सुल्ताना डाकू : गुंडा, बदमाश, मबाली, या फिर घने जंगल का एक सच्चा रहनुमा?

सुल्ताना डाकू : गुंडा, बदमाश, मबाली, या फिर घने जंगल का एक सच्चा रहनुमा?

गौतम चौधरी

उत्तर भारत के तराई क्षेत्र के घने सालवन, नदियों की मद्धिम ध्वनि और धुंध से ढकी पगडंडियाँ, ये केवल प्राकृतिक सौंदर्य के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि एक जटिल ऐतिहासिक विमर्स के साक्षी भी रहे हैं। यही वह भूगोल है जहाँ औपनिवेशिक सत्ता, शिकारी-लेखक की संवेदनशील कलम और “डाकू” कहे गए व्यक्तियों की कथाएँ एक-दूसरे में उलझती-बिखरती हैं। इस त्रिकोण के केंद्र में तीन प्रमुख तत्व उभरते हैं, एक औपनिवेशिक प्रतिनिधि-लेखक, एक कथित अपराधी और एक कलंकित समुदाय। इनकी परस्पर अंतःक्रिया हमें इतिहास और मिथक के बीच की महीन रेखा पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करती है।

सबसे पहले प्रश्न उस दृष्टि का है, जिसके माध्यम से यह इतिहास हमारे सामने आता है। औपनिवेशिक काल के अनेक अंग्रेज़ लेखकों ने भारत के समाज, जंगल और जनजीवन को दर्ज कियाकृसंवेदनशीलता के साथ, परंतु सत्ता के चश्मे से। यही द्वंद्व उस प्रसिद्ध शिकारी-लेखक के लेखन में भी दिखाई देता है, जिनकी कथाएँ आज भी लोकप्रिय हैं। उनके विवरणों में मानवीय सहानुभूति तो है, पर साथ ही एक अंतर्निहित औपनिवेशिक ढाँचा भी मौजूद है, जहाँ “सभ्य” और “असभ्य”, “कानून” और “अपराध” जैसी श्रेणियाँ सत्ता-निर्धारित प्रतीत होती हैं। किसी व्यक्ति को “रॉबिनहुड जैसा” कहना, दरअसल, जटिल सामाजिक-राजनीतिक वास्तविकताओं को एक आकर्षक किंतु सरलीकृत कथा में रूपांतरित करना भी हो सकता है।

इसी संदर्भ में सुल्ताना का चरित्र सामने आता हैकृएक ऐसा व्यक्तित्व जिसे इतिहास ने अपराधी और लोकस्मृति ने नायक के रूप में गढ़ा। ब्रिटिश अभिलेख उसे एक खतरनाक डाकू के रूप में दर्ज करते हैं, जबकि लोककथाएँ उसे गरीबों का संरक्षक बताती हैं। सच्चाई, स्वाभाविक रूप से, इन दोनों अतियों के बीच कहीं स्थित है। यह निर्विवाद है कि उसकी गतिविधियाँ हिंसा और लूट से जुड़ी थीं; किंतु यह भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि वह एक ऐसे सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश का उत्पाद था, जिसे औपनिवेशिक सत्ता ने पहले ही संदेह और दमन के घेरे में डाल दिया था। अतः उसे केवल “अपराधी” या “विद्रोही” कह देना, दोनों ही स्थितियों में, इतिहास की जटिलता के साथ अन्याय होगा।

इस विमर्श का सबसे पीड़ादायक पक्ष उस समुदाय का इतिहास है, जिससे सुल्ताना संबंधित था। औपनिवेशिक शासन द्वारा लागू किया गया ‘क्रिमिनल ट्राइब्स एक्ट’ केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि एक वैचारिक हथियार भी था, जिसने संपूर्ण समुदायों को “जन्मजात अपराधी” घोषित कर दिया। इस कानून ने न केवल सामाजिक गतिशीलता को बाधित किया, बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाले कलंक को भी जन्म दिया। ऐसे में यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक हो उठता हैकृक्या सुल्ताना अपराध की ओर प्रवृत्त हुआ, या उसे और उसके समाज को पहले ही उस पहचान में कैद कर दिया गया था?

सुल्ताना की गिरफ्तारी की कथा को अक्सर नाटकीय रूपक में प्रस्तुत किया जाता है, “एक बाघ को पकड़ने के लिए दूसरे बाघ की जरूरत पड़ी।” यह अभिव्यक्ति प्रभावशाली अवश्य है, परंतु ऐतिहासिक रूप से भ्रामक है। वस्तुतः यह एक सुव्यवस्थित पुलिस अभियान था, जिसमें स्थानीय ज्ञान और अनुभव का उपयोग किया गया। इस घटना को रोमांचक कथा में बदल देना, उस औपनिवेशिक दमन-तंत्र की वास्तविकता को आंशिक रूप से ओझल कर देता है, जिसके अंतर्गत यह सब घटित हुआ।

सुल्ताना की फाँसी के साथ उसका जीवन अवश्य समाप्त हुआ, किंतु उसकी कथा यहीं से एक नए रूप में जीवित हो उठती है-लोककथाओं, किंवदंतियों और जनस्मृतियों में। इन कथाओं में वह एक साहसी, उदार और कभी-कभी नैतिक नायक के रूप में उभरता है। यद्यपि इन दावों के ऐतिहासिक प्रमाण सीमित हैं, फिर भी वे उस सामूहिक मनोविज्ञान को उजागर करते हैं, जो अन्यायपूर्ण सत्ता संरचनाओं के बीच अपने लिए नायकों की तलाश करता है।

तराई की यह कहानी केवल “डाकू बनाम सरकार” का द्वंद्व नहीं है। यह सत्ता, व्यक्ति और समुदाय के जटिल अंतर्संबंधों की कहानी है, जहाँ औपनिवेशिक शासन नियंत्रण और वर्गीकरण के माध्यम से समाज को परिभाषित करता है, जहाँ एक व्यक्ति अपने समय, परिस्थितियों और विकल्पों से निर्मित होता है और जहाँ एक पूरा समुदाय नीतिगत अन्याय का बोझ उठाता है। इन सबके बीच खड़ा लेखक, एक साक्षी के रूप में, इन घटनाओं को अमर तो करता है, परंतु पूर्णतः निष्पक्ष नहीं बना पाता।

इसलिए, सुल्ताना को न तो महिमामंडित करना उचित है, न ही उसे एकांगी रूप से खलनायक बना देना। उसे समझने के लिए आवश्यक है कि हम जंगल की कहानियों से आगे बढ़कर इतिहास की परतों में उतरेंकृजहाँ मिथक और यथार्थ, दोनों एक-दूसरे को चुनौती देते हैं और समृद्ध भी करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Translate »