बाबरी मस्जिद का मामला सुलझाया जा चुका है, कृपया उस घाव को कुरेद सामाजिक सौहार्द न बिगाड़िए

बाबरी मस्जिद का मामला सुलझाया जा चुका है, कृपया उस घाव को कुरेद सामाजिक सौहार्द न बिगाड़िए

बाबरी मस्जिद मामला सुलझ चुका है। जिस स्थान पर मुगल आक्रांता बाबर के सेनापति मीर बाकी ने कथित तौर पर एक मस्जिद तामीर करवाई उस स्थान पर आज भगवान श्री राम का भव्य मंदिर बन चुका है। दअरसल, उस स्थान को लेकर हिन्दू पक्षकारों का दावा था कि मीर बाकी ने भगवान श्री राम के जन्म स्थान पर, जहां पहले से एक मंदिर बना था उसे तोड़ कर वहां मस्जिद बनवाई थी। खैर मामला लंबा चला और उस स्थान पर कई संघर्ष भी बताए जाते हैं। हाल के वर्षों में भी संघर्ष देखे गए। बाबरी मस्जिद विावाद में हजारों लोगों ने जान गवाई और देश में ही नहीं पड़ोस के पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में भी बड़े-बड़े दंगे हुए। खैर, वर्ष 2019 में, भारत के सर्वाेच्च न्यायालय ने विवादित भूमि और ढांचे का निराकरण कर दिया। मामला सुलक्ष गया। दोनों पक्ष मान गए। बाबरी ढांचे के स्थान पर राम मंदिर बनकर तैयार हो चुका है और माननीय न्यायालय के निर्देश के अनुसार एक वैकल्पिक स्थल पर नई मस्जिद की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी गयी। हालांकि मस्जिद का शिलान्यास नहीं हो पाया है लेकिन उस दिशा में काम चालू बताया जा रहा है। बावजूद इसके तृणमूल कांग्रेस से निष्कासित पूर्व विधायक हुमायूं कबीर ने अभी हाल ही में बाबरी मस्जिद के निर्माण की घोषणा की है, जिससे राजनीतिक माहौल ही नहीं गरमा है अपितु एक बार फिर से सामाजिक सौहार्द बिगडने की पूरी संभावना है।

इस मामले को लेकर भारतीय सर्वाेच्च न्यायालय ने बेहद महत्वपूर्ण फैसला पहले सुना चुकी है। बावजूद इसके 6 दिसंबर 2025 को पश्चिम बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के नेता हुमायूं कबीर ने बेलडांगा में तथाकथित “नई बाबरी मस्जिद” की आधारशिला रखी और इसे 1992 में ढहाई गई मस्जिद की प्रतिकृति बताया। यह कार्यक्रम उसी तारीख को हुआ जिस दिन मस्जिद का विध्वंस हुआ था और एक दिन पहले कलकत्ता उच्च न्यायालय ने निर्माण पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था। फिर भी यह कदम धार्मिक आस्था से अधिक राजनीतिक अस्तित्व बचाने का प्रयास प्रतीत होता है, खासकर तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) से उनके निलंबन और नई पार्टी जनता उन्नयन पार्टी के गठन के बाद।

कबीर का राजनीतिक जीवन दल-बदल से भरा रहा है। 2011 में कांग्रेस विधायक चुने जाने के बाद वे टीएमसी में गए, फिर 2018 में भाजपा में शामिल हो गए। बाद में 2021 में फिर टीएमसी में लौटकर चुनाव जीते। विकास कार्यों की उल्लेखनीय उपलब्धियों के अभाव में उन्होंने भावनात्मक धार्मिक मुद्दे को राजनीतिक आधार बनाने की कोशिश की है। बताया जाता है कि समर्थकों ने ईंटें और धन दान किया लेकिन यह परियोजना आगामी चुनावों को ध्यान में रखकर शुरू की गई बतायी जा रही है। मुस्लिम बाहुल जिले में बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच यह कदम वोट बैंक मजबूत करने की रणनीति जैसा दिखता है।

इसी तरह हैदराबाद में मोहम्मद मुश्ताक मलिक ने भी बाबरी मस्जिद की तर्ज पर “स्मारक मस्जिद” बनाने की घोषणा की है। ऐसे प्रयास उस समय साम्प्रदायिक भावनाओं को फिर से भड़का सकते हैं, जब अयोध्या विवाद कानूनी रूप से समाप्त हो चुका है। 1528 में निर्मित बाबरी मस्जिद 6 दिसंबर 1992 को ढहा दी गई थी, जिसके बाद देशभर में दंगे हुए और दशकों तक मुकदमेबाजी चली। 2019 में सर्वाेच्च न्यायालय ने विवादित भूमि राम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दू पक्षकारों को सौंपते हुए अयोध्या में ही पांच एकड़ वैकल्पिक भूमि मस्जिद के लिए देने का निर्देश दिया। जनवरी 2024 में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के साथ विवाद का अंत हो गया।

हालांकि मस्जिद के लिए दी गई भूमि पर 2026 की शुरुआत तक निर्माण शुरू नहीं हुआ है। प्रशासनिक देरी और संसाधनों की कमी इसका कारण बताया जा रहा है। ऐसे में वैधानिक रूप से आवंटित भूमि पर निर्माण के बजाय अन्य स्थानों पर प्रतिकृति बनाना साम्प्रदायिक संवेदनाओं को फिर से उभार सकता है। 6 दिसंबर अब भी भावनात्मक रूप से संवेदनशील तारीख है। इतिहास बताता है कि लंबे आंदोलन ने समाज को ध्रुवीकृत किया। आज भारतीय मुसलमान शिक्षा, रोजगार और गरीबी जैसी चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। प्रतीकात्मक परियोजनाएं इन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती है। राजनीतिक लाभ के लिए पुराने घावों को कुरेदना समाज में विभाजन बढ़ा सकता है। बाबरी प्रकरण से यह सीख मिलती है कि कानूनी फैसले को स्वीकार कर शांति और विकास पर ध्यान देना ही उचित मार्ग है।

सर्वाेच्च न्यायालय के निर्णय के बाद अब प्राथमिकता सामाजिक सद्भाव और प्रगति होनी चाहिए। प्रतिकृति निर्माण के प्रयास अतीत की स्मृतियों को जीवित रख सकते हैं, जबकि भारत का बहुलतावादी लोकतंत्र साझा भविष्य के निर्माण से ही मजबूत होगा। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रतिक्रिया केवल विवाद को जन्म देता है। इससे विकास की संभावना क्षीण होती है। किसी चिंतक ने कहा है कि यदि आप अतीत पर गोली दागेंगे तो भविष्य आप पर गोले बरसाएगा। इससे हमारा वर्तमान खराब होगा। सह अस्तित्व में ही प्रगति प्रस्फुटित होता है। बाबरी विवाद को जिंदा रखने का कोई मतलब नहीं है। राम मंदिर के साथ ही यह विवाद समाप्त हो चुका है। हां, अयोध्या के वैकल्पिक भूमि पर सरकार को सहयोग कर मस्जिद बनवाने की दिशा में पहल करनी चाहिए। दूसरी ओर जो लोग अपनी राजनीति चमकाने मात्र के लिए इस प्रकार की घोषणा कर समाज को विभाजित करने की कोशिश कर रहे हैं उन्हें भी सावधान हो जाना चाहिए।

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