देशभक्त और जुनूनी राजा महेंद्र प्रताप सिंह को आप कितना जानते हैं?

देशभक्त और जुनूनी राजा महेंद्र प्रताप सिंह को आप कितना जानते हैं?

मुरसान (हाथरस) के राजा महेंद्र प्रताप सिंह की उपलब्धि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अफगानिस्तान में ‘भारत की निर्वासित सरकार’ की स्थापना और विदेशों में रहकर भारत की स्वतंत्रता के संघर्ष की परिस्थितियों का निर्माण और लोगों को जागरूक किया जाना, देश को ब्रिटिश गुलामी से स्वतंत्रता दिलाने की जोत जलाए रखना है।

इस हेतु उन्होंने जर्मनी के शासक कैसर विल्हेम द्वितीय, सोवियत रूस के क्रांतिकारी नेताओं व्लादिमीर इल्यिच लेनिन तथा ट्राटस्की और जापान के उच्च नेतृत्व के लोगों से भी भेंट कर उनका समर्थन प्राप्त करने के प्रयास किए। लगभग तीन दशकों तक विश्व के विभिन्न भागों में प्रवासी भारतीयों को स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान के लिए प्रेरित करने की भावना मुख्य रूप से राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने जागृत की थी। अंतरराष्ट्रीय फलक पर उनका कार्यक्षेत्र व्यापक रहा, पर यह मुख्य रूप से जापान और अफगानिस्तान रहा, जहाँ से वह इस ‘निर्वासित सरकार’ का संचालन किया करते थे। इस दौरान वह संयुक्त राज्य अमेरिका सहित अन्य देशों में भी विभिन्न फोरम के मंचों का उपयोग कर लोगों को जागरूक बनाते और स्व-निर्वासन की इस अवधि में जनचेतना फैलाने के लिए पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित करते और बैठकों का आयोजन करते थे।

राजनीतिक और सामाजिक क्षेत्र में सामाजिक, राजनीतिक और स्वतंत्रता संग्राम के पुरोधा के रूप में अर्जित उपलब्धियों से ख्याति अर्जित करने वाले महेंद्र प्रताप सिंह का जन्म मुरसान के राजा घनश्याम सिंह के राजपरिवार में हुआ था। तत्कालीन संयुक्त प्रांत की हाथरस रियासत के राजा हरनारायण सिंह को कोई पुत्र नहीं था। अतरू उन्होंने राजा घनश्याम सिंह के तीसरे पुत्र खड़क सिंह उर्फ महेंद्र प्रताप को गोद लिया था। इन् परिस्थितियों में महेंद्र प्रताप को हाथरस राज्य की विरासत मिली। हाथरस राज्य का वृन्दावन में विशाल राजमहल था, उसमें रह कर ही राजा महेंद्र प्रताप का आरंभिक जीवन व्यतीत हुआ।

पढ़ाई के दौरान ही सन् 1901 में राजकुमार महेंद्र प्रताप का जींद रियासत की राजकुमारी के साथ धूमधाम से विवाह सम्पन्न हुआ। महेंद्र प्रताप सिंह ने सन् 1906 में पत्नी के साथ विश्व भ्रमण किया। वह जापान के औद्योगिक तथा क्रांतिकारी विकास से प्रभावित थे। आरंभिक रूप से उनका मानना था कि राष्ट्र निर्माण में औद्योगीकरण की सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका है, और उसकी कुंजी केवल शिक्षा के माध्यम से मिल सकती है। इस उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए, भारत को शैक्षिक क्षेत्र में यूरोपीय राष्ट्रों के समकक्ष लाने के लिए अपने वृंदावन स्थित विशाल महल को प्रेम महाविद्यालय के नाम से एक तकनीकी कॉलेज में परिवर्तित करने हेतु सौंप दिया था। उन्होंने बाद में जन्मे अपने बेटे का नाम भी प्रेम रखा था। वह इस स्थान को अपने बेटे की तरह पल्लवित होते देखना चाहते थे।

उल्लेखनीय है कि इस महाविद्यालय को उत्तर भारत का निजी क्षेत्र का पहला तकनीकी कॉलेज होने का गौरव मिला था। अतिरिक्त आर्थिक संसाधन जुटाने के लिए महेंद्र प्रताप सिंह ने अपनी रियासत के पाँच गाँवों के राजस्व की आय को भी इस शिक्षण संस्था को दे दिया था। उन्होंने प्रेम महाविद्यालय को एक स्वतंत्र शिक्षण संस्था के रूप में विकसित किया जिसका उद्देश्य जाति, संप्रदाय धर्म और मत-मतांतर के भेद से इतर देश के हर क्षेत्र के भारतीय नवयुवकों को स्वस्थ, स्वतंत्र और प्रेमल नागरिक और तकनीकी रूप से सबल बनने की शिक्षा देना था। उपनिवेशवाद के चुनौतीपूर्ण समय में प्रेम महाविद्यालय की स्थापना के उनके उद्देश्य के पीछे युवा वर्ग में एकता, भ्रातृ-भाव, देश-प्रेम और अंततः स्वाधीनता के साथ कौशल विकास विकसित कराने की भी भावना प्रबल रही थी।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह जाति, धर्म और संप्रदाय के पूर्वाग्रहों और अस्पृश्यता जैसी कुरीतियों के घोर विरोधी थे। उन्होंने जीवनपर्यंत तथाकथित अस्पृश्य कहे जाने वाले वर्ग के लोगों के उद्धार और उन्हें मुख्यधारा में शामिल कराने के लिए गंभीर प्रयास किए। वह विभिन्न संप्रदायों के मध्य सौहार्दपूर्ण संबंधों के प्रवर्तक थे। सार्वजनिक जीवन में राजा महेंद्र प्रताप सिंह का दृष्टिकोण व्यावहारिक था, तथा वह भारत की सामाजिक और राजनीतिक क्रांति के लिए विध्वंसकारी उपायों का उपयोग किये जाने की नीतियों से असहमत थे। आयुधों का उपयोग और नरसंहार के साधनों से स्वाधीनता प्राप्त करना उनकी दृष्टि में एक पाप की तरह था।

महेंद्र प्रताप सिंह बाद के दिनों में श्विश्व संघश् की अपनी विचारधारा, और उसकी प्राप्ति के स्वप्न के प्रति अधिक समर्पित हो गए थे। उन्होंने यह भी ध्यान रखा कि उनके उपनिवेश विरोधी आंदोलनों और विचारों से उन्हें जापान अथवा जर्मनी समर्थक न समझा जाए। वह एक तार्किक भारतीय राष्ट्रवादी थे जो यद्यपि सोवियत संघ से प्रभावित अवश्य थे परंतु काफी दिनों के आकलन के बाद उन्हें इस बात पर संशय हो चला था कि क्या उस शक्तिशाली राष्ट्र के पास भारत की मुक्ति मिशन का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त सामग्री और इच्छा शक्ति बनी हुई है? विश्व शांति, सद्भावना और संघर्ष के अपने प्रयासों की मान्यता के रूप में वर्ष 1932 में राजा महेंद्र प्रताप सिंह को नोबेल के शांति पुरस्कार के लिए नामांकित भी किया गया था। उनके नामांकनकर्ता स्वीडन निवासी एन.ए. नीलसन, जो व्यवसाय से एक चिकित्सक और स्थायी अंतर्राष्ट्रीय शांति ब्यूरो आयोग के सदस्य थे, ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष में उनकी उपलब्धियों को उत्कृष्ट बताते हुए विश्व संघ और शांति के उनके प्रयासों को रेखांकित किया था।

ब्रिटिश राज के भारत में अंतिम दौर में 1946 में जब लगातार राजनीतिक दबावों के बाद राजा महेंद्र प्रताप सिंह की भारत लौटने की परिस्थितियाँ बनीं तो उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ। वह स्वतंत्रता प्राप्ति के संघर्ष और सामाजिक जीवन को उन्नत बनाने के अपने प्रयासों में जुट गए। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस दल के सदस्य होते हुए भी दल से लोकसभा चुनाव लड़ने के प्रस्ताव को इसलिए ठुकरा दिया कि दलगत प्रतिबद्धता के कारण उन्हें संसद में अपनी अंतरात्मा की आवाज को उठाने में असहजता हुई होती। उन्होंने मथुरा से एक निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 1957 का लोकसभा चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उन्होंने काँग्रेस प्रत्याशी चौधरी दिगंबर सिंह और तत्कालीन भारतीय जनसंघ के नेता अटल बिहारी वाजपेयी को पराजित किया था।

सांसद के रूप में राजा महेंद्र प्रताप सिंह ने आम जनता के मुद्दे प्रखरता से उठाए। उन्होंने लोगों की ज्वलंत समस्याओं के निराकरण के लिए सरकार को कठघरे में खड़ा करने से कभी संकोच नहीं किया, पर वह मात्र आलोचक या सरकार विरोधी नहीं थे। उन्होंने देश में विभिन्न क्षेत्रों में मौजूद समस्याओं के निदान के उपाय भी सुझाए और हमेशा सकारात्मक भूमिका का निर्वहन किया। एक वर्ग उन्हें कल्पनावादी या ‘यूटोपियन’ कहता था, पर सच यह है कि उस समय की उनकी सोच जो विश्व बंधुत्व और सौहार्द पर आधारित थी, वह ‘सर्व धर्म समभाव’ की नीति थी, और देश तथा वैश्विक समाज के हर वर्ग के हित में, उन लोगों के उन्नयन के लिए थी।

राजा महेंद्र प्रताप सिंह एक राजा होकर भी फकीर बने रहे, क्योंकि उन्होंने अपनी पारिवारिक संपत्ति या तो शिक्षण संस्थाओं और सामाजिक संगठनों के नाम कर दी, अथवा जरूरतमन्द लोगों को उपयोगार्थ दी। वह जीवन भर सरलता, निस्वार्थता, धर्मनिरपेक्षता और सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी का उदाहरण बने रहे। उन्हें किसी सरकारी या गैर-सरकारी पद का लालच नहीं था। महेंद्र प्रताप सिंह ने प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सहित सत्ता के शीर्ष पर बैठे राजनेताओं के सामने अपने दृढ़ विचारों को व्यक्त करने व उन पर दृढ़ता से चलने में कभी संकोच नहीं किया।

यह अंश राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, भारत से प्रकाशित मेरी पुस्तक की भूमिका से है। चित्र में इसके पाठक इतिहास के शौकीन पाठक 94-वर्षीय श्रीपाल सांगवान जी हैं जो कई दशकों तक नियमित रूप से, और आज भी आकाशवाणी की ग्रामीण प्रसारण सेवा से जुड़े हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे हमारे प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है। यह आलेख मुझे सोशल मीडिया के फेसबुक मंच से प्राप्त हुआ है। मुझे अच्छा लगा, इसलिए इसे अपने मंच से सार्वजनिक कर रहा हूं।

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