समुद्र से सरहद तक : RSS के सरकार्यवाह होसबले की नसीहत और भारत की आसन्न कूटनीतिक रणनीति

समुद्र से सरहद तक : RSS के सरकार्यवाह होसबले की नसीहत और भारत की आसन्न कूटनीतिक रणनीति

दक्षिण एशिया की राजनीति में कई बार वास्तविक परिवर्तन सरकारी घोषणाओं से नहीं, बल्कि भूगोल, व्यापार और बाज़ार की हलचलों से दिखाई देने लगते हैं। हालांकि कई बातें फिलहाल भविष्य के गर्भ में है लेकिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्रवाह दत्तात्रेय होसबले ने अपने एक बयान में भारत के भविष्य की कई रणनीतियों के उपर से पर्दा उठा दिया है। मसलन, पिछले कुछ महीनों में भारत के पश्चिमोत्तर भूभाग-पंजाब, हरियाणा और सीमा से लगे क्षेत्रों, में जो गतिविधियाँ दिख रही हैं, वे केवल रियल एस्टेट या सीमित कूटनीति की घटनाएँ नहीं लगतीं। वे एक बड़े रणनीतिक पुनर्संतुलन की ओर संकेत करती प्रतीत होती हैं।

अमेरिकी टैरिफ नीतियों, रेड सी संकट, वैश्विक सप्लाई चेन पुनर्गठन और चीन-केंद्रित व्यापार व्यवस्था पर बढ़ती निर्भरता के खतरे ने भारत को नए व्यापारिक मार्ग व तरीके खोजने के लिए विवश कर दिया है। समुद्री व्यापार अभी भी भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, परंतु केवल समुद्री रास्तों पर निर्भरता अब रणनीतिक जोखिम मानी जाने लगी है। यही कारण है कि भारत  IMEC (India-Middle East-Europe Corridor), INSTC (International North-South Transport Corridor) और पश्चिम एशिया आधारित मल्टीमॉडल नेटवर्क पर असाधारण ऊर्जा लगा रहा है। लेकिन इन परियोजनाओं का एक अनकहा पक्ष भी हैकृवे भारत को अनिवार्य रूप से अपने उत्तर-पश्चिम भूगोल की ओर पुनः देखने के लिए प्रेरित कर रही हैं। यहीं से पाकिस्तान का प्रश्न फिर से उभरता है।

कई वर्षों तक भारत की नीति पाकिस्तान के संदर्भ में लगभग पूर्ण राजनीतिक दूरी की रही। 2019 के बाद व्यापार लगभग ठप पड़ गया। संवाद सीमित हो गया। सार्वजनिक विमर्श में भी कठोरता प्रमुख स्वर बनी रही। लेकिन भूगोल राजनीति से बड़ा होता है। भारत यदि मध्य एशिया, यूरोप और पश्चिम एशिया के साथ सस्ती और तीव्र स्थलीय कनेक्टिविटी चाहता है, तो पाकिस्तान को स्थायी रूप से “ग़ैर-प्रासंगिक” मान लेना आसान नहीं होगा।

इसी संदर्भ में पिछले महीनों की घटनाएँ ध्यान खींचती हैं। मध्य पूर्व में भारत और पाकिस्तान के प्रतिनिधियों की कथित बैक-चौनल बैठकों की खबरें सामने आती हैं। LoC पर अपेक्षाकृत नियंत्रित स्थिति बनी रहती है। धार्मिक यात्राओं और मानवीय मामलों में सीमित नरमी दिखाई देती है और फिर अचानक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह Dattatreya Hosabale यह कहते हैं कि पाकिस्तान के साथ “संवाद की खिड़की” बंद नहीं होनी चाहिए।

होसबले का बयान सामान्य नहीं है। और इसे हल्के में नहीं लिया जा सकता है। RSS लंबे समय से पाकिस्तान प्रश्न पर कठोर वैचारिक रुख का प्रतीक माना जाता रहा है। ऐसे में यदि उसका शीर्ष नेतृत्व “नियंत्रित संवाद” की बात करता है, तो उसे केवल सद्भावना की भाषा मानना राजनीतिक सरलता होगी। दरअसल यह भारत की उभरती हुई “व्यावहारिक राष्ट्रवादी” नीति का संकेत हो सकता है-जहाँ सुरक्षा पर कठोरता और सीमित संवाद साथ-साथ चलते हैं।

यह वही मॉडल है जिसे अटल बिहारी वाजपेयी के दौर में “इंसानियत, जम्हूरियत और कश्मीरियत” जैसी भाषा के साथ देखा गया था-कारगिल युद्ध और लाहौर बस यात्रा, दोनों एक ही कालखंड में संभव हुए थे। आज परिस्थितियाँ अलग हैं, लेकिन रणनीतिक तर्क मिलता-जुलता दिखाई देता है, पूर्ण युद्ध महँगा है, पूर्ण दोस्ती असंभव है, इसलिए नियंत्रित प्रतिस्पर्धा और सीमित संवाद ही व्यावहारिक विकल्प है।

इस पूरी बहस में पंजाब और हरियाणा के कुछ क्षेत्रों में जमीन की कीमतों का अचानक उछाल भी रोचक संकेत देता है। चंडीगढ़ के निकट टेपला, और पंजाब के फिरोजपुर, फरीदकोट तथा अमृतसर बेल्ट में कृषि भूमि के दामों में कई गुना वृद्धि केवल खेती की अर्थव्यवस्था से नहीं समझी जा सकती। यह लॉजिस्टिक्स, वेयरहाउसिंग, एक्सप्रेसवे, ड्राई पोर्ट, संभावित ट्रांजिट रूट और भविष्य के कॉरिडोर की अटकलों से जुड़ा हुआ प्रतीत होता है। इतिहास गवाह है कि पूँजी अक्सर राजनीति से पहले संकेत पकड़ लेती है।

यह भी संभव है कि बड़े निवेशक आने वाले वर्षों में उत्तर-पश्चिम भारत को एक नए व्यापारिक द्वार के रूप में देख रहे हों। यदि कभी भारत-पाक संबंधों में सीमित स्थिरता आती है, या मध्य एशियाई ट्रांजिट नेटवर्क का कोई नया प्रारूप विकसित होता है, तो अमृतसर-फिरोजपुर-अटारी बेल्ट की रणनीतिक उपयोगिता कई गुना बढ़ सकती है।

हालाँकि यहाँ अति-रोमांटिक निष्कर्ष निकालना भी खतरनाक होगा। पाकिस्तान के साथ भारत के संबंधों की सबसे बड़ी बाधा आज भी सुरक्षा और आतंकवाद का प्रश्न है। भारत की सत्ता व्यवस्था और सुरक्षा प्रतिष्ठान इस विषय पर किसी नरमी के संकेत नहीं देते। इसी कारण अभी जो कुछ दिखाई दे रहा है, उसे “शांति प्रक्रिया” कहना अतिशयोक्ति होगी। यह अधिकतम “तनाव प्रबंधन” की नीति हो सकती है।

फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि भू-आर्थिक दबाव दक्षिण एशिया की राजनीति को धीरे-धीरे बदल रहे हैं। अमेरिकादृचीन व्यापार युद्ध, पश्चिम एशिया का अस्थिर समुद्री भूगोल, सप्लाई चेन का पुनर्गठन और ऊर्जा गलियारों की राजनीतिकृइन सबने भारत को यह सोचने पर मजबूर किया है कि स्थायी शत्रुता की कीमत कितनी भारी हो सकती है।

यही कारण है कि आज भारत की रणनीति में एक नया द्वंद्व दिखाई देता है-एक ओर सैन्य कठोरता, दूसरी ओर सीमित कूटनीतिक लचीलापन। एक ओर राष्ट्रवादी राजनीतिक भाषा, दूसरी ओर बैक-चौनल संवाद। एक ओर समुद्री कॉरिडोर, दूसरी ओर स्थलीय विकल्पों की खोज। संभवतः भारत अब “दोनों दरवाज़े खुले रखने” की नीति पर चल रहा है।

यदि ऐसा है, तो दक्षिण एशिया आने वाले वर्षों में एक नए भू-राजनीतिक प्रयोग का क्षेत्र बन सकता हैकृजहाँ युद्ध और संवाद, दोनों समानांतर चलेंगे; और जहाँ व्यापारिक गलियारे शायद उन दीवारों को धीरे-धीरे कमजोर करने लगें, जिन्हें राजनीति ने दशकों में खड़ा किया है।

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