स्वदेशी और स्वावलंबन से ही राष्ट्र का निर्माण संभव : मनोज कुमार सिंह

स्वदेशी और स्वावलंबन से ही राष्ट्र का निर्माण संभव : मनोज कुमार सिंह


गौतम चौधरी

आज के दौर में बिना किसी प्रशासनिक दायित्व के प्रतिभा और मेहनत के बदौलत कोई समाज और संगठन में महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर ले, यह असंभव तो नहीं कहा जा सकता है लेकिन कठिन जरूर है। एक ओर काॅरपोरेट, पूंजी और बाजार का जोर हो और दूसरी ओर विशुद्ध सांगठनिक ताकत, ऐसे मौकों पर अमूमन या तो काॅरपोरेट के नुमाइंदे जीतते हैं, या फिर पूंजी व बाजार के एजेंट बाजी माल ले जाते हैं। ऐसी परिस्थिति में झारखंड का एक ऐसा भी युवा संगठक है, जिसने अपनी मेहनत और लगन के बदौलत न केवल संगठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है अपितु अब भारत सरकार के महत्वपूर्ण प्रतिष्ठान, ‘‘खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग’’ के महत्वपूर्ण दायित्व को प्राप्त किया है। इस शख्स का नाम है मनोज कुमार सिंह। मनोज लम्बे समय से सामाजिक काम में सक्रिय रहे हैं। संघ, यानी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक से लेकर, अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के विभिन्न दायित्वों से होते हुए अभी हाल ही में खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के माननीय सदस्य नियुक्त किए गए हैं। स्वदेशी, स्वाबलंबी और स्वाभिमानी मनोज, खांटी झारखंडी हैं। मृदुभाषी और सौम्य स्वभाव के मनोज में विरोधियों को भी अपना बना लेने की ताकत है। विगत दिनों उनसे मुलाकात हो गयी। साक्षात्कार का कोई इरादा नहीं था लेकिन बात-बात में कुछ गंभीर विषयों पर चर्चा हो गयी। उन्हीं चर्चा को संपादित कर यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

प्रश्न : प्रधानमंत्री मोदी पर काॅरपोरेट हितों का आरोप लगता रहा है। खादी आयोग विशुद्ध स्वदेशी और आर्थिक लोकतांत्रिक चिंतन है। यह दोनों विरोधाभासी नहीं है?

उत्तर : आरोप लगाने वाले तो किसी पर भी आरोप लगा देते हैं। यदि सचमुच हमारे प्रधानमंत्री ऐसे होते तो स्वदेशी उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए रोजमर्रे के चीनी उत्पाद पर प्रतिबंध नहीं लगाते। कुछ दिन पहले तक चीन करोड़ रूपये का केवल अगरबत्ती का व्यापार हमारे देश में करता था लेकिन आज ऐसी बात नहीं है। हमारे प्रधानमंत्री ने आत्मबल का परिचय देते हुए चीनी उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया है। अब हमारे लघु, कुटिर उद्यमी इस व्यापार में उतरने लगे हैं। आज भी चुनौती है। आगरबत्ती बनाने के लिए स्टीक की जरूरत होती है। अबतक वह भी बाहर से आता था लेकिन कुछ पूर्वोत्तर और ओड़िशा आदि प्रांतों में इसका भी उत्पादन होना प्रारंभ हो गया है। हमलोगों के दबाव के कारण इस प्रकार के उत्पाद पर सरकार ने आयात शुल्क बढा दिया है। मोदी जी ने सोशल फाॅर वोकल का नारा दिया। खादी के लिए तो वे कृतसंकल्पित हैं। क्योंकि उन्हें भी पता है कि काॅरपोरेट पूँजी रोजगार नहीं दे सकती है। इसके लिए बड़े पैमाने पर लघु एवं कुटिर उद्योग ही लगाना होगा।

प्रश्न : खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के द्वारा स्वावलंबन की कौन-कौन सी योजनाएं चलाई जा रही है?

उत्तर : अभी सभी योजनाओं की मुकम्मल जानकारी नहीं दे पाउंगा। हाल ही में मुझे दायित्व सौंपा गया है। बहुत सारी चीजों का अध्ययन कर रहा हूं। वैसे थोड़ी-बहुत योजनाओं की जानकारी आपसे साझा कर रहा हूं। हमारे यहां ग्रामीण क्षेत्रों में स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए लघु, कुटिर उद्यमियों को मात्र चार प्रतिशत के ब्याज पर ऋण उपलब्ध कराई जाती है। यह ऋण 25 लाख तक हो सकता है। आपके प्रोजेक्ट के आधार पर आपको ऋण प्राप्त होगा। इसके लिए आपको पहले प्रोजेक्ट बनवा कर जिला उद्योग विभाग या खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के प्रांतीय कार्यालय या फिर खादी बोर्ड से पास करवाना होगा। जब इन तीनों में से कोई एक एजेंसी आपके प्रोजेक्ट को पास कर देगी है तो आप किसी भी बैंक से यह ऋण ले सकते हैं। इस प्रकार के ऋण पर सामान्य दर से ब्याज देय है लेकिन लाभुकों में जो सामान्य वर्ग से आते हैं उन्हें 25 प्रतिशत तक और अनुसूचित जाति एवं जनजातियों को 35 प्रतिशत तक सब्सिडी दी जएगी।

प्रश्न : और कौन-कौन सी योजना चलाई जा रही है?

उत्तर : हमारी संस्था, बुनकरों के कल्याण के लिए। फिर उन्हें कच्चा माल मुहैया कराने के लिए। बुनकर जहां अपना कपड़ा बुनते हैं या फिर कच्चे माल व उत्पाद का भंडारण करते हैं, उस सेड के निर्माण के लिए भी संस्था पैसा उपलब्ध कराती है। यह नहीं हमारी संस्था उत्पादित सामानों की खरीद भी करती है। बिक्री को बढ़ावा देने के लिए भी संस्था सब्सिडी देती है।

प्रश्न : खादी एवं गामोद्योग आयोग रोजगार के क्षेत्र में क्या-क्या कर रही है?

उत्तर : बहुत काम हो रहा है। आपको आश्चर्य होगा कि हमारे द्वारा संरक्षण में देश के कुल 11 करोड़ लोग प्रत्यक्ष रोजगार प्राप्त कर रहे हैं। यह कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा सेक्टर है। विदेशी व्यापार में हमारा योगदान 30 प्रतिशत से अधिक का है। आपने जो पहले प्रश्न किया है उसका मैं दूसरे तरीके से भी जवाब दे सकता हूं। इस सेक्टर को कोई नजरअंदाज कर ही नहीं सकता है। यह बड़ा सेक्टर है। हमारे प्रधानमंत्री तो इस पर विशेष रूप से ध्यान दे रहे हैं।

प्रश्न : झारखंड के लिए कुछ खास?

उत्तर : ऐसे तो अलग से कुछ नहीं है लेकिन झारखंड के लोग उद्यमी है। कई लोग हमसे संपर्क कर रहे हैं। पत्तल, दोना, अगरबत्ती स्टिक आदि के कुटिर उद्योग यहां आसानी से लगाए जा सकते हैं। हमारा प्रदेश देश का महत्वपूर्ण सिल्क उत्पादक है। इस क्षेत्र में भी काम हो रहा है। लाह के क्षेत्र में भी हमलोग काम कर रहे हैं। अभी कौशल विकास और कई कलस्टरों का निर्माण होना है। झारखंड उसका भी हब बनेगा।

प्रश्न : राजनीति में आपकी अभिरूचि?

उत्तर : बिल्कुल नहीं है। यदि मौका मिला तो छोड़ना भी नहीं है। अभी तक सांगठनिक काम में ही रहा हूं। इसलिए संगठन खड़ा करना, लोगों की अच्छाई के लिए कुछ करना जीवन का लक्ष्य है। उसी काम में लगा हुआ हूं।

प्रश्न : हमारे पाठकों के लिए कुछ कहना चाहेंगे?

उत्तर : जरूर! देखिए, स्वदेशी के बिना स्वाबलंबन संभव नहीं है। यह दोनों छोटे, लघु एवं कुटिर उद्योग से ही आएंगे। इसलिए हमें अपने उपर विश्वास कर खुद का रोजगार करना चाहिए। उद्यमिता जरूरती है। खेती, बुनकरी, शिल्पकारी आदि हमारा पुराना हुनर रहा है। इस इल्म को हमें आगे बढ़ाना होगा। तभी दुनिया के सामने हम सिर उठाकर स्वावलंबी राष्ट्रवाद की बात कर सकते हैं।

मनोज कुमार सिंह का परिचय

सन् 1980 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ संपर्क में आए। 1983 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से जुड़े। परिषद में विभिन्न दायित्वों का निर्वहन करते हुए राष्ट्रीय कार्यकारी मंडल के सदस्य तक रहे। सन् 2000 में स्वदेशी जागरण मंच की शाखा भारतीय विपनण विकास केन्द्र के झारखंड, बिहार, ओड़िसा के समन्वयक नियुक्त हुए। 2009 में स्वदेशी जागरण मंच के राष्ट्रय परिषद के सदस्य नियुक्त हुए। सन् 2011 से झारखंड काइक्रो वेलफेयर डवलपमेंट सेंटर के निदेशक हैं। मनोज सिंह मूल रूप से डलटनगंज के रहने वाले हैं और भौतिकी विज्ञान में स्नातकोत्तर हैं। मनोज विधि स्नातक की भी डिग्री ले रखी है लेकिन प्रैक्टिस नहीं कर रहे हैं। भूआर्थिकी अध्ययन टीम के साथ मनोज 2014 में चीन भी जा चुके हैं।

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