पैसरा : जहाँ एक लाख वर्ष पहले लिखी गयी भारत के इतिहास की पहली इबारत

पैसरा : जहाँ एक लाख वर्ष पहले लिखी गयी भारत के इतिहास की पहली इबारत

इतिहास केवल नगर, परकोटों, भग्नावशेषों, इमारतों, राजाओं-रानियों की कहानियां, युद्ध आदि की कथा तालिका ही नहीं होती, इतिहास उस पुरातात्विक अवशेषों की वैज्ञानिक व्याख्या भी है, जो मानव की जीवंतता और उसके द्वारा किए गए नवीन रचना व संघर्षों को चिंहित करता है। क्या भारत के इतिहास का पहला अध्याय किसी भव्य नगर, विशाल दुर्ग या प्राचीन विश्वविद्यालय से नहीं, बल्कि बिहार के मुंगेर जिले के एक छोटे-से गाँव से शुरू होता है? यह प्रश्न जितनी सहजता से पूछा जा रहा है उसका उत्तर उतना ही जटिल है। प्रश्न सुनने में असाधारण लग सकता है लेकिन पैसरा का पुरातात्विक महत्व हमें इसी संभावना पर गंभीरता से विचार करने के लिए प्रेरित करता है।

धरहरा प्रखंड का यह शांत गाँव पहली नजर में सामान्य प्रतीत होता है। यहाँ न कोई विश्वविख्यात स्मारक है और न ही कोई राजसी अवशेष। फिर भी पुरातत्वविदों के लिए यह स्थल अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ मिले पाषाण औजार, उनके निर्माण के अवशेष और मानव गतिविधियों के संकेत बताते हैं कि गंगा घाटी में मनुष्य की उपस्थिति अत्यंत प्राचीन रही है। कुछ अध्ययनों के अनुसार इस क्षेत्र में मानव गतिविधियों का इतिहास लगभग एक लाख वर्ष या उससे भी अधिक पुराना हो सकता है।

यदि यह निष्कर्ष आगे के वैज्ञानिक अध्ययनों से और सुदृढ़ होता है, तो पैसरा केवल बिहार ही नहीं, पूरे भारतीय उपमहाद्वीप के प्रागैतिहासिक अध्ययन का एक प्रमुख केंद्र बन सकता है।

उस समय न कोई राज्य था, न कोई धर्मग्रंथ, न कृषि और न नगर। मनुष्य प्रकृति के बीच रहता था, पत्थरों से औजार बनाता था, भोजन जुटाता था और छोटे-छोटे समूहों में जीवन बिताता था। यही वह दौर था जब मानव बुद्धि धीरे-धीरे तकनीक, सहयोग और अनुभव के सहारे आगे बढ़ रही थी। सभ्यता का बीज शायद यहीं कहीं अंकुरित हो रहा था।

इसी अर्थ में पैसरा केवल एक पुरातात्विक स्थल नहीं, बल्कि मानव विकास की एक जीवंत प्रयोगशाला है। पैसरा का महत्व तब और बढ़ जाता है जब इसे व्यापक भू-सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में देखा जाए। झारखंड के इस्को के शैलचित्र प्रारंभिक मनुष्य की कलात्मक चेतना का परिचय देते हैं। कैमूर की पर्वतमालाएँ प्रागैतिहासिक जीवन के अनेक प्रमाण समेटे हुए हैं। झारखंड के महापाषाण स्थल सामाजिक स्मृति और सांस्कृतिक विकास की कहानी कहते हैं, जबकि बिहार का चिरांद मानव जीवन के शिकारी-संग्राहक चरण से कृषि आधारित समाज की ओर संक्रमण का साक्षी है।

इन सभी स्थलों को जोड़कर देखने पर गंगा और छोटानागपुर का पूरा क्षेत्र मानव विकास की एक सतत यात्रा के रूप में दिखाई देता है। दुनिया ने अपने ऐसे प्रागैतिहासिक स्थलों को मानव इतिहास की साझा धरोहर बनाया है। यूरोप के लास्को, आल्तामीरा और स्टोनहेंज हों या अफ्रीका के ओल्डुवाई गॉर्जकृइन सभी ने हमें यह सिखाया है कि मानव इतिहास केवल राजाओं और साम्राज्यों का इतिहास नहीं है। वह उन अनाम मनुष्यों का भी इतिहास है जिन्होंने पहली बार औजार बनाए, प्रकृति को समझा और समूह में रहने की कला विकसित की।

पैसरा भी उसी वैश्विक विरासत का भारतीय अध्याय हो सकता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि यहाँ आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के साथ बहुविषयक अनुसंधान किए जाएँ। पुरातत्व, भूविज्ञान, पुरा-पर्यावरण, जीवाश्म विज्ञान, आनुवंशिकी और मानवशास्त्र के विशेषज्ञ मिलकर इस क्षेत्र का विस्तृत अध्ययन करें। यदि व्यापक उत्खनन और वैज्ञानिक विश्लेषण किए जाएँ, तो संभव है कि भारतीय प्रागैतिहासिक अध्ययन के अनेक अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर यहीं से मिलें।

इसके साथ-साथ पैसरा को केवल पर्यटन स्थल के रूप में नहीं, बल्कि एक ’’प्रागैतिहासिक अध्ययन एवं व्याख्या केंद्र’’ के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। स्थानीय संग्रहालय, अनुसंधान प्रयोगशाला, फील्ड स्कूल और डिजिटल अभिलेखागार इसे अंतरराष्ट्रीय महत्व का केंद्र बना सकते हैं। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा मिलेगी और युवा पीढ़ी अपने इतिहास से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ सकेगी।

पैसरा हमें अतीत का केवल एक स्थल नहीं देता; वह हमें अपनी उत्पत्ति के बारे में सोचने का अवसर देता है। वह याद दिलाता है कि भारत की कहानी केवल राजधानियों, राजवंशों और साम्राज्यों से नहीं बनी। उसकी शुरुआत उन अनाम मनुष्यों से हुई जिन्होंने लाखों वर्ष पहले इस धरती पर जीवन का संघर्ष शुरू किया।

संभव है कि भविष्य का कोई नया उत्खनन या वैज्ञानिक खोज पैसरा को विश्व के प्रमुख प्रागैतिहासिक स्थलों की श्रेणी में स्थापित कर दे। इसलिए यह केवल बिहार का एक गाँव नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की उस पहली इबारत का पृष्ठ है, जिसे अभी पूरी तरह पढ़ा जाना बाकी है।

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