गौतम चौधरी
हाल ही में केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रवासी भारतीयों से भारत में अधिक निवेश और विदेशी मुद्रा प्रवाह बढ़ाने का आह्वान किया। यह अपील स्वाभाविक रूप से एक महत्वपूर्ण प्रश्न को जन्म देती है-क्या दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल भारत को अब भी प्रवासी भारतीयों की विदेशी मुद्रा की आवश्यकता है? या यह वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक सामान्य और दूरदर्शी रणनीति है?
इस प्रश्न का उत्तर भावनाओं से नहीं, बल्कि आर्थिक तथ्यों के आधार पर खोजा जाना चाहिए। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि किसी भी देश के लिए प्रवासी समुदाय केवल भावनात्मक पूंजी नहीं होता, बल्कि वह आर्थिक शक्ति का भी महत्वपूर्ण स्रोत होता है। भारत लंबे समय से दुनिया में सर्वाधिक प्रेषण (Remittances) प्राप्त करने वाला देश रहा है। खाड़ी देशों, अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और एशिया के अनेक देशों में बसे भारतीय हर वर्ष बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा भारत भेजते हैं। यह राशि केवल परिवारों की आय नहीं बढ़ाती, बल्कि देश के विदेशी मुद्रा भंडार और भुगतान संतुलन को भी मजबूती देती है।
इतिहास भी यही बताता है। 1991 के भुगतान संतुलन संकट, 1998 के परमाणु परीक्षणों के बाद लगे प्रतिबंधों और बाद के कई आर्थिक चरणों में भारत ने प्रवासी भारतीयों के लिए विशेष निवेश योजनाएँ और बांड जारी किए। यह किसी एक सरकार की नहीं, बल्कि भारत की दीर्घकालिक आर्थिक नीति का हिस्सा रहा है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो वित्तमंत्री की अपील कोई असाधारण कदम नहीं है। फिर भी प्रश्न समाप्त नहीं होता। यदि भारत पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अग्रसर है, विदेशी मुद्रा भंडार पर्याप्त है, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) लगातार आ रहा है और घरेलू पूंजी बाजार भी अपेक्षाकृत मजबूत हैं, तो फिर प्रवासी भारतीयों से अतिरिक्त विदेशी मुद्रा और निवेश की अपील क्यों?
इसका एक उत्तर यह है कि सरकार वैश्विक अनिश्चितताओं को देखते हुए पूंजी के स्रोतों का विविधीकरण करना चाहती है। पश्चिम एशिया में तनाव, ऊर्जा आयात पर निर्भरता, वैश्विक व्यापार में उतार-चढ़ाव और वित्तीय बाजारों की अस्थिरता ऐसी परिस्थितियाँ हैं जिनमें दीर्घकालिक और अपेक्षाकृत स्थिर प्रवासी निवेश उपयोगी माना जाता है।
दूसरा पक्ष अधिक आलोचनात्मक है। भारत का व्यापार घाटा अभी भी बड़ा है। ऊर्जा, सेमीकंडक्टर, उन्नत मशीनरी और अनेक उच्च तकनीकी उत्पादों के लिए देश आयात पर निर्भर है। यदि आयात लगातार निर्यात से तेज़ गति से बढ़ता है, तो विदेशी मुद्रा की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी। ऐसे में प्रवासी निवेश को प्रोत्साहित करना एक रणनीतिक आवश्यकता भी हो सकता है।
किसी भी अर्थव्यवस्था के लिए यह स्थिति स्थायी समाधान नहीं हो सकती। दीर्घकालिक आर्थिक शक्ति का आधार बाहरी पूंजी नहीं, बल्कि घरेलू उत्पादन, निर्यात क्षमता, तकनीकी नवाचार और उत्पादक निवेश होता है। यदि किसी देश की विकास-यात्रा लगातार बाहरी पूंजी पर निर्भर रहने लगे, तो वैश्विक परिस्थितियों में बदलाव उसका जोखिम भी बढ़ा सकते हैं।
यहीं भारत के लिए वास्तविक चुनौती है। भारत को केवल विदेशी मुद्रा आकर्षित करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसे ऐसी अर्थव्यवस्था विकसित करनी होगी जो उच्च मूल्यवर्धित विनिर्माण, अनुसंधान, नवाचार, हरित प्रौद्योगिकी और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के आधार पर स्वयं विदेशी मुद्रा अर्जित करे। सेवा क्षेत्र में भारत ने उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है, लेकिन वस्तु निर्यात, उन्नत विनिर्माण और प्रौद्योगिकी निर्यात में अभी भी पर्याप्त संभावनाएँ शेष हैं।
प्रवासी भारतीयों को केवल धन भेजने वाले समुदाय के रूप में देखना भी ठीक नहीं है। वे ज्ञान, प्रौद्योगिकी, वैश्विक बाजार, उद्यमिता और नवाचार के महत्वपूर्ण सेतु बन सकते हैं। यदि उनकी भागीदारी केवल बैंक जमा या बांड तक सीमित न रहकर अनुसंधान, स्टार्टअप, उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत विनिर्माण तक विस्तृत हो, तो उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होगा।
इस पूरे मामले मो देखने के लिए एक अलग दृष्टिकोण विकसित करने की जरूरत है। मसलन, वित्तमंत्री की अपील को न तो आर्थिक कमजोरी का प्रमाण मान लेना चाहिए और न ही उसे बिना किसी प्रश्न के आर्थिक सफलता का प्रतीक घोषित कर देना चाहिए। यह वैश्विक अर्थव्यवस्था की जटिल परिस्थितियों में पूंजी जुटाने की एक वैध रणनीति हो सकती है। लेकिन साथ ही यह भी याद रखना होगा कि किसी राष्ट्र की वास्तविक आर्थिक शक्ति उसकी अपनी उत्पादन क्षमता, तकनीकी आत्मनिर्भरता और प्रतिस्पर्धात्मक निर्यात में निहित होती है।
भारत के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न विदेशी मुद्रा जुटाने का नहीं, बल्कि ऐसी अर्थव्यवस्था बनाने का है जिसे भविष्य में विदेशी मुद्रा के लिए विशेष अपीलों पर कम और अपनी उत्पादक क्षमता पर अधिक भरोसा करना पड़े। आर्थिक नीति का अंतिम लक्ष्य केवल पूंजी जुटाना नहीं होना चाहिए; लक्ष्य ऐसा विकास होना चाहिए जो देश को वैश्विक पूंजी का आकर्षण तो बनाए, पर उसकी अनिवार्य आवश्यकता पर निर्भर न रहने दे। यही किसी आत्मविश्वासी और आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था की पहचान होगी।
