सरदूल सिंह
नया सत्र शुरू होते ही सरकारी स्कूलों में घटते नामांकन और उनके बंद होने या अन्य स्कूलों में विलय करने की खबरें आम हो गई हैं। वर्तमान में राजस्थान सरकार ने जहां नामांकन 15 से कम है उन प्राथमिक विद्यालयों की रिपोर्ट मांगी गई है। चर्चा है कि प्रदेश के लगभग 7000 स्कूलों को बंद या मर्ज करने की तैयारी चल रही है। अगर ऐसा होता है तो अभावग्रस्त विद्यार्थियों का शिक्षा से दूर होना तय है तथा नई भर्ती की आशा में बैठे युवकों को रोजगार प्राप्त करना भी असंभव हो जाएगा। केवल अमीर परिवारों के विद्यार्थी ही गुणवत्तापूर्ण तथा उच्च शिक्षा प्राप्त कर पाएंगे।
सरकार का तर्क है कि कम बच्चों वाले स्कूलों पर होने वाला खर्च व्यर्थ है, अतः बजट बचाने के लिए यह कदम उठाना आवश्यक है लेकिन क्या यह प्रक्रिया स्वाभाविक है या किसी सोची-समझी नीति का हिस्सा? यह एक गंभीर प्रश्न है।
यह स्थिति केवल राजस्थान की नहीं बल्कि पूरे भारत की है। 20 वर्ष पहले सरकारी स्कूलों में कुल बच्चों में से 71 प्रतिशत बच्चे थे जो अब घटकर मात्र 49 प्रतिशत रह गए हैं । राजस्थान के आंकड़े और भी चिंताजनक हैं। पिछले पांच वर्षों में निजी स्कूलों में जहां नामांकन बढ़ा है, वहीं सरकारी स्कूलों का ग्राफ तेजी से नीचे गिरा है। इसका सीधा संबंध 1990 के बाद अपनाई गई वैश्वीकरण और निजीकरण की नीतियों से है। सार्वजनिक संस्थाओं को या तो बेचा गया या उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया ताकि जनता का उनसे मोहभंग हो सके।
विडंबना यह है कि शिक्षा, चिकित्सा और परिवहन जैसी मूलभूत आवश्यकताओं का जितना अधिक निजीकरण होगा, वे आम जनता की पहुंच से उतनी ही दूर होती जाएंगी। लोगों को अपनी क्रय शक्ति का ज्यादा खर्च इन सेवाओं को प्राप्त करने के लिए करना पड़ेगा जो उन पर तो बोझ बनेगा और मुनाफा कमाने वालों की जेब में वह धन अधिकाधिक रूप में एकत्रित होता चला जाएगा जो सामाजिक असमानता को बढ़ाता है जिसे सार्वजनिक क्षेत्र की तुलना में बढ़ते निजी शिक्षण संस्थाओं, निजी अस्पतालों और परिवहन सेवाओं के रूप में देखा जा सकता है.
सवाल यह उठता है कि सरकारी स्कूलों में नामांकन गिर क्यों रहा है? अगर हम तथ्यों पर नजर डालें, तो राजस्थान में सरकारी शिक्षकों के लगभग सवा लाख पद रिक्त हैं। भवन और सुविधाओं की स्थिति यह है कि पिछले वर्ष एक स्कूल की छत गिरने से हुई दुर्घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। उच्च न्यायालय के संज्ञान लेने के बाद शिक्षा विभाग की रिपोर्ट में करीब 87,000 कक्षा-कक्षों को ‘अयोग्य’ करार दिया गया, लेकिन स्थिति जस की तस बनी हुई है। भवन, खेल तथा अन्य सुविधाएं कॉर्पोरेट के मुनाफों का कुछ अंश जन सहभागिता के नाम पर या दानदाताओं के भरोसे उपलब्ध करवाया जा रहा है। बजट और तकनीकी विशेषज्ञों के अभाव में नए भवनों का निर्माण अधर में लटका हुआ है। इसी अव्यवस्था के चलते पिछले 4 वर्षों में लगभग 10 लाख बच्चों ने स्कूल छोड़ दिया और 1500 स्कूल कम हो गए। प्रदेश के 6000 से अधिक स्कूल आज भी ‘एकल शिक्षक’ के भरोसे चल रहे हैं।
एक साधारण समझ वाला व्यक्ति भी यह समझ सकता है कि यदि सरकारी स्कूलों में आधुनिक समाज की जरूरत के अनुसार पर्याप्त शिक्षक, स्वच्छ पेयजल, शौचालय और सुरक्षित भवन उपलब्ध हों, प्रत्येक बच्चे का दैनिक मूल्यांकन हो, उसे हर रोज पढ़ाया जाए, गृह कार्य या अन्य मूल्यांकन के आधार पर बच्चों का हर रोज मूल्यांकन कर विकास किया जाए तो कोई भी अभिभावक महंगे निजी स्कूलों का रुख क्यों करेगा?
यदि कानूनी रूप से सारी शिक्षा को निशुल्क तथा प्रत्येक को योग्यता अनुसार रोजगार गारंटी देते हुए शिक्षकों की भर्ती कर शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों (जैसे जनगणना या अन्य सरकारी सर्वे) से मुक्त कर दिया जाए और उनका पूरा ध्यान केवल बच्चों के सर्वांगीण विकास पर हो तो नामांकन में कभी कमी नहीं आएगी। इससे न केवल शिक्षा की गुणवत्ता सुधरेगी, बल्कि लाखों बेरोजगार योग्यताधारी युवाओं को रोजगार भी मिलेगा।
कल्पना करें एकल अध्यापक वाले प्राथमिक विद्यालय में 6 अध्यापक, सफाई कर्मचारी, कंप्यूटर कर्मचारी भर्ती किए जाएं तो कितनी बड़ी संख्या में युवा पीढ़ी को रोजगार तथा बालकों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिल पाएगी।
वर्तमान में सरकार एक तरफ तो साइकिल, कंप्यूटर और पोषाहार जैसी सुविधाओं का ढिंढोरा पीटती है लेकिन दूसरी तरफ शिक्षकों की भारी कमी को नजरअंदाज करती है। स्कूलों में शिक्षकों की कमी को ‘डिजिटल लर्निंग’ या ‘कंप्यूटर’ से भरने की कोशिश की जा रही है। तकनीक शिक्षा सहायक तो हो सकती है, लेकिन वह उस जीवंत संवाद और व्यक्तिगत जुड़ाव का विकल्प कभी नहीं बन सकती, जो एक शिक्षक और विद्यार्थी के बीच होता है। बच्चे कोई यंत्र नहीं हैं, वे मानवीय संवेदनाओं और संवाद से सीखते हैं।नामांकन की कमी का बहाना बनाकर स्कूलों को बंद करना वास्तव में निजीकरण की नीति को खाद-पानी देना है। समाज के हित में ‘निजीकरण’ नहीं बल्कि ‘सार्वजनिकीकरण’ अनिवार्य है।
यदि प्रत्येक विद्यालय में कक्षा वार, विषयावार सभी पदों पर शिक्षकों की नियुक्ति हो और वहां बुनियादी ढांचा मजबूत किया जाए, तो नामांकन घटने के बजाय बढ़ेंगे और सरकार को नए स्कूल खोलने पड़ेंगे।
शिक्षा कोई व्यापार नहीं, बल्कि मानव संसाधन को तराशने की प्रक्रिया है। यदि इसे मुनाफे पर आधारित व्यवसाय बनाया गया, तो हम भविष्य के लिए योग्य नागरिक नहीं, बल्कि केवल उपभोक्ता तथा व्यवसायी ही तैयार करेंगे। अतः सरकार को अपनी नीतियों को निजीकरण की बजाय सार्वजनिकीकरण करना होगा। प्रत्येक को निशुल्क शिक्षा तथा प्रत्येक को योग्यता अनुसार रोजगार की गारंटी का कानून बनाकर ही निजीकरण की प्रवृत्ति को रोका जा सकता है। इससे निजी क्षेत्र में काम करने वाले कार्मिकों का शोषण रुकेगा तथा अभिभावकों की जेबों पर भी बोझ नहीं बढ़ेगा। गांव-ढाणी तक शिक्षा की लौ जलाए रखने के लिए स्कूलों को बंद करने के बजाय उन्हें संसाधनों से सुसज्जित करना तथा नियमित और पूर्ण वेतन पर स्थाई शिक्षकों की समयबद्ध भर्ती करना ही समय की मांग है।
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