आतंकवादी हिंसा को रोकने के लिए सबसे पहले चरमपंथ को तसल्ली से समझना होगा

आतंकवादी हिंसा को रोकने के लिए सबसे पहले चरमपंथ को तसल्ली से समझना होगा

आज दुनिया जिस सबसे जटिल संकट से जूझ रही है, वह केवल आतंकवाद या हिंसा का संकट नहीं है; वह विचारों के कट्टर हो जाने का संकट है। किसी भी हिंसक घटना के बाद समाज का ध्यान स्वाभाविक रूप से अपराधियों, हथियारों और सुरक्षा व्यवस्था पर जाता है लेकिन एक प्रश्न अक्सर अनुत्तरित रह जाता है-’’आख़िर वह कौन-सी मानसिक और सामाजिक प्रक्रिया है जो एक सामान्य व्यक्ति को इस निष्कर्ष तक पहुँचा देती है कि हिंसा ही न्याय का रास्ता है?’’

यहीं से चरमपंथ की वास्तविक चुनौती शुरू होती है। चरमपंथ किसी एक घटना का परिणाम नहीं होता और न ही वह किसी एक धर्म, राजनीतिक विचारधारा या समुदाय तक सीमित है। इतिहास गवाह है कि धार्मिक कट्टरता, नस्लीय श्रेष्ठतावाद, उग्र राष्ट्रवाद, वैचारिक क्रांतिवाद और यहाँ तक कि कुछ राजनीतिक आंदोलनों ने भी अलग-अलग समय पर हिंसा को वैध ठहराने का प्रयास किया है। इसलिए समस्या किसी एक विचार की नहीं, बल्कि उस मानसिक संरचना की है जो असहमति को शत्रुता में बदल देती है।

चरमपंथ का पहला चरण दुनिया को दो हिस्सों में बाँटना है-‘हम’ और ‘वे’। जब समाज को केवल मित्र और शत्रु के द्वंद्व में देखना शुरू कर दिया जाता है, तब संवाद की जगह टकराव ले लेता है। विविधता बोझ लगने लगती है और असहमति को अस्तित्व पर हमला मान लिया जाता है। यही वह बिंदु है जहाँ लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर पड़ने लगती है।

इसके बाद आता है पीड़ित होने का आख्यान। लगभग हर चरमपंथी विचारधारा अपने समर्थकों को यह विश्वास दिलाती है कि उनके साथ ऐतिहासिक या वर्तमान समय में इतना अन्याय हुआ है कि सामान्य लोकतांत्रिक उपाय अब पर्याप्त नहीं हैं। जब यह धारणा गहरी हो जाती है, तब प्रतिशोध को न्याय और हिंसा को कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत करना आसान हो जाता है। यहीं से नैतिक सीमाएँ धुंधली पड़ने लगती हैं।

डिजिटल युग ने इस चुनौती को और गंभीर बना दिया है। सोशल मीडिया के एल्गोरिदम उपयोगकर्ता को अक्सर वही सामग्री दिखाते हैं जो उसकी पूर्वधारणाओं को पुष्ट करती है। परिणामस्वरूप व्यक्ति एक ऐसे डिजिटल घेरे में कैद हो सकता है, जहाँ उसे केवल वही विचार सुनाई देते हैं जिनसे वह पहले से सहमत है। इस ‘इको चौंबर’ में तथ्य पीछे छूट जाते हैं और भावनाएँ निर्णयों पर हावी हो जाती हैं। गलत सूचनाएँ, षड्यंत्र सिद्धांत और भड़काऊ प्रचार इस प्रक्रिया को और तेज़ कर देते हैं।

यह भी उतना ही सच है कि हर कट्टर विचार रखने वाला व्यक्ति हिंसक नहीं बनता। हिंसा तक पहुँचने के लिए वैचारिक कट्टरता के साथ सामाजिक अलगाव, पहचान का संकट, निरंतर प्रचार और कई बार व्यक्तिगत परिस्थितियाँ भी भूमिका निभाती हैं। इसलिए केवल दमन या निगरानी के उपाय इस समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकते।

यही कारण है कि चरमपंथ के विरुद्ध सबसे प्रभावी हथियार केवल कानून नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक समाज की बौद्धिक और नैतिक शक्ति है। ऐसी शिक्षा, जो प्रश्न पूछना सिखाए; ऐसा सार्वजनिक विमर्श, जो असहमति को स्थान दे; ऐसी मीडिया संस्कृति, जो सनसनी से अधिक सत्य को महत्व दे और ऐसा सामाजिक वातावरण, जिसमें युवा सम्मान, उद्देश्य और अपनापन महसूस करें-यही वे आधार हैं जिन पर हिंसा के विरुद्ध सबसे मजबूत दीवार खड़ी की जा सकती है।

भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र के लिए यह चुनौती और भी महत्वपूर्ण है। यहाँ विविधता कोई अपवाद नहीं, बल्कि राष्ट्रीय जीवन का स्वभाव है। यदि समाज का कोई भी वर्ग यह मानने लगे कि केवल उसका सत्य अंतिम है और शेष सब अस्वीकार्य हैं, तो लोकतंत्र की आत्मा ही कमजोर होने लगेगी। इसलिए चरमपंथ का मुकाबला किसी एक समूह के विरुद्ध अभियान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का सतत प्रयास होना चाहिए।

आज आवश्यकता केवल हिंसक घटनाओं की निंदा करने की नहीं, बल्कि उन वैचारिक, मनोवैज्ञानिक और डिजिटल प्रक्रियाओं को समझने की है जिनसे हिंसा जन्म लेती है। जब तक समाज चरमपंथ की जड़ों को नहीं पहचानेगा, तब तक वह उसकी शाखाएँ काटता रहेगा, लेकिन नई शाखाएँ फिर उगती रहेंगी।

किसी भी सभ्य समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सैन्य क्षमता नहीं, बल्कि अपने नागरिकों को विवेक, संवाद और सह-अस्तित्व का संस्कार देने की क्षमता होती है। अंततः चरमपंथ का स्थायी उत्तर भय नहीं, बल्कि स्वतंत्र चिंतन; दमन नहीं, बल्कि न्याय; और घृणा नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा में निहित है।

मुझे लगता है कि संपादकीय को और भी प्रभावशाली बनाने के लिए इसका शीर्षक ’’चरमपंथ की जड़ें समझे बिना हिंसा नहीं रुकेगी’’ के बजाय ’’हिंसा से पहले विचार कट्टर होते हैं’’ रखा जा सकता है। यह शीर्षक छोटा, स्मरणीय और संपादकीय शैली के अधिक अनुकूल है।

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