मानसून : देश के मौसम पर एक समग्र समीक्षा, कहीं बाढ़ का खतरा तो कहीं सूखे की मार

मानसून : देश के मौसम पर एक समग्र समीक्षा, कहीं बाढ़ का खतरा तो कहीं सूखे की मार

नयी दिल्ली/पटना/कोलकाता/रांची/ दक्षिण-पश्चिम मानसून अब पूरे देशभर में सक्रिय है लेकिन उसकी चाल इस वर्ष भी असमान बनी हुई है। जुलाई का मध्य आते-आते देश के कई हिस्सों में भारी वर्षा और बाढ़ जैसी स्थिति बनने लगी है, जबकि मध्य और दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत के कुछ क्षेत्रों में वर्षा का लंबा अंतराल किसानों की चिंता बढ़ा दी है।

भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने जुलाई के लिए पहले ही संकेत दिया था कि पूरे देश में औसत वर्षा सामान्य से कम रह सकती है, हालांकि उत्तर-पश्चिम, पूर्वाेत्तर तथा पूर्व-मध्य भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य अथवा सामान्य से अधिक वर्षा की संभावना है।

पिछले कुछ दिनों की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति के बाद अब मानसून के फिर सक्रिय होने के संकेत मिल रहे हैं। बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड तथा पूर्वाेत्तर राज्यों में भारी से अति भारी वर्षा का दौर शुरू होने की संभावना है। कई स्थानों पर वज्रपात, तेज़ हवाओं और अचानक जलभराव का भी खतरा बना हुआ है। झारखंड और बिहार के कई क्षेत्रों में मध्यम से भारी बारिश हो रही है।

हिमालयी राज्यों-विशेषकर हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड में अगले कुछ दिनों के दौरान अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और फ्लैश फ्लड का जोखिम बढ़ सकता है। पहाड़ी क्षेत्रों में यात्रा करने वालों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

इसके विपरीत, मध्य भारत तथा दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों में मानसून की गति अपेक्षाकृत कमजोर रही है। महाराष्ट्र, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, उत्तरी कर्नाटक तथा मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में वर्षा की कमी ने खरीफ की बुवाई को प्रभावित किया है। विशेष रूप से तेलंगाना में धान की रोपाई प्रभावित होने की खबरें सामने आई हैं क्योंकि किसान पर्याप्त वर्षा की प्रतीक्षा कर रहे हैं। यही स्थिति बताती है कि केवल ‘देश में मानसून सामान्य है’ कहना पर्याप्त नहीं होता। कृषि के लिए सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ’’बारिश कहाँ, कब और कितनी हो रही है।’’

भारतीय मानसून की सबसे बड़ी समस्या अब कुल वर्षा की मात्रा नहीं, बल्कि उसका वितरण बनता जा रहा है। कई क्षेत्रों में कुछ घंटों में पूरे महीने जितनी बारिश हो जाती है, जबकि दूसरे क्षेत्रों में लगातार कई सप्ताह तक सूखा बना रहता है। इस प्रकार की वर्षा न तो कृषि के लिए आदर्श होती है और न ही जल प्रबंधन के लिए। अत्यधिक वर्षा का अधिकांश पानी बहकर नदियों में चला जाता है, जबकि लंबे शुष्क अंतराल मिट्टी की नमी को तेजी से कम कर देते हैं। परिणामस्वरूप एक ही मौसम में कहीं बाढ़ और कहीं सूखे जैसी स्थिति दिखाई देने लगती है।

खरीफ फसलों के लिए जुलाई सबसे महत्वपूर्ण महीना माना जाता है। जिन क्षेत्रों में समय पर पर्याप्त वर्षा नहीं हुई है, वहाँ धान, सोयाबीन, दालों और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर, जिन इलाकों में अत्यधिक वर्षा हो रही है, वहाँ जलभराव, मिट्टी का कटाव और फसलों को नुकसान होने की आशंका बढ़ गई है। इस स्थिति में राज्यों को स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार आकस्मिक कृषि योजनाएँ (ब्वदजपदहमदबल च्संदे) लागू करनी होंगी ताकि वर्षा की अनिश्चितता से होने वाले नुकसान को कम किया जा सके।

मौसम विभाग के अनुसार अगले कुछ दिनों में पूर्वी, उत्तरी और हिमालयी क्षेत्रों में मानसून अधिक सक्रिय रहने की संभावना है। बिहार, झारखंड, ओडिशा, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड में भारी वर्षा का दौर जारी रह सकता है, जबकि मध्य और पश्चिम भारत के कुछ हिस्सों में भी धीरे-धीरे वर्षा की गतिविधियाँ बढ़ने के संकेत हैं।

जुलाई 2026 का मानसून एक बार फिर यह याद दिला रहा है कि भारत की चुनौती केवल ‘अच्छा मानसून’ नहीं, बल्कि ’’‘संतुलित मानसून’’’ है। यदि वर्षा कुछ दिनों में अत्यधिक केंद्रित हो जाए और लंबे अंतराल तक रुक जाए, तो उसका लाभ सीमित रह जाता है और जोखिम बढ़ जाते हैं।

भविष्य में भारत को केवल मौसम पूर्वानुमान की सटीकता बढ़ाने पर ही नहीं, बल्कि जल-संरक्षण, वर्षा जल संचयन, नदी-घाटी प्रबंधन, शहरी जल निकासी और जलवायु-अनुकूल कृषि पर भी समान रूप से निवेश करना होगा। क्योंकि बदलते जलवायु परिदृश्य में मानसून अब केवल एक मौसमी घटना नहीं रहा; वह भारत की खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता का सबसे महत्वपूर्ण निर्धारक बन चुका है।

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