मूल्य पारदर्शिता से ही महंगाई पर लगेगी लगाम, केवल पैक साइज नहीं, एक्स-फैक्ट्री प्राइस भी अंकित हो

केंद्र सरकार द्वारा खाद्य तेलों की पैकेजिंग में पुनः मानक पैक साइज लागू करने की दिशा में उठाया गया कदम उपभोक्ता हित में एक स्वागतयोग्य पहल है। पिछले कुछ वर्षों में बाजार में 850 मिलीलीटर, 910 मिलीलीटर, 840 मिलीलीटर और अन्य असामान्य पैक साइज के प्रसार ने उपभोक्ताओं के लिए कीमतों की तुलना को जटिल बना दिया था। देखने में एक जैसे पैकेट अलग-अलग मात्रा के होते थे और सामान्य ग्राहक अक्सर यह समझ ही नहीं पाता था कि वह वास्तव में किस कीमत पर कितना उत्पाद खरीद रहा है।

सरकार का यह कदम केवल पैकेजिंग व्यवस्था में सुधार नहीं है, बल्कि बाजार में पारदर्शिता लाने का प्रयास भी है लेकिन यदि सरकार वास्तव में उपभोक्ता संरक्षण और मूल्य पारदर्शिता को मजबूत बनाना चाहती है, तो उसे इससे एक कदम आगे बढ़कर हर पैकेज्ड उत्पाद पर एमआरपी के साथ-साथ एक्स- फैक्ट्री प्राइस प्रकाशित करने की अनिवार्यता जैसे एक और महत्वपूर्ण सुधार पर विचार करना चाहिए।

यह सुझाव पहली नजर में साधारण लग सकता है लेकिन इसके प्रभाव दूरगामी हो सकते हैं। यह न केवल उपभोक्ता को जागरूक बनाएगा बल्कि बाजार में मौजूद अनावश्यक मुनाफाखोरी और मूल्य अपारदर्शिता पर भी प्रभावी नियंत्रण स्थापित कर सकता है।

भारत में महंगाई को मुख्यतः दो तरीकों से मापा जाता है, थोक मूल्य सूचकांक और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक। सरकार और रिजर्व बैंक इन्हीं आंकड़ों के आधार पर आर्थिक नीतियां बनाते हैं लेकिन आम आदमी का अनुभव अक्सर इन आंकड़ों से अलग होता है।

कई बार सरकार बताती है कि खुदरा महंगाई दर कम हुई है, लेकिन उपभोक्ता को बाजार में ऐसा महसूस नहीं होता। वह देखता है कि खाद्य तेल, दाल, मसाले, दूध, साबुन, टूथपेस्ट और दैनिक उपयोग की वस्तुएं लगातार महंगी होती जा रही हैं। उसकी वास्तविक चिंता यह नहीं होती कि सीपीआई 5 प्रतिशत है या 6 प्रतिशत, बल्कि यह होती है कि महीने के अंत में उसकी जेब में कितना पैसा बच रहा है।

यही कारण है कि आज महंगाई केवल आर्थिक नहीं बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा भी बन चुकी है। आज किसी भी पैकेज्ड उत्पाद पर उपभोक्ता केवल एमआरपी देखता है लेकिन उसे यह जानकारी नहीं होती कि निर्माता ने वह उत्पाद पहली बार बाजार में किस मूल्य पर बेचा था।

मान लीजिए किसी खाद्य उत्पाद का एक्स-फैक्ट्री मूल्य 40 रुपये है और उसकी एमआरपी 110 रुपये है। निश्चित रूप से इस अंतर में परिवहन, वेयरहाउसिंग, वितरण लागत, जीएसटी, रिटेल मार्जिन और अन्य खर्च शामिल होंगे। लेकिन कई बार यह अंतर इतना अधिक होता है कि उपभोक्ता को संदेह होने लगता है कि कहीं वह वास्तविक लागत से कहीं अधिक कीमत तो नहीं चुका रहा।

समस्या यह नहीं है कि व्यवसाय लाभ कमाता है। किसी भी आर्थिक व्यवस्था में लाभ कमाना स्वाभाविक और आवश्यक है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब मूल्य निर्धारण प्रक्रिया पूरी तरह अपारदर्शी हो जाती है और उपभोक्ता यह समझ ही नहीं पाता कि वह जिस कीमत का भुगतान कर रहा है, उसका वास्तविक आधार क्या है।

जब एमआरपी की अवधारणा लाई गई थी, तब उसका उद्देश्य उपभोक्ताओं को अधिक कीमत वसूलने से बचाना था लेकिन समय के साथ एमआरपी स्वयं एक मार्केटिंग टूल बन गई। कई कंपनियां जानबूझकर अधिक एमआरपी निर्धारित करती हैं और फिर उपभोक्ताओं को 20 प्रतिशत, 30 प्रतिशत या 50 प्रतिशत छूट का आकर्षक ऑफर देती हैं। ग्राहक को लगता है कि वह बड़ा लाभ प्राप्त कर रहा है जबकि वास्तविकता में वह उस मूल्य के बारे में कुछ नहीं जानता जिस पर उत्पाद फैक्ट्री से निकला था।

ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों के आने के बाद यह प्रवृत्ति और बढ़ी है। आज उपभोक्ता को 999 रुपये की वस्तु 499 रुपये में मिलती दिखाई जाती है और उसे लगता है कि उसने 500 रुपये बचा लिए लेकिन शायद वही उत्पाद निर्माता ने अपने चौनल पार्टनर को 250 या 300 रुपये में बेचा हो। यानी एमआरपी उपभोक्ता को अधिकतम मूल्य तो बताती है लेकिन वास्तविक मूल्य संरचना नहीं बताती।

यदि प्रत्येक पैकेज्ड उत्पाद पर एक्स-फैक्ट्री प्राइस अंकित हो, तो उपभोक्ता को मूल्य श्रृंखला की पहली कड़ी दिखाई देने लगेगी। उदाहरण के लिए यदि किसी तेल के पैकेट पर लिखा हो एक्स-फैक्ट्री प्राइसरू ₹110 जीएसटी एवं अन्य कररू ₹10 एमआरपीरू ₹160 तो उपभोक्ता को स्पष्ट रूप से पता होगा कि मूल्य में कितना अंतर है और वह किन कारणों से उत्पन्न हुआ है। इससे दो बड़े लाभ होंगे। पहला, बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी। कंपनियां अत्यधिक मूल्य अंतर रखने से बचेंगी क्योंकि उपभोक्ता और नियामक दोनों उस अंतर को देख सकेंगे।

दूसरा, खुदरा और वितरण श्रृंखला में अनावश्यक मुनाफाखोरी पर स्वाभाविक नियंत्रण स्थापित होगा। सरकार अभी खाद्य तेलों के पैक साइज को लेकर सुधार कर रही है लेकिन मूल्य पारदर्शिता की आवश्यकता केवल खाद्य तेलों तक सीमित नहीं है। यह व्यवस्था निम्न क्षेत्रों में भी लागू की जा सकती है एफएमसीजी उत्पाद, खाद्य पदार्थ दवाइयां और मेडिकल उपकरण घरेलू उपयोग की वस्तुएं कॉस्मेटिक्स इलेक्ट्रॉनिक्स कृषि उत्पादों से बने पैकेज्ड सामान. विशेष रूप से दवा उद्योग में कीमतों को लेकर पहले से ही कई प्रकार के नियामक ढांचे मौजूद हैं। यदि मूल्य श्रृंखला की पारदर्शिता बढ़ती है, तो उपभोक्ताओं का विश्वास भी मजबूत होगा।

कुछ लोग तर्क दे सकते हैं कि करोड़ों उत्पादों पर एक्स-फैक्ट्री प्राइस छापना जटिल कार्य होगा लेकिन डिजिटल इंडिया के दौर में यह चुनौती उतनी बड़ी नहीं है। आज प्रत्येक उत्पाद पर बारकोड और क्यूआर कोड मौजूद हैं। सरकार चाहे तो एक मानकीकृत डिजिटल व्यवस्था विकसित कर सकती है जिसमें उपभोक्ता मोबाइल से क्यूआर कोड स्कैन करके निम्न जानकारी देख सके. एक्स-फैक्ट्री प्राइस उत्पादन तिथि कर संरचना वितरण लागत अधिकृत विक्रेता नेटवर्क यह व्यवस्था पारदर्शिता को अभूतपूर्व स्तर तक ले जा सकती है।

महंगाई को नियंत्रित करने के लिए आमतौर पर ब्याज दरों में वृद्धि, करों में कमी, निर्यात-आयात नियंत्रण, सब्सिडी और आपूर्ति श्रृंखला सुधार जैसे उपाय किए जाते हैं लेकिन मूल्य पारदर्शिता को शायद ही कभी महंगाई नियंत्रण के उपकरण के रूप में देखा जाता है।

वास्तव में सूचना की कमी भी महंगाई का एक कारण बन जाती है। जब उपभोक्ता को वास्तविक लागत का पता नहीं होता, तब बाजार में मूल्य निर्धारण पर सामाजिक और प्रतिस्पर्धात्मक दबाव भी कम हो जाता है। एक्स-फैक्ट्री प्राइस का प्रकाशन सरकार के लिए किसी वित्तीय बोझ का कारण नहीं बनेगा, लेकिन यह बाजार को अधिक उत्तरदायी और पारदर्शी अवश्य बना सकता है।

भारत ने उपभोक्ता अधिकारों के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। एमआरपी, उत्पाद की निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि, पोषण संबंधी जानकारी, ग्राहक सेवा नंबर और क्यूआर कोड जैसी व्यवस्थाएं इसी दिशा में उठाए गए कदम हैं। अब समय आ गया है कि मूल्य संबंधी जानकारी को भी अगले स्तर तक ले जाया जाए। मानक पैक साइज उपभोक्ता को सही मात्रा बताएंगे लेकिन एक्स-फैक्ट्री प्राइस उसे सही मूल्य संरचना बताएगी। दोनों सुधार मिलकर उपभोक्ता को वास्तविक अर्थों में सशक्त बना सकते हैं।

सरकार यदि ‘कंज्यूमर फर्स्ट’ और ‘ईज ऑफ लिविंग’ के अपने लक्ष्य को और आगे बढ़ाना चाहती है, तो पैकेज्ड उत्पादों पर एक्स-फैक्ट्री प्राइस प्रकाशित करने की अनिवार्यता पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। यह केवल एक नियामकीय बदलाव नहीं होगा, बल्कि भारतीय बाजार व्यवस्था को अधिक पारदर्शी, प्रतिस्पर्धी और उपभोक्ता-केंद्रित बनाने की दिशा में एक ऐतिहासिक सुधार साबित हो सकता है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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