भारत की इंजीनियरिंग शिक्षा : संकट व रोजगार का भ्रम, डिग्रियों का कारखाना या प्रतिभा का निर्माण?

भारत की इंजीनियरिंग शिक्षा : संकट व रोजगार का भ्रम, डिग्रियों का कारखाना या प्रतिभा का निर्माण?

भारत स्वयं को विश्व की सबसे युवा आबादी वाला देश कहता है। हर वर्ष लाखों विद्यार्थी इंजीनियर बनने का सपना लेकर कॉलेजों में दाखिला लेते हैं। इस पढ़िाई में परिवार अपनी जीवनभर की बचत खर्च करता है। चार वर्ष बाद युवा हाथ में इंजीनियरिंग की डिग्री लेकर निकलता है लेकिन उद्योग उससे पूछता है-‘तुम कर क्या सकते हो?’ यह प्रश्न स्वाभाविक है। क्योंकि उद्योग को बाजार के अनुकूल प्रशिक्षित श्रमिक चाहिए।

यहीं से भारत की उच्च शिक्षा का सबसे बड़ा संकट शुरू होता है। कुछ वर्ष पहले प्रकाशित Aspiring Minds National Employability Report ने दावा किया कि लगभग 80 प्रतिशत इंजीनियरिंग स्नातक ज्ञान-आधारित उद्योगों की अपेक्षाओं के अनुरूप रोजगार योग्य नहीं हैं। दूसरी ओर, विभिन्न अवसरों पर NASSCOM तथा उद्योग जगत ने भी इंजीनियरिंग शिक्षा और उद्योग की आवश्यकताओं के बीच गहरे कौशल-अंतर (Skill Gap) की ओर संकेत किया। यद्यपि इन रिपोर्टों की अपनी सीमाएँ हैं और इन्हें सम्पूर्ण इंजीनियरिंग शिक्षा का अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता, फिर भी वे एक असुविधाजनक प्रश्न अवश्य उठाती हैं – क्या भारत इंजीनियर तैयार कर रहा है या केवल इंजीनियरिंग की डिग्रियाँ बाँट रहा है?

यह प्रश्न केवल छात्रों पर नहीं उठता। इसकी जिम्मेदारी शिक्षा व्यवस्था, नियामक संस्थाओं, विश्वविद्यालयों, उद्योग और सरकार-सभी पर समान रूप से है।

डिग्री बढ़ी, दक्षता क्यों नहीं बढ़ी? पिछले दो दशकों में देशभर में इंजीनियरिंग कॉलेजों की संख्या तेजी से बढ़ी। उद्देश्य था तकनीकी मानव संसाधन तैयार करना लेकिन विस्तार की इस दौड़ में गुणवत्ता अक्सर पीछे छूट गई। अनेक संस्थानों में प्रयोगशालाएँ कागज़ों पर रहीं, उद्योग से जुड़ाव सीमित रहा और पढ़ाई परीक्षा-केंद्रित बनकर रह गई।

परिणाम यह हुआ कि छात्र सिद्धांत तो पढ़ते हैं लेकिन वास्तविक समस्याओं का समाधान करना नहीं सीख पाते। उद्योग को ऐसे इंजीनियर चाहिए जो डिजाइन करें, विश्लेषण करें, टीम में काम करें, नई तकनीक अपनाएँ और नवाचार करें। विश्वविद्यालयों से निकलने वाले अनेक छात्रों के पास इन कौशलों का पर्याप्त अभ्यास नहीं होता।

समस्या छात्र नहीं, व्यवस्था है। हम अक्सर कहते हैं कि छात्र योग्य नहीं हैं। यह निष्कर्ष अधूरा है। एक ही छात्र यदि उचित शिक्षक, आधुनिक प्रयोगशाला, उद्योग-अनुभव और परियोजना-आधारित शिक्षा पाए, तो उसकी क्षमता बदल सकती है। इसलिए समस्या व्यक्ति से अधिक प्रणाली की है।

भारत में अभी भी अनेक कॉलेजों में सफलता का पैमाना परीक्षा में अंक है, जबकि उद्योग समस्या-समाधान, संचार-कौशल, प्रोग्रामिंग, डिज़ाइन सोच और व्यावहारिक दक्षता को महत्व देता है। दोनों के बीच यही दूरी बेरोजगारी और रिक्त पदों का विरोधाभास पैदा करती है।

भारत में लाखों इंजीनियर रोजगार खोज रहे हैं, वहीं उद्योग कहता है कि उसे योग्य इंजीनियर नहीं मिल रहे। यह विरोधाभास केवल रोजगार का नहीं, बल्कि विकास के इस अनगढ़ मॉडल का है। यदि शिक्षा उद्योग की आवश्यकता से कट जाएगी, तो डिग्री रोजगार की गारंटी नहीं बन सकती।

स्थिति अब और जटिल हो गई है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स और ऑटोमेशन सामान्य तकनीकी कार्यों को तेजी से बदल रहे हैं। भविष्य में केवल वही इंजीनियर सफल होंगे जो सीखते रहने की क्षमता रखते हों, नई तकनीक अपनाते हों और सृजनात्मक सोच रखते हों। ऐसे समय में रटकर परीक्षा पास करने वाला मॉडल तेजी से अप्रासंगिक होता जा रहा है।

समाधान केवल नए कॉलेज खोलने में नहीं है। सबसे पहले इंजीनियरिंग शिक्षा को उद्योग, अनुसंधान और नवाचार से जोड़ना होगा। प्रत्येक छात्र के लिए अनिवार्य औद्योगिक प्रशिक्षण, वास्तविक परियोजनाएँ, स्टार्टअप संस्कृति, आधुनिक प्रयोगशालाएँ और स्थानीय समस्याओं पर आधारित शोध आवश्यक हैं।

दूसरा, कॉलेजों का मूल्यांकन केवल भवन और प्रवेश संख्या से नहीं, बल्कि उनके विद्यार्थियों की दक्षता, नवाचार, रोजगार और उद्यमिता के आधार पर होना चाहिए। तीसरा, भारत को ‘डिग्री अर्थव्यवस्था’ से निकलकर ‘कौशल अर्थव्यवस्था’ की ओर बढ़ना होगा।

भारत पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य रखता है। सेमीकंडक्टर, रक्षा उत्पादन, हरित ऊर्जा, अंतरिक्ष तकनीक और डिजिटल उद्योगों में वैश्विक नेतृत्व की बात करता है। लेकिन इन सभी क्षेत्रों की नींव उच्च गुणवत्ता वाली तकनीकी शिक्षा पर ही टिकेगी।

यदि हमारी विश्वविद्यालय प्रणाली विश्वस्तरीय इंजीनियर तैयार नहीं कर पाती, तो उद्योग को या तो विदेश से विशेषज्ञ बुलाने होंगे या फिर वर्षों तक नए कर्मचारियों को पुनः प्रशिक्षित करना होगा। दोनों ही स्थितियाँ राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा को कमजोर करती हैं।

भारत की सबसे बड़ी पूँजी उसका युवा है। यदि वही डिग्री और दक्षता के बीच फँस जाए, तो जनसांख्यिकीय लाभांश (Demographic Dividend) जनसांख्यिकीय बोझ में बदल सकता है। इसलिए प्रश्न यह नहीं है कि 80 प्रतिशत इंजीनियर अयोग्य हैं या नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारी शिक्षा व्यवस्था युवाओं को भविष्य के भारत के लिए तैयार कर रही है?

जब तक इस प्रश्न का ईमानदार उत्तर नहीं खोजा जाएगा, तब तक इंजीनियरिंग कॉलेज बढ़ते रहेंगे, डिग्रियाँ छपती रहेंगी, लेकिन उद्योग और युवा – दोनों एक-दूसरे को दोष देते रहेंगे। भारत को डिग्रियों की नहीं, दक्षता की क्रांति चाहिए। वही क्रांति आने वाले भारत की वास्तविक तकनीकी शक्ति बनेगी।

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