गौतम चौधरी
भारत इस समय एक ऐसे मौसमी विरोधाभास के बीच खड़ा है, जिसे पारंपरिक समझ से समझ पाना अब संभव नहीं रह गया है। एक ओर केंद्र सरकार हीटवेव, जल संकट और संभावित बाढ़ को लेकर लगातार चेतावनियाँ जारी कर रही है, दूसरी ओर कई क्षेत्रों में औसत वर्षा के आँकड़े बढ़ने के संकेत मिल रहे हैं। झारखंड, पूर्वाेत्तर और कुछ मध्य भारतीय क्षेत्रों में वर्षा की तीव्रता बढ़ी है, फिर भी जल संकट और कृषि असुरक्षा गहराती जा रही है।
यहीं से वह मूल प्रश्न जन्म लेता है, जिसे सरकारी विमर्श अक्सर टाल देता है, यदि बारिश बढ़ रही है, तो समाज प्यासा क्यों होता जा रहा है?
दरअसल, आधुनिक जलवायु संकट को केवल “कम” या “ज्यादा” बारिश के पुराने पैमानों से समझना अब संभव नहीं है। जलवायु परिवर्तन का चरित्र रैखिक नहीं, बल्कि अस्थिर और चरम होता जा रहा है। पहले मानसून समय और भूगोल के स्तर पर अपेक्षाकृत संतुलित था। अब वही बारिश कुछ दिनों में अत्यधिक तीव्रता से गिरती है और फिर लंबे शुष्क अंतराल छोड़ जाती है। परिणामस्वरूप आँकड़ों में वर्षा बढ़ती दिखाई देती है, लेकिन धरती की नमी घटती जाती है।
यानी संकट पानी की अनुपस्थिति का नहीं, बल्कि पानी के असंतुलित व्यवहार का है। झारखंड इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण अवश्य है, लेकिन समस्या राष्ट्रीय है। देश के अनेक हिस्सों में वर्षा अब “धीमी जीवनदायिनी प्रक्रिया” कम और “अचानक आपदा” अधिक बनती जा रही है। कुछ घंटों की मूसलाधार बारिश नदियों को उफान पर ला देती है, शहर डूब जाते हैं, लेकिन वही पानी भूजल में नहीं उतर पाता। कुछ ही दिनों बाद वही क्षेत्र पेयजल संकट और सूखे जैसी परिस्थितियों से जूझने लगते हैं।
यहीं आधुनिक विकास मॉडल की सबसे बड़ी विफलता सामने आती है। दशकों से विकास को जंगलों की कटाई, खनन विस्तार, नदी-प्रवाह नियंत्रण और कंक्रीट आधारित शहरीकरण के रूप में परिभाषित किया गया। प्राकृतिक जलसंचय प्रणालियाँ नष्ट हुईं, तालाब और आर्द्रभूमियाँ सिकुड़ती गईं, और मिट्टी की जलधारण क्षमता कमजोर होती चली गई। परिणाम यह हुआ कि प्रकृति का संतुलनकारी तंत्र टूटने लगा। अब बारिश “संसाधन” कम और “खतरा” अधिक महसूस होने लगी है।
विडंबना यह है कि सरकारें अब भी इस संकट को मुख्यतः राहत और आपदा प्रबंधन की दृष्टि से देखती हैं। हीटवेव पर अलर्ट, बाढ़ पर राहत शिविर, सूखे पर मुआवजा-ये सब आवश्यक कदम हैं, लेकिन ये लक्षणों का उपचार हैं, बीमारी का नहीं। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या हमारा विकास मॉडल स्वयं जलवायु अस्थिरता को बढ़ा रहा है?
यदि शहर जलनिकासी मार्गों पर खड़े होंगे, यदि नदियों को केवल परियोजना मानकर नियंत्रित किया जाएगा, यदि जंगलों को “उपयोगी भूमि” में बदला जाएगा, तो फिर हर वर्ष नई आपदाएँ केवल प्राकृतिक नहीं कहलाएँगी, वे नीतिगत भी होंगी।
सबसे गंभीर पक्ष यह है कि इस संकट का बोझ समान रूप से नहीं बंटता। जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा भार वही समाज उठाता है, जिसकी भूमिका इसे पैदा करने में सबसे कम रही है-छोटे किसान, आदिवासी समुदाय, ग्रामीण मजदूर और शहरी गरीब। मौसम की अनिश्चितता ने कृषि के पारंपरिक ज्ञान को कमजोर कर दिया है। किसान अब यह तय नहीं कर पा रहा कि बुआई कब करे, क्योंकि मौसम का स्वभाव अनुमान से बाहर होता जा रहा है।
इसलिए जलवायु परिवर्तन की बहस को केवल कार्बन उत्सर्जन, अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों और सरकारी घोषणाओं तक सीमित नहीं रखा जा सकता। यह अब जल, जमीन, खाद्य सुरक्षा, विकास नीति और सामाजिक न्याय का प्रश्न बन चुका है।
भारत को यह स्वीकार करना होगा कि केवल अधिक वर्षा का अर्थ जल सुरक्षा नहीं होता। यदि विकास प्रकृति-विरोधी होगा, तो बढ़ती बारिश भी समाज को प्यासा छोड़ देगी और शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा पर्यावरणीय और राजनीतिक विरोधाभास है-बारिश बढ़ रही है, लेकिन पानी घटता जा रहा है।
