भारत-अमेरिका टैरिफ डील : जश्न मनाने में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए

भारत-अमेरिका टैरिफ डील : जश्न मनाने में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए

ट्रम्प का दूसरा बड़ा दावा है—500 अरब डॉलर की अमेरिकी खरीद। ज़रा आंकड़े देखिए। 2024 में भारत–अमेरिका कुल द्विपक्षीय व्यापार लगभग 212 अरब डॉलर था। उसी साल भारत ने अमेरिका से सिर्फ 41.5 अरब डॉलर का सामान खरीदा और सेवाओं का आयात करीब 41.8 अरब डॉलर रहा—यानी कुल मिलाकर लगभग 83 अरब डॉलर। अब सोचिए—83 अरब से सीधे 500 अरब डॉलर। लगभग 500% की छलांग।

जानकारों का कहना है कि भारत द्वारा सभी टैरिफ शून्य करना असंभव सा लगता है, खासकर कृषि जैसे संवेदनशील क्षेत्रों में। भारत का इतिहास बताता है कि वह दोहा दौर से लेकर अब तक कृषि बाज़ार खोलने में हमेशा बेहद सतर्क रहा है। संभावना यही है कि भारत कुछ चुनिंदा अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ घटाएगा, जिसे ट्रम्प घरेलू राजनीति में “जीरो टैरिफ” की बड़ी जीत की तरह पेश करेंगे।

रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल

यह समझौता सिर्फ व्यापार नहीं, भू-राजनीति से भी जुड़ा है। अगर भारत सचमुच रूसी तेल से दूरी बनाता है और अमेरिकी ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाता है, तो इसका सीधा असर उसकी रणनीतिक स्वायत्तता—वह नीति, जिसके तहत भारत किसी एक गुट में पूरी तरह नहीं बंधता, पर पड़ेगा। कांग्रेस ने भी इसी बिंदु पर सवाल उठाया है—क्या भारत धीरे-धीरे अमेरिकी खेमे की ओर झुक रहा है?

यह भी याद रखना चाहिए कि हाल ही में भारत ने यूरोपीय संघ से ट्रेड डील की और उससे पहले ब्रिटेन के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया। माना जा रहा है कि इन्हीं समझौतों ने ट्रम्प पर भारत के साथ जल्दी सौदा करने का दबाव बनाया।

बाज़ारों को राहत, लेकिन किसान और लघु उद्योग?

इस घोषणा से रुपये, शेयर बाज़ार और बॉन्ड मार्केट पर लटकी अनिश्चितता की तलवार ज़रूर हटी है। निवेशकों को संकेत मिला है कि अमेरिका–भारत रिश्तों में ठंडापन कम होगा। लेकिन ज़मीनी स्तर पर सवाल बने हुए हैं।

अगर भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए दरवाज़े खोलता है, तो इसका असर घरेलू किसानों पर पड़ेगा। सस्ती अमेरिकी दालें, मक्का या डेयरी उत्पाद भारतीय कृषि बाज़ार को झटका दे सकते हैं। इसी तरह, अगर “बाय अमेरिकन” नीति के तहत बड़े पैमाने पर आयात बढ़ता है, तो भारतीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यम सेक्टर पर दबाव आ सकता है।

दोस्ती की कूटनीति बनाम लिखित समझौता

अमेरिकी राजदूत ने कहा कि यह डील ट्रम्प और मोदी की “मज़बूत दोस्ती” का नतीजा है और कुछ तकनीकी दस्तावेज़ों पर जल्द दस्तखत होंगे। यही सबसे अहम बात है—अभी तक कोई संयुक्त लिखित समझौता सार्वजनिक नहीं हुआ है।

इसलिए जब तक यह साफ़ न हो जाए कि किन उत्पादों पर टैरिफ घटेगा, समय-सीमा क्या होगी, कृषि जैसे संवेदनशील सेक्टर शामिल होंगे या नहीं, और रूस से तेल पर भारत की वास्तविक प्रतिबद्धता क्या है—तब तक इसे अंतिम समझौता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक घोषणा ही माना जाना चाहिए।


इस पूरे घटनाक्रम को अगर एक वाक्य में समेटें, तो यही कहा जा सकता है—भारत को जश्न मनाने में जल्दबाज़ी नहीं करनी चाहिए। 18% टैरिफ निश्चित रूप से राहत है। इससे निर्यात को सहारा मिलेगा और निवेशकों का भरोसा बढ़ेगा। लेकिन 500 अरब डॉलर की खरीद, शून्य टैरिफ और रूसी तेल पर कथित प्रतिबद्धता—ये सब अभी दावों के स्तर पर हैं। असली पेंच डिटेल में छिपा है।

भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए यह वक्त भावनाओं का नहीं, ठंडे दिमाग से हिसाब लगाने का है कि इस सौदे से हमें कितना मिल रहा है और हम कितना दे रहे हैं। जब तक संयुक्त बयान और लिखित शर्तें सामने न आ जाएं, इसे ऐतिहासिक जीत कहना जल्दबाज़ी होगी। फिलहाल यह एक कूटनीतिक संकेत है—समझौता नहीं। और ऐसे संकेतों पर तालियां नहीं, सावधानी ज़्यादा ज़रूरी होती है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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