गौतम चौधरी
भारत की राजनीति में कई बार सबसे गंभीर आर्थिक संकेत सीधे सरकारी घोषणाओं में नहीं, बल्कि सार्वजनिक अपीलों की भाषा में छिपे होते हैं। जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्क-फ्रॉम-होम को प्रोत्साहित करने, विदेशी यात्राएँ सीमित रखने और सोने की खरीद में संयम बरतने की सलाह देते हैं, तो उसे केवल नैतिक आग्रह मान लेना शायद पर्याप्त नहीं होगा। यह उन परिस्थितियों की आहट भी हो सकती है, जिनमें सरकार जनता को धीरे-धीरे संभावित आर्थिक दबाव के लिए मानसिक रूप से तैयार करती है।
कुछ समय पहले प्रतिपक्षी नेता राहुल गांधी ने दावा किया था कि “पाँच राज्यों के चुनाव के बाद महँगाई तेज़ी से बढ़ेगी।” उस समय इसे सामान्य राजनीतिक आरोप मानकर खारिज कर दिया गया था। किंतु अब जब सत्ता पक्ष स्वयं ऊर्जा बचत और संसाधन संयम की भाषा बोल रहा है, तो यह प्रश्न स्वाभाविक हो जाता है कि क्या सरकार को आने वाले आर्थिक दबावों का पूर्वाभास है?
भारत की सबसे बड़ी चुनौती उसकी ऊर्जा निर्भरता है। देश अपनी तेल आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात करता है। पश्चिम एशिया में बढ़ता भू-राजनीतिक तनाव, भारत जैसे देशों के लिए केवल कूटनीतिक चिंता नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आर्थिक खतरा भी है। कच्चे तेल की कीमतों में वृद्धि का प्रभाव केवल पेट्रोल और डीज़ल तक सीमित नहीं रहेगा, यह परिवहन, कृषि, निर्माण, उद्योग और रोज़मर्रा की उपभोक्ता वस्तुओं तक विस्तार पाएगा। अंततोगत्वा पूरा आर्थिक ढाँचा महँगाई के दबाव में आ जाएगा।
ऊर्जा संकट और महँगाई का संबंध सीधा और कठोर है, कच्चा तेल महँगा होता है, तो परिवहन लागत बढ़ती है; परिवहन महँगा होता है, तो उत्पादन लागत बढ़ती है; उत्पादन महँगा होता है, तो खाद्य और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें ऊपर जाती हैं; और अंततः सामान्य नागरिक की क्रय-शक्ति कमजोर हो जाती है। हालांकि देश के कई चर्चित अर्थशास्त्री लगातार इस ओर इशारा कर रहे हैं। खुद वित्तमंत्री निर्मला सीतारमन के पति परकाला प्रभाकर इस प्रकार के संकट की ओर कई मंचों से, कई बार आगाह कर चुके हैं।
अब खुद सरकार के मुखिया इस संकट की आहट को दुहरा रहे हैं। सरकारें अक्सर संकट आने से पहले “व्यवहार परिवर्तन” की अपील करती हैं। कोविड काल में वर्क-फ्रॉम-होम केवल स्वास्थ्य सुरक्षा का उपाय नहीं था; उसने ईंधन खपत, यातायात दबाव और शहरी खर्चों को भी सीमित किया। आज उसी मॉडल की पुनर्चर्चा केवल प्रशासनिक सुविधा नहीं लगती, बल्कि ऊर्जा संरक्षण की रणनीति का हिस्सा प्रतीत होती है।
सोने की खरीद को लेकर दिया गया संकेत भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। भारत में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि आर्थिक असुरक्षा के समय भरोसेमंद निवेश माना जाता है। जब जनता भविष्य को लेकर आशंकित होती है, तो वह बैंकिंग और बाज़ार से अधिक सोने की ओर आकर्षित होती है। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है, क्योंकि भारत बड़े पैमाने पर सोना आयात करता है। ऐसे में सरकार का संयम का संदेश वस्तुतः विदेशी मुद्रा प्रबंधन की चिंता से भी जुड़ा दिखाई देता है।
लेकिन यहीं सबसे बड़ा राजनीतिक विरोधाभास उभरता है। एक ओर सरकार लगातार भारत को दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था, स्थिर बाज़ार और उभरती वैश्विक शक्ति के रूप में प्रस्तुत करती रही है; दूसरी ओर अब जनता से ऊर्जा बचत, संयम और अनावश्यक खर्चों में कटौती की अपील कर रही है। विपक्ष स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठाएगा कि यदि आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत है, तो फिर जनता को पहले से सावधानी बरतने के संकेत क्यों दिए जा रहे हैं?
हालाँकि यह भी उतना ही सत्य है कि किसी भी जिम्मेदार सरकार का दायित्व केवल विकास का प्रचार करना नहीं, बल्कि संभावित संकटों के प्रति तैयारी करना भी होता है। यदि वैश्विक परिस्थितियाँ अस्थिर हैं, तो ऊर्जा बचत और सीमित उपभोग की सलाह को दूरदर्शी नीति भी कहा जा सकता है। समस्या तब उत्पन्न होती है, जब सरकार जनता के साथ स्पष्ट आर्थिक संवाद के बजाय केवल प्रतीकात्मक संदेशों तक सीमित रह जाती है।
भारत की जनता महँगाई के अनेक दौर देख चुकी है, लेकिन वर्तमान परिस्थिति अलग है। यह केवल घरेलू आर्थिक प्रबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति, ऊर्जा सुरक्षा और उपभोक्ता जीवनशैली, तीनों के टकराव से निर्मित चुनौती है। आने वाले समय में यदि तेल की कीमतें बढ़ती हैं और महँगाई तेज़ होती है, तो उसका प्रभाव केवल रसोई तक सीमित नहीं रहेगा; वह रोजगार, निवेश, मध्यम वर्ग की बचत और राजनीतिक विमर्श, सभी को प्रभावित करेगा।
संभव है कि सरकार की अपीलें केवल एहतियाती हों। संभव यह भी है कि वे आने वाले आर्थिक दबावों की प्रारंभिक चेतावनी हों। लेकिन इतना स्पष्ट है कि भारत अब उस दौर में प्रवेश कर रहा है, जहाँ ऊर्जा और अर्थव्यवस्था की बहस केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रहेगी; वह राजनीति और जनजीवन का केंद्रीय प्रश्न बनने जा रही है।
