महामारी, मीडिया और भय का बाज़ार : क्या वैश्विक स्वास्थ्य समाचारों के पीछे केवल जनहित है या कुछ और भी?

महामारी, मीडिया और भय का बाज़ार : क्या वैश्विक स्वास्थ्य समाचारों के पीछे केवल जनहित है या कुछ और भी?

दरअसल, आज सुबह एक वरिष्ठ मित्र के साथ प्रभात भ्रमण के बाद, उनके आवास पर चाय पीने के लिए बैठ गया। चाय की चुश्की के साथ अखबार का आनंद ही और होता है। सो, दैनिक हिन्दी प्रभात खबर अखबार पढ़ने लगा। पन्ना उलटते-पलटते अंतिम पन्ने पर एक खबर पर नजर गयी। उस खबर से भारत के लोगों को कोई लेना-देना नहीं है, बावजूद चार-पांच कॉलम की खबर देखकर थोड़ा आश्चर्य हुआ। खबर स्वास्थ्य से संबंधित था। अफ्रीकी देश, कांगो में इबोला वायरस के कारण 87 लोगों की मौत की खबर पढ़ कर थोड़ा अजीब-सा लगा। मैंने उसी समय तय कर लिया, आज इस मामले पर भी अपना आलेख लिखूंगा। मैंने चैटजीपीटी से थोड़ी जानकारी एकत्रित की और आलेख के साथ अपने पाठकों के समक्ष उपस्थित हूं।

इक्कीसवीं सदी का मनुष्य तकनीकी रूप से जितना विकसित हुआ है, उतना ही भयग्रस्त भी दिखाई दे रहा है। कभी आतंकवाद, कभी युद्ध, कभी आर्थिक मंदी और अब बार-बार उभरती वैश्विक महामारियाँ – आधुनिक समाज लगातार किसी न किसी अदृश्य संकट की मनोवैज्ञानिक छाया में जी रहा है। हाल के वर्षों में यह प्रवृत्ति और तेज हुई है कि दुनिया के किसी दूरस्थ कोने में फैली बीमारी भी भारतीय मीडिया में अचानक “ब्रेकिंग न्यूज़” बन जाती है। हाल ही में अफ्रीकी देश कांगो में फैले इबोला वायरस और उससे हुई मौतों की खबरों को जिस प्रमुखता से भारतीय अखबारों और चौनलों में प्रस्तुत किया गया, उसने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या यह केवल स्वास्थ्य पत्रकारिता है, या इसके पीछे भय-आधारित सूचना-राजनीति भी काम कर रही है?

यह प्रश्न पूरी तरह निराधार नहीं कहा जा सकता। COVID-19 महामारी के बाद वैश्विक स्वास्थ्य संस्थाओं, दवा कंपनियों, मीडिया और सरकारों के संबंधों को लेकर लोगों के भीतर गहरा अविश्वास पैदा हुआ है। लॉकडाउन, वैक्सीन राजनीति, दवा कंपनियों के मुनाफे और लगातार बदलते वैज्ञानिक दावों ने आम जनता को यह सोचने पर मजबूर किया कि कहीं स्वास्थ्य संकट भी वैश्विक सत्ता और बाजार का नया औजार तो नहीं बनता जा रहा।

दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि संक्रामक रोग सीमाओं में कैद नहीं रहते। आज दुनिया इतनी जुड़ी हुई है कि अफ्रीका, एशिया और यूरोप के बीच यात्रा और व्यापार लगातार चलते रहते हैं। इसलिए किसी भी खतरनाक वायरस की जानकारी को पूरी तरह नजरअंदाज करना भी व्यावहारिक नहीं है। यही वह बिंदु है जहाँ संतुलित और आलोचनात्मक दृष्टि विकसित करने की जरूरत है।

समस्या केवल बीमारी नहीं है, बल्कि बीमारी की व्याख्या और प्रस्तुति है। आधुनिक मीडिया का बड़ा हिस्सा अब सूचना से अधिक कल्पना और स्वप्न बेचता है। डर सबसे तेजी से बिकने वाली चीज़ है। आज के समाचार माध्यम का एक तबका इस डर का बेहद बारीकी से व्यापार कर रहा है। “नया वायरस”, “सैकड़ों मौतें”, “वैश्विक खतरा”, “WHO का अलर्ट” – ये शब्द पाठकों व दर्शकों की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया को तुरंत सक्रिय कर देते हैं। परिणामस्वरूप स्वास्थ्य समाचार कई बार जन-जागरूकता से अधिक जन-आतंक का माध्यम बन जाते हैं।

यहीं से षड्यंत्र संबंधी धारणाएँ जन्म लेती हैं। लोग देखते हैं कि पहले मीडिया में लगातार किसी वायरस की चर्चा शुरू होती है, फिर कुछ महीनों बाद वही बीमारी दूसरे देशों तक पहुँचती दिखाई देती है। धीरे-धीरे यह भावना बनती है कि “कुछ तो है” जो सामान्य नहीं है। हालाँकि केवल घटनाओं के क्रम को देखकर षड्यंत्र सिद्ध नहीं किया जा सकता। अक्सर ऐसा इसलिए भी होता है क्योंकि वैश्विक स्वास्थ्य एजेंसियाँ शुरुआती संकेत मिलते ही चेतावनी जारी करने लगती हैं और मीडिया उन्हें तुरंत प्रसारित कर देता है।

फिर भी यह कहना गलत नहीं होगा कि आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पूरी तरह निष्पक्ष और निर्दाेष नहीं है। फार्मास्यूटिकल उद्योग दुनिया के सबसे लाभकारी उद्योगों में से एक है। वैक्सीन, दवाइयाँ, मेडिकल उपकरण और स्वास्थ्य बीमा कृ इन सबके पीछे विशाल आर्थिक हित जुड़े होते हैं। इतिहास में कई बार दवा कंपनियों पर डेटा छिपाने, दुष्प्रभावों को कम करके दिखाने या आक्रामक मार्केटिंग के आरोप लगे हैं। इसलिए जनता द्वारा सवाल पूछना लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक दोनों दृष्टि से आवश्यक है।

यहाँ एक महत्वपूर्ण सीमा भी है। आलोचनात्मक सोच और अंध-षड्यंत्रवाद में अंतर होता है। यदि हर बीमारी, हर वैज्ञानिक चेतावनी और हर स्वास्थ्य अभियान को केवल “साजिश” मान लिया जाए, तो समाज वास्तविक खतरों को पहचानने की क्षमता खो सकता है। COVID-19 के दौरान दुनिया ने देखा कि अफवाहें और अविश्वास कई बार बीमारी से भी अधिक नुकसानदायक साबित हुए।

दरअसल, आधुनिक समय की सबसे बड़ी चुनौती यही है कि सूचना और भ्रम के बीच अंतर कैसे किया जाए। सोशल मीडिया के युग में आधी-अधूरी जानकारियाँ बहुत तेजी से फैलती हैं। लोग अपनी आशंकाओं के अनुसार तथ्यों को चुनते हैं और फिर उसी को अंतिम सत्य मान लेते हैं। मनोविज्ञान इसे “confirmation bias” कहता है कृ अर्थात हम वही बातें अधिक आसानी से स्वीकार करते हैं जो हमारे पहले से बने विश्वासों से मेल खाती हों।

इसलिए आवश्यक यह नहीं कि हम हर सरकारी या मीडिया दावे पर आँख बंद करके विश्वास करें। लेकिन यह भी उतना ही आवश्यक है कि हम हर वैश्विक घटना को रहस्यमयी षड्यंत्र के चश्मे से न देखें। एक स्वस्थ लोकतांत्रिक समाज में प्रश्न पूछना जरूरी है, पर उत्तर खोजने की प्रक्रिया प्रमाण, विज्ञान और तर्क पर आधारित होनी चाहिए।

आज आवश्यकता भय और अंधविश्वास कृ दोनों से बचने की है। जनता को सजग होना चाहिए, लेकिन आतंकित नहीं। मीडिया को चेतावनी देनी चाहिए, लेकिन सनसनी नहीं फैलानी चाहिए। और वैज्ञानिक संस्थाओं को पारदर्शिता बनाए रखनी चाहिए, ताकि लोगों का विश्वास केवल अधिकार से नहीं बल्कि विश्वसनीयता से अर्जित हो।

संभव है कि हर संदेह के पीछे कोई षड्यंत्र न हो। लेकिन यह भी सच है कि पारदर्शिता की कमी संदेह को जन्म देती है। इसलिए आधुनिक लोकतंत्रों की सबसे बड़ी जिम्मेदारी केवल लोगों को सुरक्षित रखना नहीं, बल्कि उन्हें सचेत, शिक्षित और तथ्यपूर्ण जानकारी से लैस रखना भी है।

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