‘मैं क्यों पहूं कुरान’, स्वधर्म रक्षा के प्रकाश स्तम्भ गुरु रविदास जी

‘मैं क्यों पहूं कुरान’, स्वधर्म रक्षा के प्रकाश स्तम्भ गुरु रविदास जी

बीसवीं सदी के विचारक ओशो ने गुरु रविदास जी को बुद्ध पुरुषों रूपी तारों से भरे भारत के आकाश का ध्रुव तारा बताया है। वो कहते हैं कि रैदास और कबीर दोनों एक ही संत रामानंद के शिष्य हैं! रामानंद गंगोत्री हैं जिनसे कबीर और रैदास की धाराएं बही हैं। रैदास के गुरु हैं रामानंद जैसे अदभुत व्यक्ति; और रैदास की शिष्या है मीरा जैसी अदभुत नारी! इन दोनों के बीच में रैदास की चमक अनूठी है। रामानंद को लोग भूल ही गए होते अगर रैदास और कबीर न होते। जैसे फल से वृक्ष पहचाने जाते हैं वैसे शिष्यों से गुरु पहचाने जाते हैं। रैदास का अगर एक भी वचन न बचता और सिर्फ मीरा का यह कथन बचता, ‘गुरु मिल्या रैदास जी’, तो काफी था। क्योंकि जिसको मीरा गुरु कहे, वह कुछ ऐसेकृवैसे को गुरु न कह देगी। जब तक परमात्मा बिलकुल साकार न हुआ हो तब तक मीरा किसी को गुरु न कह देगी। इसलिए रैदास को मैं कहता हूं, वे भारत के संतों से भरे आकाश में ध्रुवतारा हैं।

गुरु रविदास जी भारत में उस समय पैदा हुए जब विदेशी आततायियों का शासन था और इन शासकों पर जबरन धर्मांतरण की सनक सवार थी। संत रैदास को मुसलमान बनाने से उनके लाखों भक्त भी मुसलमान बन जायेंगे ऐसा सोच कर धर्मपरिवर्तन के लिए उन पर अनेक प्रकार के दबाव आये, किन्तु संत रैदास की श्रद्धा और निष्ठा को हम अटूट पाते हैं। सदना पीर इनको मुसलमान बनाने आया था. किन्तु इनकी ईश्वर-भक्ति और आध्यत्मिक-साधना से प्रभावित होकर सदना पीर हिन्दू हो कर रामदास नाम से उनका शिष्य बन गया। एक ओर तो गुरु रविदास जी जातिगत भेद, ढोंग, कर्मकांड आदि के विरोध में संघर्ष करते हैं, किन्तु वैदिक धर्म के दार्शनिक पक्ष में अपनी पूर्ण आस्था बराबर रखते हैं।

सिकन्दर लोदी उनको मुसलमान बनाने के लिए प्रलोभन तथा दवाब दोनों की नीति अपनाता है, लोगों को उनके पास भेजता है, किन्तु उनका उत्तर सीधा-सपाट है। वे बार-बार हिन्दू धर्म में अपनी श्रद्धा, निष्ठा तथा आस्था व्यक्त करते है। उनकी दृष्टि तथा सोच स्पष्ट है –
वेद वाक्य उत्तम धरम, निर्मल वाका ज्ञान।

यह सच्चा मत छोडक़र, मैं क्यों पहूं कुरान।
स्रुति-सास्त्र-स्मृति गाई, प्राण जाय पर धरम न जाई।
कुरान बहिश्त न चाहिए, मुझको हूर हजार।
वेद धरम त्यागूं नहीं, जो गल चलै कटार।
वेद धरम है पूरण धरमा, करि कल्याण मिटावे भरमा।
सत्य सनातन वेद हैं, ज्ञान धर्म मर्याद।
जो ना जाने वेद को, वृथा करे बकवाद।

  • (हमारे साधु संत, भाग-1, पृ. 22-23)

धर्मपरिवर्तन से इन्कार करने पर सिकन्दर लोदी ने संत रैदास को कठोर दण्ड देने की धमकी दी तो उन्होंने निर्भीकता के साथ उत्तर दिया –

मैं नहिं दब्बू बाल गँवारा, गंग त्याग गहूँ ताल किनारा।
प्राण तंजू पर धर्म न देऊँ, तुमसे शाह सत्य कह देऊँ।
चोटी शिखा कबहुँ नहिं त्यागँ, वस्त्र समेत देह भल त्यागँ।
कंठ कृपाण का करौ प्रहारा, चाहें डुबावो सिन्धु मंझारा॥

मुस्लिम आतंक के उस कठिन काल में भी संत रैदास ने सच्ची भक्ति की निर्मल गंगा प्रवाहित कर दी। उन्होंने सैकड़ों भक्ति पदों की रचना की और उन पदों को भाव विभोर होकर वे गाते थे। वे अपने इष्ट को गोविन्द, केसव, राम, कान्हा, बनवारी, कृष्ण-मुरारी, दीनदयाल, नरहरि, गोपाल, माधो आदि विविध नामों से सम्बोधित करते हैं, किन्तु उनका ईश्वर मन्दिर में मूर्ति की तरह विराजित भगवान् से भिन्न है। वह तो घट-घट वासी निराकार ब्रह्म की सुन्दर प्रतीति है। गुरु रैदास कहते हैं कि राम के बिना इस जंजाल से मुक्ति कठिन है –

राम बिन संसै गांठिन छुटै।।
काम क्रोध मद मोह माया, इन पंचनि मिलि लुटे।
(वही, पृ. 50)

भक्त रैदास परमहंस की निस्पृह स्थिति में पहुँच गए। वे कहते हैं कि मैंने संसार के सब रिश्ते-नाते तोड़ दिये हैं, अब तो केवल प्रभुचरणों का ही सहारा है –

मैं हरि प्रीति सबनि सौं तोरी,
सब सौं तोरी तुम्हें संग जोरी।
सब परिहरि मैं तुमहीं आसा, मन बचन क्रम कहै रैदासा।।

  • (हमारे साधु संत, भाग-1, पृ. 51)

भक्त रैदास के अभीष्ट राम हैं, सर्वव्यापी राम। उसी भक्ति के सहारे वे जीवन के सारे कार्य कर रहे हैं। उनके सभी कार्य राम को समर्पित हैं। उनका अपना कुछ भी नहीं, जो भी कुछ है वह राम का ही है –
राम नाम धन पायौ तार्थे, सहज करूँ व्यौहार रे।
राम नाम हम लादयौ ताथै, विष लाद्यौ संसार रे॥

  • (हमारे साधु संत, भाग-1,प.79)

भक्ति वह मार्ग है जो धीरे-धीरे साधक को प्रभु से जोड़ता है और भक्त का अधिकार अपने प्रभु पर बढ़ता चलता है। भक्ति की पराकाष्ठा देखिये कि रैदास कह उठते है कि भगवान् आपकी सार्थकता के लिए हम आवश्यक हैं। भक्ति से परिपूर्ण रैदास अधिकार पूर्वक अपने प्रभु से जुड़े हुए हैं और कहते हैं –

अब कैसे छूटे राम रट लागी।
प्रभुजी तुम चन्दन हम पानी।
जाकी अंग-अंग बास समानी
प्रभुजी तुम घन वन हम मोरा।
जैसे चितवत चंद चकोरा
प्रभुजी तुम मोती हम धागा।
जैसे सोनहिं मिलत सोहागा।
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै रैदासा॥

  • (बूंद मिले सागर में, पृ. 24)

अर्थात् राम नाम की जो रट लगी है वह कैसे और क्यों छूटेगी, यह निरंतरता कैसे टूटेगी, जब ध्यान है कि हम प्रभु की सार्थकता के लिए सार्थक हैं। प्रभुजी आप चन्दन हैं तो हम पानी हैं, हम आपके साथ मिलकर घिसेंगे। तभी तो आपकी सुगन्ध सभी ओर फैलेगी। आप जल भरे मेघ हैं तो हम मोर हैं. हमारे नृत्य करने से ही तो आपकी शोभा होती है। आप चन्द्रमा हैं तो हम चकोर पक्षी हैं। चकोर की आँखें ही चन्द्रमा की शीतलता का अनुभव करती हैं। प्रभुजी आप दीपक हैं तो हम उसकी बाती हैं, बाती के बिना कैसे प्रकाश देगा दीपक? आप मोती हैं तो हम धागा हैं किन्तु बिना धागा प्रभु के गले का हार कैसे बनेगा? आप स्वर्ण हैं तो हम सुहागा हैं। हमारे बिना सोना चमकेगा कैसे? प्रभुजी आप स्वामी हैं और हम दास हैं। रैदास ने ऐसी भक्ति करी है कि अब वह प्रभु के साथ एकरूप हो गया है। यद्यपि पानी, बाती, धागा, सुहागा आदि मूल्यहीन हैं, किन्तु इनके बिना चन्दन, दीपक, मोती, स्वर्ण आदि अपना अस्तित्व नहीं बना पाते।

संत रैदास प्रभु के साथ घुल-मिल गए, एकाकार हो गए। भक्त रैदास ने ऐसा सम्बन्ध जोड़ा हैकि प्रभु को यदि प्रभु बनना है तो भक्त रैदास साथ रहेगा, एक क्षण को भी रैदास प्रभु को छोडऩा नहीं चाहते। गुरु रैदास प्रभु को कहते हैं कि मैं तुमको अब नहीं छोड़ेंगा और अब आप भी मुझसे दूर नहीं जा सकते। एक पद में वे गाते हैं –

जो हम बाँधे मोह फाँस हम प्रेम बंधनि तुम बांधे।
पने छूटन को जतन करह हम छूटे तुम आराधे॥

  • (संत और सूफी साहित्य, पृ. 122)

अर्थात ‘हे माधव! यदि तुमने मुझे संसार के मोह में बाँध रखा है तो मैंने भी अपने प्रेम से बाँध रखा है। मैं तो तुम्हारी आराधना करके बंधन मक्त हो गया हूँ (मेरा भवपाश अवश्य कटेगा), अब प्रभु आप अपने छूटने का उपाय से आप कैसे छूटोगे? गुरु रैदास ने अपने जीवन में यह सिद्ध कर दिया कि त्याग, समर्पण और भगवद्भक्ति से व्यक्ति ऊँचा उठता चलता है और फिर उसकी जाति महत्वहीन हो जाती है।

गुरु रैदास का भक्तिभाव देखकर काशी नरेश उनके शिष्य बन गए। चित्तौड़ के महाराणा उदय सिंह की पत्नी झाली रानी संत रैदास की शिष्या हो गयीं। कुछ इतिहासकार उस झाली रानी को राणा कुम्भा की माँ तथा कोई उसको राणा सांगा की धर्मपत्नी समझते हैं। संत नाभादास ने भक्तमाल में इसका वर्णन किया है –

बसत चित्तौर माँझ रानी एक झाली नाम,
नाम बिन काम खालि आनि शिष्य भई है॥
-(संत रैदास, पृ. 23)

देशभर में प्रतिष्ठा प्राप्त, ऐश्वर्य, शक्ति-सम्पन्न चित्तौड़ की कुलवधू मीरा ने भी रैदास को ही अपना गुरु स्वीकार किया। कृष्णभक्ति में आकंठ डूबी मीरा अनेक प्रकार का विरोध सहन करती हुई गुरु रैदास की शरण में आ गयीं। उन्हीं से मीरा ने आशीर्वाद पाया और भक्ति में लीन हो गईं। मीरा और भक्त रैदास का मिलन सगुण और निर्गुण भक्ति-धाराओं का मिलन तो है ही, साथ ही साथ जातिगत आधार पर भेद मानने वालों को एक सुन्दर अनुकरणीय सीख भी है।

लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, पंजाब प्रदेश जागरण पत्रिका, पथिक संदेश के संपादक मंडल सदस्य हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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