कौन हैं ये कुर्द और भारत के साथ क्या है इनका संबंध?

कौन हैं ये कुर्द और भारत के साथ क्या है इनका संबंध?

कुर्द समुदाय का संबंध आर्य जाति से बताया जाता है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि कुर्द जाति के लोग आज से चार हजार वर्ष पहले भारत के उत्तर-पश्चिम भाग से पलायन कर कुर्दिस्तान वाले इलाके में जा कर बस गए थे। बाद में उसमें से अधिकतर कुर्द उत्तर पश्चिम तथा उरूमिये नदी के पूर्व की ओर पलायन कर गए। तख़्ते जमशीद का हवाला देते हुए कुछ इतिहासकारों का मत है कि दारयूश के शिलालेख के अनुसार माद जाति के लोग वर्ष 550 ईसा पूर्व में हख़ामनेशी शासन के अधीन थे। माद जाति को कुर्द का ही अंग बताया जाता है। यही नहीं लगभग प्रत्येक शताब्दियों में कुर्द भारत में किसी न किसी रूप में आते रहे हैं।

यही नहीं कुर्दिस्तान नेशनल कांग्रेस यानी (KNK) की कार्यकारी परिषद की सदस्य नीलूफ़र कोच अपने एक आलेख के माध्यम से यह बताती हैं कि कुर्द मूल रूप से मेसोपोटामिया की सभ्यता के पारंपरिक संवाहक हैं। नीलूफर कोच कहती बताती हैं कि भारत और कुर्दों के बीच बहुत समानता है। भारतीय और कुर्दी भाषा में कई समानताएं हैं क्योंकि दोनों एक ही परिवार की भाषा है। भाषा के व्यंजन और क्रिया पद की समानता यह दर्शाती है कि दोनों समुदाय किसी समय एक रहा होगा या दोनों के बीच कोई सांस्कृतिक आदान-प्रदान हुआ होगा। कुर्दी नेता बताती हैं कि भारत और कुर्दों के सांस्कृतिक मूल्य भी लगभग एक जैसे हैं साथ ही दोनों का जीवन दर्शन, जिसे सहअस्तित्व कहा जाता है वह एक जैसा है।

इस संदर्भ में, कुर्द जैसे पुराने सहयोगी भारत के लिए पश्चिम एशिया के पड़ोसी क्षेत्र को और अधिक व्यापक तथा गहन समझ विकसित करने में सहायक हो सकते हैं। इस अर्थ में, तुर्की, सीरिया, ईरान, इराक और प्रवासी क्षेत्रों में रहने वाले 55 मिलियन से अधिक कुर्दों के साथ संबंध विकसित करना क्षेत्र के चार सबसे महत्वपूर्ण देशों के साथ संवाद को विस्तार देना और मजबूत करना है। लेकिन कुर्द कौन हैं, यह पुराना पड़ोसी जिसे भारत आज धीरे-धीरे फिर से पहचान रहा है?

मध्य-पूर्व के पहाड़ी क्षेत्रों में बसने वाला कुर्द समुदाय केवल तुर्की, इराक, ईरान और सीरिया तक सीमित नहीं रहा है। इतिहास के विभिन्न चरणों में कुर्दों के कुछ समूह भारतीय उपमहाद्वीप तक भी पहुँचे और यहाँ की राजनीति, सैन्य व्यवस्था तथा प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। भारत और कुर्दों के संबंध मुख्यतः मध्यकालीन इस्लामी साम्राज्यों, सैनिक सेवाओं और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से विकसित हुए।

कुर्द मूलतः पश्चिमी एशिया के उस क्षेत्र से आते हैं जिसे सांस्कृतिक रूप से “कुर्दिस्तान” कहा जाता है। इस क्षेत्र के लोग ऐतिहासिक रूप से योद्धा और प्रशासक के रूप में प्रसिद्ध रहे। मध्यकाल में जब मध्य-पूर्व और मध्य एशिया के कई समुदाय व्यापार, सैनिक सेवा और धार्मिक कारणों से भारत की ओर आए, तब कुछ कुर्द परिवार भी भारतीय उपमहाद्वीप में बस गए। विशेष रूप से दिल्ली सल्तनत और बाद के अफ़ग़ान शासकों के दौर में उनकी उपस्थिति दिखाई देती है।

भारत के इतिहास में कुर्द मूल के सबसे प्रसिद्ध व्यक्तियों में से एक Sher Shah Suri थे। वे मूल रूप से एक अफ़ग़ान-कुर्द वंश से जुड़े माने जाते हैं और उन्होंने 1540 में Humayun को हराकर उत्तर भारत में Sur Empire की स्थापना की। शेरशाह सूरी ने प्रशासनिक और आर्थिक सुधारों की एक श्रृंखला लागू की, जिनमें भूमि व्यवस्था, मुद्रा सुधार और सड़कों का विकास शामिल था। उनके द्वारा मरंमत करवायी गई प्रसिद्ध सड़क Grand Trunk Road भारतीय उपमहाद्वीप की सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक सड़कों में से एक मानी जाती है।

मुग़ल काल में भी कुर्द मूल के कई सैनिक, प्रशासक और विद्वान भारत आए। उस समय मध्य-पूर्व से आने वाले मुसलमानों में अफ़ग़ान, तुर्क, फ़ारसी और कुर्द समूह शामिल थे। कई कुर्द परिवार उत्तर भारत के शहरों जैसे लखनऊ, दिल्ली और बिहार के कुछ हिस्सों में बस गए। समय के साथ ये परिवार स्थानीय समाज में घुल-मिल गए, लेकिन अपनी मूल पहचान और वंशावली की स्मृति बनाए रखी।

कुर्दों और भारत के संबंध केवल राजनीतिक या सैन्य स्तर तक सीमित नहीं थे। धार्मिक और बौद्धिक संपर्क भी महत्वपूर्ण रहे। सूफी परंपरा के माध्यम से पश्चिमी एशिया और भारतीय उपमहाद्वीप के बीच विचारों का आदान-प्रदान हुआ। कुछ कुर्द सूफी संत और विद्वान भारत आए और यहाँ की आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़े।

आधुनिक काल में भी भारत और कुर्द समुदाय के बीच सांस्कृतिक और राजनीतिक संपर्क बने रहे हैं। भारत में पढ़ने आने वाले इराकी और ईरानी कुर्द छात्रों की संख्या समय-समय पर बढ़ती रही है। इसके अलावा भारत की विदेश नीति सामान्यतः मध्य-पूर्व के सभी समुदायों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखने पर केंद्रित रही है।

समग्र रूप से देखा जाए तो कुर्दों और भारत के संबंध कई शताब्दियों पुराने हैं। यह संबंध केवल प्रवास या सैनिक सेवा तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रशासन, संस्कृति और विचारों के आदान-प्रदान तक फैला हुआ है। इस प्रकार कुर्द समुदाय का इतिहास भारतीय उपमहाद्वीप की बहुस्तरीय और बहुसांस्कृतिक ऐतिहासिक परंपरा का एक रोचक अध्याय भी प्रस्तुत करता है।

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