गायत्री भारद्वाज
सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा बेरोज़गार युवाओं के लिए कथित तौर पर “कॉकरोच” शब्द के प्रयोग के बाद देशभर में तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिली। सफ़ाई दी गई कि टिप्पणी फर्जी डिग्रीधारकों के संदर्भ में थी, लेकिन सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो और बहसों ने इस मुद्दे को व्यापक जनाक्रोश में बदल दिया। इसी पृष्ठभूमि में अभिजीत दिपके नामक व्यक्ति ने ऑनलाइन “कॉकरोच जनता पार्टी” की घोषणा की, जिसे विशेषकर युवाओं के बीच अप्रत्याशित लोकप्रियता मिली।
यह लोकप्रियता किसी संयोग का परिणाम नहीं है। देश में बेरोज़गारी, महँगाई, परीक्षा घोटाले, श्रमिक असुरक्षा और राजनीतिक अहंकार के प्रति जो गुस्सा जमा हो चुका है, “कॉकरोच जनता पार्टी” उसी की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति बनकर उभरी है। नीट पेपर लीक से लेकर बढ़ती महँगाई, पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों और रोजगार संकट तक, आम नागरिकों के भीतर यह भावना गहरी हुई है कि सत्ता प्रतिष्ठान उनकी वास्तविक समस्याओं से कट चुका है।
भाजपा और उसके समर्थक इस पूरी परिघटना को “विदेशी साज़िश” या “देश को अस्थिर करने की कोशिश” बताने में लगे हैं। लेकिन यह तर्क अब पहले जैसा असर पैदा नहीं करता। जनता का एक बड़ा हिस्सा मुख्यधारा के “गोदी मीडिया” पर भरोसा खो चुका है और वैकल्पिक डिजिटल माध्यमों की ओर मुड़ चुका है। यही कारण है कि सोशल मीडिया आज सत्ता के लिए असहज क्षेत्र बन गया है—एक ऐसा मंच जिस पर उसका पूर्ण नियंत्रण संभव नहीं।
दरअसल, “कॉकरोच जनता पार्टी” कोई संगठित राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि व्यवस्था-विरोधी व्यंग्य और असंतोष की डिजिटल अभिव्यक्ति है। इसका पाँच सूत्रीय घोषणापत्र भी इसी मानसिकता को दर्शाता है—न्यायाधीशों को सेवानिवृत्ति के बाद राज्यसभा सीट न देने, दल-बदलुओं पर प्रतिबंध, मीडिया स्वामित्व की जांच, चुनावी पारदर्शिता और राजनीतिक जवाबदेही जैसी माँगें मुख्यतः लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता बहाल करने पर केंद्रित हैं।
हालाँकि इन माँगों की सीमाएँ भी स्पष्ट हैं। घोषणापत्र में मजदूरों, किसानों, श्रमिक अधिकारों, निजीकरण, लेबर कोड, ग्रामीण संकट या आर्थिक असमानता जैसे बुनियादी प्रश्न लगभग अनुपस्थित हैं। यही कारण है कि इसकी राजनीति अभी मुख्यतः शहरी मध्यवर्गीय असंतोष की राजनीति प्रतीत होती है। यह व्यवस्था की कुछ सबसे अश्लील विसंगतियों पर चोट तो करती है, लेकिन उस सामाजिक-आर्थिक ढाँचे पर नहीं, जहाँ से ये विसंगतियाँ पैदा होती हैं।
फिर भी इस परिघटना को हल्के में नहीं लिया जा सकता। इतिहास गवाह है कि कई बार बड़े सामाजिक आंदोलनों की शुरुआत किसी व्यंग्य, प्रतीक या ऑनलाइन प्रतिक्रिया से हुई है। जब जनता के भीतर गुस्सा और निराशा एक “टिपिंग पॉइंट” पर पहुँच जाते हैं, तब मामूली प्रतीत होने वाली घटनाएँ भी व्यापक राजनीतिक अर्थ ग्रहण कर लेती हैं।
यही वजह है कि सत्ता प्रतिष्ठान इस ऑनलाइन व्यंग्य से भी भयभीत दिखाई देता है। सोशल मीडिया हैंडल और वेबसाइट बंद करवाने जैसी कार्रवाइयाँ यह संकेत देती हैं कि सरकार आलोचना को लोकतांत्रिक अधिकार की तरह नहीं, बल्कि ख़तरे की तरह देख रही है। जबकि किसी भी लोकतंत्र में सरकार, न्यायपालिका और संस्थाओं की आलोचना नागरिक अधिकार का हिस्सा होती है।
असल प्रश्न यह है कि क्या “कॉकरोच जनता पार्टी” जनता के गुस्से को किसी ठोस राजनीतिक दिशा में बदल पाएगी, या फिर यह केवल मध्यवर्गीय भड़ास का माध्यम बनकर रह जाएगी? फिलहाल यह व्यवस्था-विरोधी मनोदशा की एक तीखी, व्यंग्यात्मक और प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है। लेकिन यदि इसे व्यापक सामाजिक आधार चाहिए, तो उसे बेरोज़गार युवाओं के साथ-साथ मजदूरों, किसानों और मेहनतकश तबकों की वास्तविक आर्थिक समस्याओं को भी अपने केंद्र में लाना होगा।
क्योंकि अंततः लोकतंत्र केवल संस्थागत सुधारों से नहीं चलता; वह जनता के जीवन की वास्तविक परिस्थितियों से संचालित होता है। और जब जनता को यह महसूस होने लगे कि उसकी पीड़ा सत्ता के लिए मज़ाक बन चुकी है, तब व्यंग्य भी राजनीति बन जाता है।
आलेख में व्यक्त विचार लेखिका के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
