राजेश खण्डेलवाल
राजस्थान सहित पूरा उत्तर भारत भीषण गर्मी की चपेट में है, वहीं सामान्यतरू अप्रेल तक अपने प्रजनन स्थलों के लिए लौटने वाले प्रवासी पक्षी अब भी वेटलैंड्स में डेरा डाले हैं। विशेषज्ञ इसे जलवायु परिवर्तन और अल नीनो के प्रभाव का संकेत मान रहे हैं।
पक्षी विशेषज्ञों का कहना है कि हाल ही में हुए पक्षी सर्वेक्षणों में भरतपुर के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान, मथुरा के जोधपुर झाल वेटलैंड, आगरा के सूरसरोवर पक्षी विहार तथा धौलपुर के चंबल और यमुना नदी के तटीय क्षेत्रों में कई ऐसी प्रवासी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जिन्हें अप्रेल माह तक अपने प्रजनन स्थलों की ओर लौट जाना चाहिए था। इनमें ब्लैक-टेल्ड गॉडविट, कॉमन रेडशैंक, स्पॉटेड रेडशैंक, ग्रीनशैंक, रफ और विभिन्न स्टिंट प्रजातियां शामिल हैं। ये सभी वेडर बर्ड्स हैं, जो सर्दियों में भारत आती हैं और मार्च से अप्रेल के बीच वापस सेन्ट्रल एशियन फ्लाईवे के जरिए अपने प्रजनन स्थलों की ओर लौट जाती हैं, लेकिन इस बार मई के अंतिम सप्ताह तक भी इनकी उपस्थिति दर्ज होना असामान्य है।
प्रवासी पक्षियों की हजारों किलोमीटर लंबी वापसी यात्रा पूरी तरह वायु धाराओं यानी विंड करंट पर निर्भर करती है। पक्षियों को लंबी दूरी तय करने के लिए पीछे से बहने वाली अनुकूल हवाओं, जिन्हें टेलविंड कहा जाता है, की आवश्यकता होती है। ये हवाएं कम ऊर्जा खर्च कर लंबी दूरी की उड़ान को संभव बनाती हैं, लेकिन इस बार अल नीनो की सक्रियता ने वैश्विक मौसम प्रणाली और वायु धाराओं की दिशा में बदलाव कर दिया है। कई क्षेत्रों में टेलविंड की जगह हेडविंड विकसित हो गई है। हेडविंड पक्षियों की उड़ान के विपरीत दिशा में बहती है और उनकी गति को धीमा कर देती है। इसके कारण पक्षियों को सामान्य से कहीं अधिक ऊर्जा खर्च करनी पड़ रही है।
बढ़ते तापमान और हेडविंड का संयुक्त प्रभाव छोटे प्रवासी पक्षियों के लिए गंभीर चुनौती बन गया है। ऊर्जा की अत्यधिक खपत के कारण कई पक्षी निर्धारित समय पर अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पा रहे और रास्ते में स्थित वेटलैंड्स पर अधिक समय तक रुकने को मजबूर हैं।
विश्व स्तर पर प्रसिद्ध केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में भी इस बार स्पॉटेड रेडशैंक व अन्य कई प्रवासी प्रजातियां अपेक्षा से अधिक समय तक देखी जा रही हैं। यदि भविष्य में भी ऐसे ही जलवायु पैटर्न बने रहे तो प्रवास का पूरा कैलेंडर प्रभावित हो सकता है। इससे न केवल पक्षियों का व्यवहार बदलेगा बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर इसका प्रभाव दिखाई देगा।
प्रवासी पक्षियों की यह असामान्य उपस्थिति केवल पक्षी विज्ञान का विषय नहीं है, बल्कि यह बदलती जलवायु और पर्यावरणीय असंतुलन का स्पष्ट संकेत है। पक्षियों को प्रकृति का संवेदनशील संकेतक माना जाता है। उनके व्यवहार में होने वाले बदलाव यह बताते हैं कि पर्यावरणीय परिस्थितियां तेजी से बदल रही हैं।
लेखक लाडली मीडिया अवार्डी स्वतंत्र पत्रकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
