गौतम चौधरी
हर मोमिन के दिल में पैग़ंबर मोहम्मद (ﷺ) के जीवन और चरित्र के प्रति गहरा सम्मान मौजूद है। मोमिन ही क्यों, पैग़ंबर मोहम्मद (ﷺ) के पति वे सभी प्रेम रखते हैं जिनके लिए मानवता सवार्मपरी है। सीरत-उन्नबी केवल ऐतिहासिक जीवनी या प्रेरणादायक घटनाओं का संग्रह नहीं, बल्कि रहन-सहन की वह मार्गदर्शिका है, जो दिखाती है कि अल्लाह की वाही को कैसे समझा और जीवन में लागू किया जाए। सीरत का अध्ययन इस्लाम की शिक्षाओं से जुड़ने का माध्यम है, क्योंकि पवित्र क़ुरान पैग़ंबर को “उस्वा-ए-हसना” यानी सर्वाेत्तम आदर्श कहता है। उनकी ज़िंदगी यह दिखाती है कि इस्लामी सिद्धांतों के अनुरूप कैसे जिया जाए।
सीरत की महत्ता उसकी व्यावहारिक मिसालों और व्यापक प्रासंगिकता में निहित है। पैग़ंबर एक सक्रिय और बहुआयामी व्यक्तित्व के मालिक थे। उन्होंने एक युग को प्रारंभ किया और पूरी मानवता को दिशा दी। इसलिए पैग़ंबर मोहम्मद (ﷺ) को जानना बेहद जरूरी है। एक ख़ानदान के सरबराह के रूप में उनकी पत्नियों और पोते-पोतियों के साथ व्यवहार पारिवारिक जीवन की मिसाल है। एक क़ाज़ी के रूप में उनके फ़ैसले न्याय के उत्कृष्ट नमूने हैं। एक नेता के रूप में उनके समझौते, ईमानदारी और विश्वसनीयता प्रसिद्ध है। सैन्य मामलों में उनके सिद्धांत, विशेषकर गैर-लड़ाकों को नुकसान न पहुंचाने का आदेश, नैतिक मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। उनकी ज़िंदगी “ज़िंदा क़ुरान” की तरह है, जो दिव्य सिद्धांतों को व्यवहारिक रूप देती है। सीरत क़ुरान की समझ को आसान बनाती है और उसे दैनिक जीवन में लागू करने का तरीका सिखाती है।
सीरत का एक महत्वपूर्ण पहलू न्याय (अद्ल) पर पैग़ंबर मोहम्मद (ﷺ) का जबर्दस्त ज़ोर देखने को मिलता है। एक हाकिम और लीडर के रूप में उन्होंने सामाजिक दर्जे, क़बायली पहचान या धार्मिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना पूर्ण निष्पक्षता दिखाई। एक मशहूर घटना में एक सम्मानित कबीले की महिला के गुनाह पर सिफ़ारिश की कोशिश की गई, तो उन्होंने नाराज़गी जताई और कहा कि न्याय हर हाल में बराबर होना चाहिए। उन्होंने कानून की हुकूमत पर आधारित समाज स्थापित किया, जहां मज़लूम की मदद फरीज़ा और न्याय बिल्कुल निष्पक्ष हो। यह सिद्धांत आज के विविध समाज के लिए भी उतना ही महत्वपूर्ण है, जितना उस समय था।
सीरत, औरतों के अधिकारों और सम्मान पर भी गहरी रोशनी डालती है। जाहिलियत के दौर में औरतें उपेक्षित थीं, लेकिन पैग़ंबर मोहम्मद (ﷺ) ने उनकी इज्जत और अधिकारों को स्थापित किया। वे अपनी बेग़मात से मशविरा लेते और उनकी राय की कद्र करते। ख़दीजा रज़िं. सफल औरत कारोबारी से शादी उनकी आर्थिक और सामाजिक स्वतंत्रता के सम्मान को दर्शाती है। आखिरी ख़ुत्बे में उन्होंने औरतों के साथ भलाई और इंसाफ से पेश आने की ताकीद की। सीरत में औरतों के मस्जिद जाने, कारोबार करने और सामाजिक योगदान के उदाहरण मौजूद हैं। यह आपसी सम्मान और बराबरी के मूल सिद्धांतों की ओर संकेत करता है।
पैग़ंबर की ज़िंदगी रहम और बर्दाश्त से भी भरी हुई थी। पैग़ंबर मोहम्मद (ﷺ) कभी मुस्लिम और गैर-मुस्लिम में फर्क ही नहीं करते थे। न्याय के मामले में वे दोनों को बराबर मानते थे। वे “रहमतुल्लिल-आलमीन” थे। फ़त्हे मक्का के दौरान उन्होंने अपने सताने वालों को माफ़ कर दिया था। गैर-मुस्लिम समुदायों के साथ उनके रिश्ते सहअस्तित्व और सुरक्षा पर आधारित थे। मदीना इसका उदाहरण हैं, जहां उन्होंने एक बहुलवादी समाज की स्थापना की थी। मदीने में यहूदी क़बीलों के साथ ही अन्य आस्था वालों को पूर्ण धार्मिक स्वतंत्रता और सुरक्षा मिली हुई थी। ज़िम्मियों के हक़ के बारे में उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि उनकी जान, माल और इबादतगाहें सुरक्षित रहनी चाहिए। बीमार गैर-मुस्लिम पड़ोसियों की मुलाक़ात जैसी घटनाएं उनकी रहमत का प्रमाण हैं। यह मिसाल भारत जैसे बहु-धार्मिक समाज के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसे मुस्लिम समाज में बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
सीरत, वतन से प्राकृतिक मोहब्बत को भी दर्शाती है। अंतिम वफ़ादारी ख़ालिक़ के लिए है, लेकिन इंसान का अपने जन्मस्थान से लगाव स्वाभाविक है। हिजरत के वक़्त पैग़ंबर ने मक्का के लिए अपना प्यार और रंज व्यक्त किया। उलमा इसे वतन से मुहब्बत की दीन-संगत भावना बताते हैं, जो एक मुसलमान को अपने मुल्क की तरक़्क़ी और भलाई में योगदान देने की प्रेरणा देती है। इसलिए जो मुसलमान यह सोचता है कि गैर-मुस्लिम देश उसके लिए नहीं है, यह धार्मिक रूप से सही नहीं है। इस्लाम कभी किसी को अपने देश के साथ गद्दारी की शिक्षा नहीं देता है। एक सच्चा मुसलमान मुल्क और अपनी मातृभूमि दोनों से प्रेम करता है और हर वक्त उसकी सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है।
इस तरह पैग़ंबर की ज़िंदगी आज के मुसलमानों के लिए गहरा मार्गदर्शन प्रस्तुत करती है। ख़ास कर भारत जैसे विविध और जटिल समाज पैगंबर के जीवन को बताया और यहां तक की पढ़ाया भी जाना चाहिए। न्याय, औरतों की इज़्ज़त, रहम, बर्दाश्त और वतन से मोहब्बत, ये सभी उसूल आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, जितना उस समय था। सीरत, एक कालजयी आदर्श संहिता है, जो इंसान को ईमानदारी, उद्देश्य और सामाजिक योगदान की राह दिखाता है। इन शिक्षाओं को अपनाकर मुसलमान समाज में सद्भाव, इंसाफ और पारस्परिक सम्मान को बढ़ावा दे सकते हैं। अन्य आस्था वालों को यदि इसकी जानकारी होगी तो उनके मन में जो इस्लामोफोबिया पनप गया है वह यदि दूर नहीं होगा तो कमजोर जरूर पड़ेगा।
