गौतम चौधरी
पश्चिम एशिया एक बार फिर वैश्विक भू-राजनीति के केंद्र में है। संयुक्त राज्य अमेरिका, इज़रायल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव न केवल क्षेत्रीय स्थिरता को चुनौती दे रहा है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति और सामरिक संतुलन पर भी व्यापक प्रभाव डाल रहा है। इस जटिल परिदृश्य में पाकिस्तान की कथित मध्यस्थता और भारत की संतुलित कूटनीति, दोनों का गंभीर विश्लेषण बेहद जरूरी है। दरअसल, इस मामले को लेकर भारत के अंदर और बाहर वर्तमान नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार पर गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं।
खड़ी के वर्तमान तनाव की जड़ें गहरी और बहुआयामी हैं। परमाणु कार्यक्रम को लेकर विवाद, क्षेत्रीय प्रभाव की प्रतिस्पर्धा और प्रॉक्सी संघर्षों ने स्थिति को जटिल बना दिया है। इज़रायल, ईरान को अपनी सुरक्षा के लिए प्रत्यक्ष खतरा मानता है, जबकि ईरान, अमेरिका और इज़रायल की नीतियों को क्षेत्रीय अस्थिरता का स्रोत बताता रहा है। इस टकराव का प्रभाव खाड़ी क्षेत्र से कहीं आगे तक फैलता है, जिससे वैश्विक बाजारों और ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव बढ़ता है।
इस संपूर्ण तनावपूर्ण परिप्रेक्ष में हाल में पाकिस्तान की “संभावित मध्यस्थ” भूमिका पर कुछ अंतरराष्ट्रीय हलकों में चर्चा हुई है। सऊदी अरब और ईरान दोनों के साथ उसके ऐतिहासिक संबंध उसे संवाद का एक संभावित माध्यम बनाते हैं। यह भूमिका, यदि रचनात्मक रूप से निभाई जाए, तो तनाव कम करने में सहायक हो सकती है।
हालांकि, इस संभावना के साथ कुछ स्पष्ट सीमाएँ भी जुड़ी हैं-आर्थिक दबाव, आंतरिक राजनीतिक अस्थिरता और सीमित वैश्विक प्रभाव। ऐसे में पाकिस्तान की मध्यस्थता को एक “पूरक कूटनीतिक प्रयास” के रूप में देखना अधिक यथार्थवादी होगा, न कि निर्णायक समाधान के रूप में। फिर भी, संवाद की दिशा में कोई भी पहल, चाहे वह सीमित ही क्यों न हो, महत्व रखती है और उसकी सराहना होनी चाहिए।
कभी-कभी अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नेताओं के बयान भी विमर्श को प्रभावित करते हैं। डोनाल्ड ट्रंप जैसे नेताओं के वक्तव्यों या पश्चिमी देशों की पाकिस्तान के प्रति सकारात्मक टिप्पणियों को स्थायी नीति परिवर्तन के रूप में नहीं, बल्कि कूटनीतिक संकेतों या सामरिक संदेशों के रूप में समझना अधिक उपयुक्त होगा। ऐसी “प्रशंसा” कई बार किसी देश को सक्रिय भूमिका निभाने के लिए प्रेरित करने का साधन भी होती है।
इस पूरे परिदृश्य में भारत की भूमिका अपेक्षाकृत शांत लेकिन रणनीतिक रूप से स्पष्ट रही है। भारत ने न तो किसी एक पक्ष का खुला समर्थन किया है और न ही अनावश्यक बयानबाज़ी में हिस्सा लिया है। यह दृष्टिकोण “निष्क्रियता” नहीं, बल्कि “गणनात्मक संतुलन” का संकेत है। इसे भारत की बदलती हुई पारंपरिक कूटनीति के साथ भी नहीं जोड़ा जाना चाहिए। सदा से भारत की कूटनीति युद्ध के खिलाफ रही है। साथ ही, भारत किसी देश के आंतरिक मामलों में कभी हस्तक्षेप नहीं किया। यही नहीं भारत किसी भी प्रकार के आतंकवाद व उग्रवाद का विरोध करता रहा है। भारत वैश्विक दादागीरी के खिलाफ रहा है और किसी देश के अंदर किसी भी प्रकार के अधिनायकवाद का विरोध करता रहा है। वर्तमान परिस्थिति में भारत ने अपने पारंपरिक कूटनीति का ही परिचय दिया है। इसकी तुलना पाकिस्तान से करना गैरवाजिव है।
इस वर्तमान तनाव के बीच भारत के कूटनीतिकों ने रणनीतिक संतुलन का परिचय दिया है। इज़रायल के साथ मजबूत रक्षा संबंध और ईरान के साथ ऊर्जा व संपर्क परियोजनाएँ, दोनों को समानांतर बनाए रखना, कोई साधारण रणनीतिक कौशल नहीं है। दूसरी जो सबसे बड़ी उपलब्धि रही, वह है-ऊर्जा सुरक्षा, खाड़ी क्षेत्र भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं का प्रमुख स्रोत है। प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा के मामले में भी भारत ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लाखों भारतीय इस क्षेत्र में कार्यरत हैं। अपने लोगों की सुरक्षा के लिए भारत ने महत्वपूर्ण कदम उठाए और अपने लोगों की सुरक्षा में भारतीय कूटनीति सफल रही। बहुपक्षीय दृष्टिकोण के मामले में संवाद और कूटनीतिक समाधान पर जोर। यह संतुलन साधना आसान नहीं है लेकिन यही भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” का मूल है।
यहाँ एक महत्वपूर्ण अंतर उभरता है-जहाँ पाकिस्तान की भूमिका अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है, वहीं भारत की कूटनीति कम दिखाई देने के बावजूद अधिक स्थिर और प्रभावी प्रतीत होती है। अंतरराष्ट्रीय संबंधों में दृश्यता हमेशा प्रभावशीलता का संकेत नहीं होती; कई बार सबसे प्रभावी कूटनीति वही होती है जो सुर्खियों से दूर रहकर परिणाम देती है।
खाड़ी क्षेत्र का यह संकट केवल सैन्य शक्ति का नहीं, बल्कि कूटनीतिक परिपक्वता की भी परीक्षा है। पाकिस्तान की संभावित मध्यस्थता को उसकी सीमाओं के साथ समझना आवश्यक है, जबकि भारत की संतुलित नीति यह दर्शाती है कि जटिल वैश्विक परिस्थितियों में संयम और स्पष्टता कितनी महत्वपूर्ण होती है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे आवश्यक तत्व, संवाद है। क्योंकि दीर्घकालिक स्थिरता किसी एक पक्ष की जीत से नहीं, बल्कि सामूहिक समझ और कूटनीतिक समाधान से ही संभव होती है।
