों व बमों का निशाना बना कर राजनेता कोई भी राजनीति कर पाएंगे। यह इन राजनेताओं को देशद्रोह व राज्य द्रोह ही कहा जा सकता है। बेहतर होता कि पुलिस को अपना काम करने दिया जाए व दुर्दांत अपराधियों, आतंकवादियों, भ्रष्टाचारियों व अमानवीय कार्यों में लिप्त लोगों को गिरफ्तार करने दिया जाए। अदालती कार्यवाही में कोई बच जाए तो बच जाए। पुलिस भी पूरी जानकारी व जांच करके किसी भी आदमी की गिरफ्तारी करती है। इन राजनेताओं को सरकारों को सार्थक सुझाव देने चाहिए कि पुलिस निर्दोष लोगों को बिना सबूत गिरफ्तार न कर सकें विपक्ष में रहते हुए सरकार की प्रत्येक बात पर आलोचना ही काफी नहीं होती उन्हें देश व राज्य को चलाने के लिए व विकास करने के लिए सारगर्भित सुझाव भी राजनीति से ऊपर उठ कर देने चाहिए तभी जनता इन राजनेताओं पर विश्वास रख पाएंगी।

(अदिति)

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