गौतम चौधरी
अभी हाल ही में बांग्लादेश में एक नए प्रकार के कथित लोकतंत्र समर्थित आन्दोलन में ऐसा बहुत कुछ हुआ जो समझ से पड़े है। उसमें से एक घटना कथित तौर पर ईशनिंदा का भी सामने आया है। मसलन ईशनिंदा के आरोप में एक हिंदू मज़दूर की भीड़ ने पीट-पीट कर हत्या कर दी। सच पूछिए तो यह लिंचिंग केवल एक मानव जीवन की क्षति नहीं है, इससे पूरी मानवता शर्मसार हुई है। यह एक सभ्य समाज के नैतिक विवेक के क्षरण का संकेत है। इसी से मिलती-जुलती तो नहीं लेकिन कुछ ऐसी ही घटना उत्तर प्रदेश की है। यहां एक पिता द्वारा कथित रूप से अपनी पत्नी और दो छोटी बेटियों की हत्या की कर दी गयी। यह खबर इसलिए बेहद खास हो जाती है कि एक मुसलमान ने अपनी बेटी और पत्नी की हत्या महज इसलिए कर दी कि वह तीनों बुर्क़ा पहनने से परहेज कर रही थी। इस प्रकार के कृत्य को आप क्या कहेंगे? शब्दों में इसकी व्याख्या नहीं की जा सकती है। तीन जिंदगियां-एक स्त्री और उसके बच्चे, किसी नियति या दुर्घटना से नहीं, बल्कि उस व्यक्ति के हाथों खत्म हो गयी, जिसने नियंत्रण को आस्था और क्रूरता को सम्मान समझ लिया। इस कृत्य की भयावहता निर्विवाद है, लेकिन उतना ही विचलित करने वाला यह है कि ऐसे मामलों को कितनी जल्दी धार्मिक विफलता के रूप में पेश कर दिया जाता है, जबकि सच्चाई यह है कि ये अपराध पितृसत्ता, असुरक्षा और अनियंत्रित घरेलू हिंसा से जन्म लेते हैं।
यह दोनों घटनाएं दो देशों की है लेकिन बहुत हद तक इसमें समानता है। दोनों स्थानों पर आस्था को ठेस पहुचाने की बात कही गयी और अंततोगत्वा एक अपराध ने जन्म लिया, जिसे एक सभ्य समाज कभी स्वीकार नहीं कर सकता है। चलिए इन कृत्यों को या ऐसा कहे कुकृत्यों को इस्लामिक धार्मिक नजरिए से पड़ताल करते हैं। मुस्लिम स्कॉलर मुफ्ती तुफैल खान साहब कहते हैं, ‘‘क़ुरान की कोई आयत, पैग़म्बर की कोई शिक्षा, या इस्लामी सिद्धांत किसी पुरुष को यह अधिकार नहीं देता कि वह हिंसा के ज़रिये किसी महिला के विवेक पर पहरा लगाए। उसे और उसके बच्चों की हत्या करना तो दूर की बात है। इस्लाम में बुर्क़ा, हिजाब या किसी भी प्रकार का सादा पहनावा व्यक्तिगत आस्था की अभिव्यक्ति है, प्रभुत्व थोपने का हथियार नहीं। जब कपड़े ज़बरदस्ती का औज़ार बन जाते हैं, तो वे धार्मिक नहीं रहते, राजनीतिक, बल्कि आपराधिक हो जाते हैं।’’
पुलिस जांच के अनुसार, उत्तर प्रदेश वाले मामले में आरोपी को कथित रूप से पत्नी के बिना बुर्क़ा बाहर निकलने पर आपत्ति थी और उसने इसे “इज्जत” का मामला माना। लेकिन भय पर टिकी इज़्ज़त, इज़्ज़त नहीं होती, वह नैतिकता का मुखौटा ओढ़ी हुई तानाशाही होती है। पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ ने अपने घर में कभी हिंसा के ज़रिये आस्था लागू नहीं की। क़ुरान बार-बार करुणा, सहमति और जवाबदेही की बात करता है, महिलाओं के शरीर या उनके चुनावों पर स्वामित्व की नहीं।
बांग्लादेश में इस्लाम के अपमान के एक अप्रमाणित आरोप के बाद हुई यह घटना एक बार फिर भारतीय उपमहाद्वीप को एक असहज सच्चाई का सामना करने को मजबूर कर दिया है। ईशनिंदा के आरोपों का बढ़ते हुए हिंसा को वैध ठहराने, न्याय को दरकिनार करने और कमजोर वर्गों को चुप कराने के लिए दुरुपयोग किया जा रहा है। ऐसे कृत्य अक्सर धर्म के नाम पर किए गए लेकिन वे स्वयं इस्लाम की मूल शिक्षाओं के विपरीत हैं।
दक्षिण एशिया में, विशेषकर बांग्लादेश और पाकिस्तान में, ईशनिंदा के आरोप एक खतरनाक सामाजिक हथियार बन चुके हैं। अफवाहें तेज़ी से फैलती हैं, भावनाएं भड़काई जाती हैं और भीड़ स्वयं पुलिस, न्यायाधीश, जूरी और जल्लाद की भूमिका निभाने लगती है। तथ्य सत्यापित होने या सुरक्षा उपलब्ध कराए जाने से पहले ही घंटों में परिवार तबाह कर दिए जाते हैं। अल्पसंख्यकों, असहमत लोगों या सामाजिक रूप से कमजोरों के लिए मात्र आरोप ही मौत का फरमान बन जाता है।
तुफैन साहब कहते हैं कि ‘‘लोकप्रिय धारणा के विपरीत, क़ुरान ईशनिंदा के लिए किसी सांसारिक दंड का प्रावधान नहीं करता। सदियों से अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों ने इस बात पर ज़ोर दिया है। क़ुरान स्वीकार करता है कि आस्थावान लोगों को अपमान और उपहास सहना पड़ेगा’’, “तुम अवश्य ही उन लोगों से बहुत सी तकलीफ़देह बातें सुनोगे जिन्हें तुमसे पहले किताब दी गई और बहुदेववादियों से भी, पर यदि तुम धैर्य रखो और ईश्वर का ध्यान रखो, तो यह बड़े संकल्प की बात है” (क़ुरान 3ः186)। एक अन्य आयत मुसलमानों को हिंसक प्रतिशोध के बजाय अलग हो जाने का निर्देश देती है, “और जब तुम सुनो कि ईश्वर की आयतों का इनकार किया जा रहा है और उनका मज़ाक उड़ाया जा रहा है, तो उनके साथ मत बैठो जब तक वे विषय न बदल लें” (क़ुरान 4ः140)। उल्लेखनीय है कि अपमान या उपहास से संबंधित किसी भी क़ुरानी आयत में इस प्रकार की हिंसा का कोई विधान ही नहीं है।
पैग़म्बर मुहम्मद ﷺ का जीवन मुसलमानों के लिए सबसे प्रामाणिक मार्गदर्शक है। शास्त्रीय इतिहासकारों ने ऐसे अनेक प्रसंग दर्ज किए हैं जब पैग़म्बर का व्यक्तिगत रूप से अपमान, उपहास और अपमानित किया गया। ताइफ़ में उन पर पत्थर फेंके गए, यहां तक कि वे लहूलुहान हो गए। जब दैवी प्रतिशोध का विकल्प दिया गया, तो उन्होंने इनकार किया और अपने हमलावरों के लिए दुआ की। इस्लाम के महान धर्मशास्त्री इमाम अल-ग़ज़ाली ने ज़ोर दिया कि व्यक्तिगत अपमान निजी प्रतिशोध को उचित नहीं ठहराते और नैतिक संयम एक उच्च इस्लामी गुण है। इसी तरह, कठोरपंथियों द्वारा उद्धृत किए जाने वाले इब्न तैमिय्या ने एक महत्वपूर्ण भेद स्पष्ट किया, जहाँ ईशनिंदा पर दंड मान्य भी माना गया, वह राज्य का विषय था, न्यायिक अधिकार, विधिसम्मत प्रक्रिया और स्पष्ट प्रमाण के साथ, न कि भीड़ की कार्रवाई के द्वारा न्याय। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि कई मामलों में पश्चाताप दंड को निष्प्रभावी कर सकता है।
इस मामले में क़ुरान कहता है, “किसी समुदाय के प्रति द्वेष तुम्हें अन्याय करने पर न उकसाए। न्याय करो, यही धर्मपरायणता के अधिक निकट है” (क़ुरान 5ः8)। पैग़म्बर ﷺ ने सामूहिक दंड और भावनात्मक निर्णयों के विरुद्ध चेतावनी देते हुए कहा, “संदेह से बचो, क्योंकि संदेह सबसे झूठी बात है” (बुख़ारी)। बिना मुक़दमे लिंचिंग, सार्वजनिक अपमान और हत्या न्याय, दया और जीवन की पवित्रता (हुरमत-अन-नफ़्स) जैसे इस्लामी मूल सिद्धांतों का उल्लंघन हैं। उपमहाद्वीप में ईशनिंदा क़ानूनों का दुरुपयोग इस्लामी शिक्षा का प्रतिबिंब नहीं, बल्कि सामाजिक असुरक्षा, राजनीतिक हेरफेर और धार्मिक अशिक्षा का परिणाम है। धर्म की रक्षा के लिए लोगों की हत्या आवश्यक नहीं; आवश्यक है न्याय, सत्य और करुणा की स्थापना। जो समाज भीड़ को अपराध तय करने देता है, वह कानून और धर्म, दोनों को त्याग देता है।
उत्तर प्रदेश के मामले में भी कुछ बातें इस्लामिक सिद्वांत के अनुसार समझने कोशिश की जा सकती है। मुस्लिम महिलाओं को अक्सर एक असंभव स्थिति में डाल दिया जाता है। जब हम ऐसे अपराधों के खिलाफ़ बोलती हैं, तो कहा जाता है कि हम “घर की गंदगी बाहर फैला रहे हैं।” जब ऐसी घटनाएं होती हैं, तो किसी तरह स्पष्टीकरण का बोझ भी महिलाओं पर ही डाल दिया जाता है। यह अपराध है और इसे इस्लाम से कोई लेना-देना नहीं है। यह एक प्रकार की पुरुष मानसिकता है, जो आस्था के नाम पर स्त्रियों पर अत्याचार का हथियार धर्म में ढूंढ लेता है। यह उस समाज के बारे में है जो घरेलू नियंत्रण के मामलों में समय रहते हस्तक्षेप करने में अब भी विफल रहता है। यह इस बारे में है कि महिलाओं की स्वायत्तता वे क्या पहनें, कहां जाएं, कैसे जिएं, अब भी घर की चार दीवारों के भीतर सौदेबाज़ी का विषय माना जाता है। इस त्रासदी को और असहनीय बनाता है यह तथ्य कि दो नन्ही बच्चियों की भी हत्या कर दी गई, जिनकी किसी वयस्क की विकृत “इज़्ज़त” की परिभाषा में कोई आवाज़ नहीं थी। उनकी मौतें याद दिलाती हैं कि पितृसत्ता महिलाओं पर ही नहीं रुकती, आस्था के नाम वह पूरे परिवार को गुलाम बना देती है।
धर्म, आस्था, मान्यता और विश्वास आदि मानव सभ्यता के विकास का अहम क्रम है। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। वैज्ञानिक कसौटी पर भी यह खड़ा उतरता है लेकिन जब यही एक के खिलाफ दूसरे के लिए हथियार बन जाए, राजनीति का औजान बन जाए और व्यापार के रूप में परिनत होने लगे तो सावधान हो जाना चाहिए। इसी प्रकार की नासमझ सोच ने समय-समय पर मानव सभ्यता को क्षति भी पहुंचाई है। इस मामले में सकारात्मक सोच की जरूरत है और धर्मशास्त्र की सहज समयानुकूल व्याख्या की भी जरूरत है। इस प्रकार के चरमपंथी विचार किसी के लिए भी हानिकारक है, चाहे वे अपने ही क्यों न हों।
