विश्लेषण : आध्यात्मिकता की कसौटी पर रोटी, धर्म और मानवता

विश्लेषण : आध्यात्मिकता की कसौटी पर रोटी, धर्म और मानवता

सभ्यता के इतिहास में मनुष्य ने सबसे पहले ईश्वर को नहीं, अपितु अन्न खोजा था। भूख मनुष्य का पहला दर्शन है और रोटी उसकी पहली राजनीति। रोटी से ही सभ्यता और संस्कृति प्रारंभ होती है और जब रोटी कम पड़ने लगती है तो सभ्यताओं का पतन प्रारंभ हो जाता है। रोटी के बाद धर्म आए, दर्शन आए, शास्त्र और सिद्धांत आए; परंतु मनुष्य की पहली प्रार्थना तो पेट से ही निकली थी और आज भी निकलती है। यही कारण है कि संसार की लगभग हर धार्मिक परंपरा में “अन्न”, “रोटी”, “भोजन”, “रोज़ी” और “भूखे को खिलाने” को किसी न किसी रूप में पवित्र माना गया। इसे धार्मिक कर्तव्यों के रूप में व्याख्यायित किया गया है लेकिन इसकी व्यावहारिकता को सबसे पहले धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जोड़ने में सद्गुरु नानकदेव जी सफल हो पाए। सिख धर्म के बाद के गुरुओं ने भी रोटी के महत्व को समझा और बांट कर खाने के सिद्धांत के आधार पर गुरुद्वारों में लंगल की व्यवस्था की।

वैदिक चिंतन ने कहा: “अन्नं ब्रह्म”। इसकी व्याख्या तैत्तिरीय उपनिषद् में व्यापक रूप से संकलित है। यह कोई साधारण कथन नहीं था। यहाँ अन्न को केवल शरीर की आवश्यकता नहीं, बल्कि सृष्टि का आधार माना गया। भारतीय संस्कृति में “अन्नदाता” शब्द का सम्मान इसी भावभूमि से निकला। बाद में अन्नदान को महादान कहा गया। किंतु विडंबना यह रही कि जिस सभ्यता ने अन्न को ब्रह्म कहा, उसी समाज में सदियों तक भोजन भी जातियों में विभाजित रहा। किसी का हाथ पवित्र, किसी का अपवित्र; किसी का रसोईघर शुद्ध, किसी का स्पर्श अशुद्ध। आध्यात्मिक ऊँचाई और सामाजिक असमानता साथ-साथ चलती रही।

बौद्ध धर्म ने इस प्रश्न को अधिक मानवीय धरातल पर रखा। गौतम बुद्ध ने भूख को दार्शनिक नहीं, मानवीय पीड़ा के रूप में देखा। उनके चिंतन में करुणा केवल आत्मा की मुक्ति का साधन नहीं थी, बल्कि दुख से जूझते मनुष्य के प्रति सामाजिक उत्तरदायित्व भी थी। किंतु बौद्ध परंपरा भी अंततः व्यापक सामाजिक संरचना को वैसा व्यावहारिक भोजन-सिद्धांत नहीं दे सकी, जो समाज की रोजमर्रा की रोटी को स्थायी धार्मिक संस्था बना देता।

इस्लाम ने इस दिशा में एक बड़ा हस्तक्षेप किया। कुरान में बार-बार गरीब, यतीम, मुसाफ़िर और भूखे का उल्लेख आता है। मुहम्मद की शिक्षाओं में पड़ोसी का भूखा रह जाना केवल सामाजिक विफलता नहीं, बल्कि नैतिक अपराध के निकट माना गया। ज़कात और सदक़ा को वैकल्पिक दया नहीं, बल्कि धार्मिक दायित्व बनाया गया। यहाँ पहली बार रोटी को व्यवस्थित सामाजिक न्याय से जोड़ा गया। यह धर्म केवल आत्मा की मुक्ति की बात नहीं करता, बल्कि रोज़ी-रोटी की नैतिक व्यवस्था भी निर्मित करता है।

ईसाई धर्म में भी “Give us this day our daily bread” जैसी प्रार्थना यह स्वीकार करती है कि मनुष्य की आध्यात्मिकता दैनिक रोटी से अलग नहीं हो सकती। किंतु यूरोप के मध्यकालीन इतिहास में चर्च और सामंती सत्ता के गठजोड़ ने कई बार इस आदर्श को व्यवहार से दूर कर दिया। धर्म अक्सर महलों के निकट दिखाई दिया, खेतिहर और मजदूर की भूख से दूर। लेकिन इन सबके बीच यदि किसी धार्मिक परंपरा ने “रोटी” को केवल दान, करुणा या पुण्य नहीं रहने दिया, बल्कि उसे अपने प्रत्यक्ष धार्मिक-सामाजिक सिद्धांत का आधार बना दिया, तो वह सिख पंथ था।

गुरु नानक का सूत्र है, “किरत करो, नाम जपो, वंड छको।” सद्गुरु नानकदेव जी की यह अवधारणा भारतीय धार्मिक इतिहास में अत्यंत क्रांतिकारी माना जाना चाहिए। यहाँ धर्म केवल ईश्वर-स्मरण नहीं रहा; श्रम, साझेदारी और सामूहिक भोजन भी धर्म बन गए। “लंगर” केवल रसोई नहीं था; वह भारतीय समाज की जातिगत संरचना के विरुद्ध सीधी चुनौती थी। एक ही पंगत में राजा और गरीब, ऊँची जाति और तथाकथित नीची जाति, सबका साथ बैठकर भोजन करना उस समय की सामाजिक क्रांति थी।

यही वह बिंदु है जहाँ सिख परंपरा अन्य धार्मिक व्यवस्थाओं से अलग दिखाई देती है। दूसरे धर्मों ने भूखे को भोजन देने की बात की; सिख परंपरा ने साथ बैठकर रोटी खाने को धार्मिक अनुशासन बना दिया। यह केवल परोपकार नहीं, सामाजिक बराबरी की घोषणा थी।

आज भी दुनिया भर के गुरुद्वारों में चलने वाला लंगर शायद मानव इतिहास की सबसे बड़ी सतत सामुदायिक भोजन-व्यवस्थाओं में से एक है। महामारी हो, युद्ध हो, बाढ़ हो या पलायन कृ लंगर की परंपरा ने बार-बार सिद्ध किया कि धर्म का सबसे विश्वसनीय चेहरा वही है जो भूखे मनुष्य के सामने रोटी रख दे।

विडंबना यह है कि आधुनिक दुनिया तकनीक में आगे बढ़ती गई, पर “रोटी” का प्रश्न अब भी हल नहीं हुआ। अरबों की अर्थव्यवस्थाओं के बीच भूख आज भी जीवित है और उस भूख पर राजनीति हो रही है। धर्मस्थल स्वर्णमंडित होते गए, लेकिन गरीब की थाली खाली रही। राजनीति मंदिर-मस्जिद पर लड़ती रही, जबकि दुनिया की एक बड़ी आबादी अब भी रोटी के लिए संघर्ष कर रही है।

शायद इसी कारण स्वामी विवेकानंद का कथन आज भी प्रासंगिक लगता है कि भूखे आदमी के लिए रोटी ही भगवान है। धर्म की अंतिम परीक्षा स्वर्ग के वादों में नहीं, बल्कि इस प्रश्न में छिपी है, क्या उसके दरवाज़े से कोई भूखा वापस लौटता है?

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