गौतम चौधरी
भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक केवल वित्तीय संस्थान नहीं हैं; वे करोड़ों नागरिकों की बचत, सरकार की आर्थिक नीतियों और देश की वित्तीय विश्वसनीयता के स्तंभ हैं। इसलिए जब किसी सरकारी बैंक को हजारों करोड़ रुपये के विवाद में अदालत के बाहर समझौता करना पड़ता है, तो यह केवल एक व्यावसायिक निर्णय नहीं रह जाता। यह सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
हाल के दिनों में बैंक ऑफ बड़ौदा द्वारा NMC Health प्रकरण में लगभग 600 मिलियन डॉलर (करीब ₹5,700 करोड़) के समझौते ने अनेक प्रश्न खड़े किए हैं। बैंक का कहना है कि यह लंबी और अनिश्चित कानूनी लड़ाई से बचने के लिए लिया गया एक व्यावसायिक निर्णय था। दूसरी ओर, इस निर्णय ने यह बहस भी तेज कर दी है कि क्या भारतीय बैंकिंग प्रणाली ने इस पूरे प्रकरण से पर्याप्त सबक सीखा है।
NMC Health कभी पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी निजी स्वास्थ्य सेवा कंपनियों में गिनी जाती थी। उसके संस्थापक बी. आर. शेट्टी भारतीय मूल के एक प्रतिष्ठित उद्योगपति थे, जिनकी पहचान भारत–यूएई संबंधों और प्रवासी भारतीय समुदाय में भी थी। वर्ष 2020 में जब कंपनी में अरबों डॉलर के छिपे हुए ऋण और गंभीर वित्तीय अनियमितताओं का खुलासा हुआ, तब यह केवल एक कॉरपोरेट विफलता नहीं थी; यह वैश्विक बैंकिंग निगरानी और कॉरपोरेट गवर्नेंस की भी परीक्षा बन गई।
यहीं से सार्वजनिक प्रश्न शुरू होते हैं। यदि किसी कंपनी की वास्तविक वित्तीय स्थिति इतनी कमजोर थी, तो विभिन्न बैंकों ने उसे इतना बड़ा ऋण कैसे दिया? क्या ऋण स्वीकृति से पहले आवश्यक जोखिम मूल्यांकन (Due Diligence) पर्याप्त था? क्या वित्तीय विवरणों का स्वतंत्र सत्यापन हुआ? क्या जोखिम के शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचाना गया? और यदि पहचाना गया, तो उस पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
इन प्रश्नों का उत्तर केवल इसलिए नहीं चाहिए कि बैंक को नुकसान हुआ। उत्तर इसलिए भी चाहिए क्योंकि यह धन अंततः सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक का था, जिसकी विश्वसनीयता करोड़ों जमाकर्ताओं के विश्वास से जुड़ी है।
विवाद का दूसरा पक्ष और भी संवेदनशील है। बी. आर. शेट्टी भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच व्यापारिक और सामाजिक गतिविधियों में सक्रिय रहे तथा प्रधानमंत्री की यात्राओं के दौरान भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में दिखाई दिए। यही तथ्य अनेक प्रकार की आशंकाओं को जन्म देता है। किंतु लोकतांत्रिक विमर्श का दायित्व यह है कि आशंका और प्रमाण के बीच स्पष्ट रेखा बनाए रखी जाए।
अब तक उपलब्ध सार्वजनिक तथ्यों से यह सिद्ध नहीं होता कि किसी राजनीतिक निकटता के कारण बैंकिंग निर्णय प्रभावित हुए। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे मामलों में केवल “ऐसा कोई प्रमाण नहीं है” कह देना पर्याप्त नहीं होता। सार्वजनिक विश्वास तभी बनता है जब प्रक्रियाएँ पारदर्शी हों और यदि संदेह उत्पन्न हो तो उसकी स्वतंत्र जाँच भी हो।
यही कारण है कि इस पूरे प्रकरण में कुछ बुनियादी प्रश्नों की निष्पक्ष समीक्षा आवश्यक प्रतीत होती है—क्या ऋण स्वीकृति बैंकिंग मानकों के अनुरूप थी? क्या जोखिम मूल्यांकन और निगरानी प्रणाली में कोई चूक हुई? क्या बैंक के निदेशक मंडल, आंतरिक ऑडिट और नियामकीय संस्थाओं ने समय पर अपनी भूमिका निभाई? ₹5,700 करोड़ के समझौते का निर्णय किन कानूनी और वित्तीय सलाहों के आधार पर लिया गया? क्या इस समझौते से बेहतर कोई विकल्प उपलब्ध था?
यदि इन प्रश्नों की स्वतंत्र समीक्षा नहीं होती, तो भविष्य में किसी भी बड़े बैंकिंग विवाद के बाद जनता के मन में संदेह और गहरा होगा।
यहाँ एक और सिद्धांत स्मरण रखने योग्य है। किसी भी लोकतंत्र में जाँच की माँग करना और किसी को दोषी घोषित कर देना—दो अलग-अलग बातें हैं। निष्पक्ष जाँच का उद्देश्य किसी विशेष व्यक्ति या सरकार को कठघरे में खड़ा करना नहीं, बल्कि संस्थागत जवाबदेही सुनिश्चित करना होता है।
भारत की बैंकिंग प्रणाली ने अतीत में भी बड़े कॉरपोरेट ऋण संकट देखे हैं। प्रत्येक संकट के बाद सुधारों की बात हुई, लेकिन यदि वही प्रश्न बार-बार लौटते हैं, तो इसका अर्थ है कि सुधार अभी अधूरे हैं।
NMC प्रकरण भी उसी श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण अध्याय बन सकता है। यदि इसकी पारदर्शी समीक्षा होती है, तो इससे केवल एक बैंक का नहीं, बल्कि पूरी बैंकिंग व्यवस्था का विश्वास मजबूत होगा। यदि समीक्षा नहीं होती, तो संदेह तथ्यों से अधिक प्रभावशाली हो जाएंगे—और किसी भी लोकतंत्र के लिए यह स्थिति शुभ नहीं होती।
लोकतंत्र में सबसे बड़ी सुरक्षा किसी सरकार, किसी बैंक या किसी उद्योगपति की प्रतिष्ठा नहीं, बल्कि सत्य की पारदर्शी खोज है। सार्वजनिक धन से जुड़े हर बड़े निर्णय की कसौटी भी यही होनी चाहिए। इतिहास बताता है कि संस्थाएँ प्रश्नों से कमजोर नहीं होतीं; वे प्रश्नों से बचने पर कमजोर होती हैं।
मुझे लगता है कि यह विषय यहीं समाप्त नहीं होता। यदि आप चाहें, तो इस पर 2,500–3,000 शब्दों का खोजपरक विश्लेषण भी तैयार किया जा सकता है, जिसमें NMC Health का उदय, बी. आर. शेट्टी का कारोबारी विस्तार, भारतीय बैंकों का एक्सपोज़र, मुकदमों का क्रम, सेटलमेंट की पृष्ठभूमि और भविष्य के नीतिगत सबक—सभी का दस्तावेज़ी विश्लेषण किया जाए। यह आपके संपादकीय मंच के लिए अधिक प्रभावशाली सामग्री हो सकती है।
