विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट : आर्थिक संकट की चेतावनी या फिर सामान्य उतार-चढ़ाव?

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट : आर्थिक संकट की चेतावनी या फिर सामान्य उतार-चढ़ाव?

भारत का विदेशी मुद्रा भंडार एक बार फिर राष्ट्रीय आर्थिक बहस के केंद्र में आ गया है। हालिया आँकड़ों में विदेशी मुद्रा भंडार में दर्ज गिरावट ने अनेक प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सरकार इसे वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों का सामान्य प्रभाव बता रही है, जबकि आलोचक इसे भारतीय अर्थव्यवस्था की गहरी संरचनात्मक कमजोरियों का संकेत मान रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि विदेशी मुद्रा भंडार कुछ अरब डॉलर घटा या बढ़ा। असली प्रश्न यह है कि क्या भारत की अर्थव्यवस्था वास्तव में उतनी मजबूत और टिकाऊ है, जितनी राजनीतिक विमर्श और सरकारी प्रचार में दिखाई जाती है।

किसी भी देश का विदेशी मुद्रा भंडार उसकी आर्थिक स्थिरता का महत्वपूर्ण आधार माना जाता है। इसमें विदेशी मुद्राएँ, सोना, अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) में जमा संपत्तियाँ शामिल होती हैं। यही भंडार संकट के समय आयात भुगतान, मुद्रा विनिमय दर को स्थिर रखने और अंतरराष्ट्रीय निवेशकों का भरोसा बनाए रखने में मदद करता है।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में रिकॉर्ड स्तर का विदेशी मुद्रा भंडार अर्जित किया था। इसे सरकार ने अपनी आर्थिक नीतियों की सफलता के रूप में प्रस्तुत किया। लेकिन जब यही भंडार लगातार दबाव में दिखाई देता है, तो चिंता स्वाभाविक हो जाती है।

विदेशी मुद्रा भंडार में कमी के पीछे कई प्रत्यक्ष कारण मौजूद हैं। रुपये को अत्यधिक गिरावट से बचाने के लिए भारतीय रिज़र्व बैंक द्वारा डॉलर की बिक्री, कच्चे तेल की ऊँची कीमतें, विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय बाजार से पूँजी निकासी, अमेरिकी फेडरल रिज़र्व की ऊँची ब्याज दरें तथा वैश्विक युद्ध और आर्थिक अस्थिरता कृ ये सभी कारक दबाव पैदा कर रहे हैं।

दरअसल, जब अमेरिका में ब्याज दरें बढ़ती हैं, तो वैश्विक निवेशक उभरती अर्थव्यवस्थाओं से पैसा निकालकर अमेरिकी बाजारों की ओर रुख करते हैं। भारत भी इस प्रवृत्ति से अछूता नहीं रह सकता। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि वर्तमान दबाव का एक बड़ा हिस्सा वैश्विक परिस्थितियों से जुड़ा हुआ है।

लेकिन यहीं से बहस का दूसरा पक्ष सामने आता है। सरकार के आलोचक मानते हैं कि यदि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद उतनी मजबूत होती जितना दावा किया जाता है, तो विदेशी पूँजी का दबाव इतना तीव्र नहीं होता। उनके अनुसार समस्या केवल बाहरी नहीं, बल्कि आंतरिक भी है।

सबसे बड़ा प्रश्न रोजगार का है। पिछले वर्षों में GDP वृद्धि के बावजूद रोजगार सृजन अपेक्षित स्तर पर नहीं हुआ। बड़ी आबादी सीमित आय और कमजोर क्रयशक्ति के साथ जीवन गुजार रही है। ऐसी स्थिति में घरेलू मांग मजबूत नहीं बन पाती और अर्थव्यवस्था सरकारी खर्च तथा बाहरी निवेश पर अधिक निर्भर हो जाती है।

दूसरा प्रश्न “मेक इन इंडिया” अभियान की वास्तविक सफलता को लेकर उठता है। सरकार ने भारत को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने का लक्ष्य रखा था, लेकिन आज भी इलेक्ट्रॉनिक्स, ऊर्जा, रक्षा उपकरणों और औद्योगिक मशीनरी जैसे क्षेत्रों में भारी आयात निर्भरता बनी हुई है। इसका अर्थ है कि डॉलर की मांग लगातार ऊँची बनी रहती है, जिससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव पड़ता है।

तीसरा मुद्दा विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) पर अत्यधिक निर्भरता का है। भारतीय शेयर बाजार में विदेशी निवेश की भूमिका बड़ी है, लेकिन यह पूँजी अत्यंत अस्थिर होती है। वैश्विक माहौल बदलते ही निवेशक पैसा निकालना शुरू कर देते हैं। इससे रुपये पर दबाव बढ़ता है और विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग करना पड़ता है।

इसके साथ-साथ आर्थिक असमानता का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। आलोचकों का कहना है कि विकास का लाभ समाज के सीमित वर्ग तक केंद्रित होता जा रहा है, जबकि बड़ी आबादी की आय वृद्धि बहुत धीमी है। इससे उपभोग आधारित आर्थिक विस्तार सीमित हो जाता है और दीर्घकालीन आर्थिक स्थिरता कमजोर पड़ सकती है।

दूसरी ओर, केंद्र सरकार और उसके समर्थक इस पूरी बहस को अनावश्यक भय पैदा करने वाला विमर्श मानते हैं। उनका तर्क है कि भारत अब भी दुनिया के सबसे बड़े विदेशी मुद्रा भंडार वाले देशों में शामिल है और मौजूदा भंडार कई महीनों के आयात भुगतान के लिए पर्याप्त है।

सरकार यह भी कहती है कि कोविड महामारी, रूस-यूक्रेन युद्ध और वैश्विक आर्थिक मंदी जैसी परिस्थितियों के बावजूद भारत अपेक्षाकृत स्थिर बना रहा है। भारतीय रिज़र्व बैंक की सक्रिय मुद्रा प्रबंधन नीति ने रुपये को गंभीर संकट से बचाए रखा है।

इसके अतिरिक्त, सरकार भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिनाती है और अवसंरचना निर्माण, डिजिटलीकरण तथा वैश्विक निवेश आकर्षित करने को अपनी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत करती है।

यह तर्क भी दिया जाता है कि विदेशी मुद्रा भंडार का उपयोग संकट की स्थिति में ही किया जाता है; इसलिए केवल गिरावट को आर्थिक संकट का संकेत मान लेना उचित नहीं।

दरअसल, इस पूरी चर्चा का केंद्रीय प्रश्न केवल विदेशी मुद्रा भंडार का आकार नहीं है। असली मुद्दा यह है कि भारतीय अर्थव्यवस्था की संरचना कितनी टिकाऊ और संतुलित है।

यदि अर्थव्यवस्था पर्याप्त रोजगार नहीं पैदा कर रही, निर्यात प्रतिस्पर्धी नहीं बन पा रहे, आयात निर्भरता बनी हुई है और घरेलू मांग कमजोर है, तो केवल ऊँचा विदेशी मुद्रा भंडार लंबे समय तक स्थिरता की गारंटी नहीं दे सकता।

किसी भी अर्थव्यवस्था की वास्तविक शक्ति उसके उत्पादन, रोजगार, तकनीकी क्षमता और जनता की क्रयशक्ति में निहित होती है, केवल वित्तीय आँकड़ों में नहीं।

विदेशी मुद्रा भंडार में हालिया गिरावट को न तो तत्काल आर्थिक तबाही का संकेत कहा जा सकता है और न ही इसे पूरी तरह सामान्य मानकर नजरअंदाज किया जा सकता है।

यह घटना भारतीय अर्थव्यवस्था की कुछ गहरी चुनौतियों की ओर संकेत अवश्य करती है, विशेषकर आयात निर्भरता, रोजगार संकट, असमानता और विदेशी वित्तीय पूँजी पर अत्यधिक भरोसे की ओर।

यह भी सच है कि पिछले वर्षों में भारत ने अवसंरचना, डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक निवेश आकर्षण के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि विकास की चमकदार तस्वीर के पीछे कई संरचनात्मक प्रश्न अब भी अनसुलझे हैं।

विदेशी मुद्रा भंडार में गिरावट ने उसी बहस को फिर सामने ला दिया है, क्या भारत की अर्थव्यवस्था वास्तव में मजबूत आधारों पर खड़ी है, या वह अभी भी वैश्विक पूँजी और अस्थायी वित्तीय प्रवाहों के सहारे संतुलन बनाए हुए है?

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