डराने-धमकाने की प्रशासनिक कार्यशैली लोकतांत्रिक शैली के लिए बेहद खतरनाक

डराने-धमकाने की प्रशासनिक कार्यशैली लोकतांत्रिक शैली के लिए बेहद खतरनाक

राष्ट्रीय कार्यक्रमों में तैनात कार्मिकों को धमकाना शायद हमारे प्रशासनिक तंत्र की फितरत ही बन गई है। कुछ माह पहले राजस्थान समेत देश के 7 राज्यों में हुए मतदाता सूचियों के गहन विशेष पुनरीक्षण (एसआईआर) में धमकाने, कार्य दबाव और तनाव के चलते लगभग एक माह में ही 25 बूथ लेवल अधिकारियों (बीएलओ) की मौत जैसे विवाद गहराए थे। एसआईआर के आरोपों का अनुनाद अभी शांत हुआ ही था कि जनगणना कार्य में ऐसे धमकाने के स्वर फिर उठने लगे हैं।

अभी राष्ट्रीय जनगणना-2027 का कार्य युद्धस्तर पर जारी है। देशभर की ही तरह, राजस्थान में भी सरकारी कार्मिक इसमें ड्यूटी पर तैनात हैं। घर-घर प्रगणक दस्तक दे रहे हैं। लेकिन, इस बीच प्रदेश की राजधानी जयपुर से खबरें आई कि जनगणना कार्य पर उपस्थित नहीं होने वाले कई शिक्षकों को पुलिस की ओर से कार्रवाई को लेकर फोन आ रहा है।

जयपुर के जगतपुरा-झालाना जोन क्षेत्र में ऐसे प्रकरण सामने आए हैं। जहां शिक्षकों का कहना है कि उन्हें थाने से आए फोन में एफआईआर दर्ज करने की चेतावनी दी गई। जोन उपायुक्त की ओर जवाहर सर्किल थाने को शिक्षकों की सूची भेजी गई है। उपायुक्त ने भी स्वीकारा है कि पुलिस को पत्र भेजा गया है लेकिन मंशा शिक्षकों को डराने की मात्र है, एफआईआर दर्ज करने की कार्रवाई नहीं की जा रही है।

जयपुर के अलावा कुछ समय पहले कोटा जिले के रामगंजमंडी क्षेत्र में भी शिक्षकों और जनगणना के कार्य में लगे कार्मिकों को पुलिस थाने से धमकाने की खबरें छन छन कर आ रही थी। औपचारिक पत्र का तथ्य तो सामने नहीं आया, लेकिन घटनाक्रम को कार्मिकों ने एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी के परिजन बड़े पुलिस अधिकारी होने से जोडकऱ देखा। हालांकि बात आई गई हो गई।

इसमें कोई दोराय नहीं कि जनगणना राष्ट्रीय कार्यक्रम है। इसमें सहयोग देना देश के प्रत्येक नागरिक का कर्त्तव्य है। बाकायदा इसके लिए जनगणना अधिनियम-1948 बना हुआ है। कार्मिकों की तैनाती, कार्य संचालन और आदेशों के उल्लंघन, असहयोग पर कार्रवाई तक के प्रावधान उसमें स्पष्ट तौर पर उल्लेखित हैं। अधिनियम की धारा 11 में दंडात्मक कार्रवाई के प्रावधान हैं। धारा 11(एच) के अनुसार दोषी व्यक्ति को तीन साल के कारावास तक की सजा दी जा सकती है।

जाहिर है, थाने से फोन गैर वैधानिक नहीं है। जनगणना अधिकारियों की सूचना पर पुलिस क़ानूनी कार्रवाई कर सकती है। लेकिन, सोचना तो पड़ेगा कि क्या इस स्तर की अपरिहार्य स्थिति वाकई बन गई कि पुलिस की इमदंाद लेनी पड़ गई। सिर्फ डराने-धमकाने के लिए पुलिस का हथियार की तरह इस्तेमाल?

मानना पड़ेगा कि नदारद रहने वाले कार्मिक अपनी नियमित ड्यूटी के बाद जनगणना के कार्य में कर्त्तव्य निभा रहे हैं। भीषण गर्मी का भी अपना असर है। संभव है शिक्षक कार्मिकों की अपनी कोई ऐसी व्यावहारिक मजबूरी हो जिसे प्रशासन ने पहले अनसुना कर दिया हो। या एनवक्त कोई दिक्कत पेश आ गई हो। सिर्फ नदारदगी होने पर सीधे पुलिस थाने से फोन, और वो भी एफआईआर की चेतावनी भरा हो तो किसी भी सभ्य, सौम्य नागरिक की धडकऩें बढ़ा देता है।

नदारद रहने वाले शिक्षकों के हालात जाने बिना, यदि ऐसा किया गया है तो कतई उचित नहीं कहा जा सकता। ऐसे मामलों में समझाइश ही प्राथमिकता होनी चाहिए। पुलिस की भूमिका अंतिम विकल्प के रूप में रहनी चाहिए ना कि प्रथम आक्रमण हथियार के तौर पर। कानून की भी मंशा धमका कर काम पर लौटाने की नहीं, कर्त्तव्य पथ से गुस्ताखी वाले कार्मिकों पर कार्रवाई की है।

जनगणना कार्य अभी लम्बा चलेगा। बेहतर रहे, राज्य और केन्द्र सरकारों के स्तर से ही सभी संबंधित जिलों में अधिकारियों, जनगणना आयुक्तों को एडवाइजरी जारी हो जाए। अंतिम विकल्प के रूप में पुलिस इमदाद ली जाए। कार्मिकों की व्यावहारिक परिस्थितियों, मानवीय दृष्टिकोण को किसी भी सूूरत में नजरंदाज ना किया जाए। धयान रहे, ये अनुशासित राष्ट्रीय उत्सव है, इसे उत्सव की ही तरह संचालित करें। अनावश्यक दबाव की नीति स्वस्थ कार्यशैली की निशानी नहीं।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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