भारत में कौशल का संकट और ITI व्यवस्था  की सच्चाई 

भारत में कौशल का संकट और ITI व्यवस्था  की सच्चाई 

भारत लंबे समय से अपनी युवा आबादी को “डेमोग्राफिक डिविडेंड” के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। यह दावा किया जाता है कि देश की विशाल युवा शक्ति आर्थिक विकास की सबसे बड़ी पूंजी बन सकती है। इसी सोच के केंद्र में Industrial Training Institute (ITI) जैसी संस्थाएँ रखी गईं, जिनका उद्देश्य युवाओं को रोजगारोन्मुख कौशल प्रदान करना है। परंतु हाल ही में शुरू किए गए ITI “ट्रे़सर सर्वे” ने एक असहज लेकिन आवश्यक प्रश्न को सामने ला खड़ा किया है—क्या भारत की कौशल विकास व्यवस्था वास्तव में रोजगार सृजित कर रही है, या केवल प्रशिक्षण और प्रमाणपत्रों की संख्या बढ़ाने तक सीमित हो गई है?

सरकार द्वारा 2026 में आरंभ किया गया यह ट्रे़सर सर्वे इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है कि पहली बार व्यवस्थित रूप से यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि ITI से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं को रोजगार मिला या नहीं, वे किस प्रकार के कार्य में लगे हैं, उनकी आय कितनी है और उनकी नौकरियाँ कितनी स्थायी हैं। वस्तुतः अब तक कौशल विकास व्यवस्था में “आउटकम ट्रैकिंग” लगभग अनुपस्थित रही है। प्रशिक्षण पूरा होने के बाद छात्रों का भविष्य व्यवस्था की प्राथमिकता नहीं बन पाया था। इसलिए यह सर्वे केवल एक प्रशासनिक अभ्यास नहीं, बल्कि व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का दर्पण सिद्ध हो सकता है।

आज देश में लगभग पंद्रह हजार ITI संस्थान संचालित हैं, जिनमें लगभग तीन-चौथाई निजी क्षेत्र के हैं। हर वर्ष लाखों छात्र इन संस्थानों से निकलते हैं। संख्या के स्तर पर यह विस्तार प्रभावशाली दिखाई देता है, किंतु रोजगार संबंधी आंकड़े एक जटिल और चिंताजनक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं। पुराने सरकारी अध्ययनों में भले ही रोजगार प्राप्त करने वालों का प्रतिशत अपेक्षाकृत संतोषजनक दिखाया गया हो, परंतु विभिन्न राज्य स्तरीय रिपोर्टें बताती हैं कि प्रशिक्षण के तुरंत बाद नियमित नौकरी पाने वाले युवाओं की संख्या अत्यंत सीमित है। बड़ी संख्या में प्रशिक्षित युवा लंबे समय तक बेरोजगार रहते हैं या फिर ऐसे कार्य करने को विवश होते हैं जिनका उनके प्रशिक्षण से कोई संबंध नहीं होता।

यह स्थिति दर्शाती है कि भारत ने कौशल विकास के क्षेत्र में “संख्या” को तो प्राथमिकता दी, लेकिन “गुणवत्ता” को नहीं। पिछले एक दशक में ITI संस्थानों की संख्या तेजी से बढ़ी, परंतु प्रशिक्षकों की भारी कमी, पुरानी मशीनें, अप्रासंगिक पाठ्यक्रम और कमजोर प्रयोगशालाएँ आज भी सामान्य समस्या बनी हुई हैं। तकनीकी शिक्षा का वह ढांचा, जिसे उद्योगों की बदलती जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए था, कई स्थानों पर अभी भी पुराने मॉडल पर चल रहा है। परिणामस्वरूप प्रशिक्षण और उद्योग की वास्तविक मांग के बीच गहरी खाई उत्पन्न हो गई है।

सबसे बड़ी समस्या उद्योगों से कमजोर जुड़ाव की है। किसी भी प्रभावी vocational education system की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह उत्पादन और उद्योग से कितना जुड़ा हुआ है। भारत में अधिकांश ITI संस्थानों के पास उद्योगों के साथ स्थायी साझेदारी नहीं है। apprenticeship के अवसर सीमित हैं और कुल छात्रों का केवल एक छोटा हिस्सा ही व्यावहारिक औद्योगिक अनुभव प्राप्त कर पाता है। ऐसे में छात्र प्रमाणपत्र तो प्राप्त कर लेते हैं, परंतु “job-ready” नहीं बन पाते।

रोजगार की गुणवत्ता का प्रश्न भी उतना ही गंभीर है। जिन युवाओं को रोजगार मिलता भी है, उनकी शुरुआती आय अक्सर इतनी कम होती है कि वह सम्मानजनक जीवनयापन की गारंटी नहीं देती। बड़ी संख्या में नौकरियाँ अस्थायी, ठेका आधारित और सामाजिक सुरक्षा से रहित होती हैं। यह स्थिति केवल बेरोजगारी का नहीं, बल्कि “असुरक्षित रोजगार” का संकट भी उत्पन्न करती है। यदि कौशल विकास युवाओं को आर्थिक स्थिरता ही न दे सके, तो उसकी उपयोगिता पर स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठेंगे।

भारत और चीन की तुलना इस संदर्भ में महत्वपूर्ण है। चीन ने vocational education को सीधे औद्योगिक उत्पादन और विनिर्माण नीति से जोड़ा। वहाँ माध्यमिक स्तर से ही बड़ी संख्या में छात्र vocational stream चुनते हैं और उद्योगों की सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित की जाती है। इसके विपरीत भारत में vocational education अभी भी मुख्यधारा की शिक्षा के मुकाबले कम प्रतिष्ठित मानी जाती है। उद्योगों और प्रशिक्षण संस्थानों के बीच समन्वय सीमित है, जिससे कौशल का वास्तविक उपयोग नहीं हो पाता।

स्पष्ट है कि समस्या केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि नीति और क्रियान्वयन के बीच बढ़ती दूरी की भी है। निजी ITI संस्थानों में गुणवत्ता नियंत्रण कमजोर है, निगरानी तंत्र प्रभावी नहीं है और डेटा आधारित नीति निर्माण का अभाव लंबे समय से महसूस किया जाता रहा है। ऐसे में ट्रे़सर सर्वे को एक सकारात्मक पहल माना जा सकता है, क्योंकि बिना विश्वसनीय आंकड़ों के किसी भी सुधार की दिशा तय नहीं की जा सकती।

किन्तु केवल सर्वेक्षण कर लेना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता इस बात की है कि उसके निष्कर्षों को नीतिगत सुधारों में बदला जाए। apprenticeship को व्यापक और अनिवार्य बनाया जाए, उद्योगों को प्रशिक्षण प्रक्रिया का वास्तविक भागीदार बनाया जाए, संस्थानों की जवाबदेही तय की जाए तथा रोजगार की गुणवत्ता को नीति का केंद्रीय लक्ष्य बनाया जाए। कौशल विकास को केवल प्रमाणपत्र वितरण की प्रक्रिया नहीं, बल्कि आर्थिक उत्पादकता और सामाजिक स्थिरता से जुड़ी राष्ट्रीय परियोजना के रूप में देखना होगा।

अंततः प्रश्न यही है कि क्या भारत कौशल निर्माण की दिशा में आगे बढ़ रहा है, या केवल आंकड़ों के विस्तार को उपलब्धि मान रहा है। यदि प्रशिक्षण के बाद भी लाखों युवा रोजगार की अनिश्चितता में भटकते रहेंगे, तो कौशल विकास की पूरी अवधारणा खोखली प्रतीत होगी। ट्रे़सर सर्वे इस यथार्थ को उजागर करने की शुरुआत है; अब चुनौती यह है कि क्या व्यवस्था इस सच का सामना करने और सुधार के कठिन निर्णय लेने का साहस दिखाएगी।

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