कुमार कृष्णन
बिहार के वैशाली में एक सेप्टिक टैंक के भीतर एक ही परिवार के चार सदस्यों की मौत हो गयी। छत्तीसगढ़ के रायपुर में एक अस्पताल के सेप्टिक टैंक के भीतर तीन कर्मचारियों की मौत हो गयी। मध्य प्रदेश के इंदौर में बचाव कार्य के दौरान सीवर कर्मचारियों की मौत हो गयी। इस प्रकार की घटना से अपना दिल्ली भी अछूता नहीं है। वहां भी सीमापुरी में एक संविदा सफाई कर्मचारी की मौत, जिसे कथित रूप से खतरनाक खुले नाले की सफाई के लिए मजबूर किया गया। हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु में ठेकेदारों और नगर निकायों के सफाई कार्यों के दौरान लगातार इस प्रकार की मौतें हो रही हैं। इसमें अधिकतर प्रवासी मजदूर होते हैं और उन्हें देखने वाला कोई नहीं होता है।
ये मौतें उस समय हो रही हैं जब “मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013” के तहत खतरनाक मैनुअल स्कैवेंजिंग पर कानूनी प्रतिबंध लागू है; सर्वाेच्च न्यायालय द्वारा मशीनीकरण और मुआवजे को लेकर कई बार निर्देश दिए जा चुके हैं; तथा सरकारें बार-बार मैनुअल स्कैवेंजिंग समाप्त करने के दावे करती रही हैं।भारत में, हाथ से मैला ढोने वालों की गरिमा और बुनियादी अधिकारों की लड़ाई अभी भी जारी है । किए गए वादे भुला दिए गए हैं।
मार्चदृमई 2026 के दौरान विभिन्न राज्यों से सामने आई सीवर और सेप्टिक टैंक मौतों की चिंताजनक श्रृंखला की पृष्ठभूमि में आयोजित की गई। केवल इन तीन महीनों के दौरान ही कम-से-कम 36 सफाई कर्मचारियों की सीवर, सेप्टिक टैंक, नालों और सीवेज चौम्बरों की सफाई करते समय अत्यंत असुरक्षित और अवैध परिस्थितियों में मृत्यु हो गई। ये मौतें बिहार, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और तमिलनाडु से रिपोर्ट की गईं।मृतक कर्मचारी मुख्यतः वाल्मीकि समुदाय और अन्य ऐतिहासिक रूप से हाशिये पर रहे समुदायों या प्रवासी मजदूरों से थे तथा अधिकांशतः अनौपचारिक ठेकेदारी व्यवस्था के माध्यम से कार्यरत थे, जो नगर निकायों, निजी संस्थानों, उद्योगों और सरकारी एजेंसियों को जवाबदेही से बचाती रहती है।
लगभग हर मामले में कर्मचारियों को ऑक्सीजन सिलेंडर, ब्रीदिंग अपरेटस, गैस डिटेक्टर, सुरक्षा पोशाक, हार्नेस या आपातकालीन बचाव प्रणाली के बिना अत्यधिक जहरीले बंद स्थानों में उतरने के लिए मजबूर किया गया।इनमें से कई मौतों में एक ही भयावह ढंग देखने को मिला, जो भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक मौतों में आम हैरू एक कर्मचारी चौम्बर में उतरता है और जहरीली गैस या ऑक्सीजन की कमी के कारण बेहोश होकर गिर जाता है, जिसके बाद अन्य कर्मचारी उसे बचाने के प्रयास में अंदर जाते हैं और वही असुरक्षित परिस्थितियाँ उनकी भी जान ले लेती हैं। यह लगातार दोहराई जाने वाली “रेस्क्यू-चेन फेटैलिटी” स्थिति बुनियादी बंद-स्थान सुरक्षा प्रोटोकॉल की पूरी अनुपस्थिति को उजागर करती है।
सर्वाेच्च न्यायालय ने कई बार स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को पर्याप्त सुरक्षा उपकरणों और सुरक्षा प्रोटोकॉल के बिना सीवर या सेप्टिक टैंक में नहीं उतारा जाना चाहिए तथा सीवर और सेप्टिक टैंक मौतों के लिए 30 लाख रुपये मुआवजे का निर्देश दिया है। इसके बावजूद पूरे देश में खतरनाक मैनुअल एंट्री बिना किसी जवाबदेही के लगातार जारी है।केंद्र सरकार ने स्वयं संसद में जानकारी दी कि 2017 से लेकर 2026 की शुरुआत तक 21 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई कार्यों के दौरान 622 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई। सरकार ने आगे बताया कि–2021 से 2025 के बीच खतरनाक सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई कार्यों में 317 सफाई कर्मचारियों की मौत हुई;अप्रैल 2026 तक नमस्ते योजना के तहत 89,248 सीवर और सेप्टिक टैंक कर्मचारियों की प्रोफाइलिंग की गई।
सर्वाेच्च न्यायालय के निर्देशों के बावजूद 52 प्रभावित परिवारों को अब तक मुआवजा नहीं मिला था। वास्तविक मौतों की संख्या संभवतः इससे कहीं अधिक है क्योंकि अनेक मौतों को मैनुअल स्कैवेंजिंग मौतों के बजाय सामान्य कार्यस्थल दुर्घटना के रूप में दर्ज कर दिया जाता है। अनौपचारिक और आउटसोर्स ठेकेदारी व्यवस्था भी श्रम उल्लंघनों और मौतों को छिपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।वास्तविक मौतों की संख्या संभवतः इससे कहीं अधिक है क्योंकि अनेक मौतों को मैनुअल स्कैवेंजिंग मौतों के बजाय सामान्य कार्यस्थल दुर्घटना के रूप में दर्ज कर दिया जाता है। अनौपचारिक और आउटसोर्स ठेकेदारी व्यवस्था भी श्रम उल्लंघनों और मौतों को छिपाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।मैनुअल स्कैवेंजिंग की निरंतरता गहरे जातिगत भेदभाव, श्रम शोषण, प्रशासनिक लापरवाही, सुरक्षा मानकों के कमजोर क्रियान्वयन और सरकारों तथा नागरिक निकायों द्वारा बार-बार वादों के बावजूद मशीनीकृत सफाई व्यवस्था लागू न करने की विफलता को दर्शाती है।
म्युनिसिपल वर्कर्स लाल झंडा यूनियन (सीटू) के अध्यक्ष धर्मेंद्र भाटी बताते हैं, “ सरकार दावा करती है कि सफाई कार्य का मशीनीकरण हो चुका है लेकिन ज़मीनी हकीकत बिल्कुल अलग है। इस काम से सीवर कर्मचारियों का स्वास्थ्य सबसे अधिक प्रभावित होता है। पहले हर महीने लगभग 10-13 मौतें होती थीं, लेकिन अब 15-20 मौतें सामने आ रही हैं। मार्च के महीने में सीवर के भीतर जहरीली गैसें काफी बढ़ जाती हैं।” दिल्ली जल बोर्ड में ठेकेदारी व्यवस्था सबसे बड़ी समस्याओं में से एक है। 1998 में डीजेबी में लगभग 36,000 स्थायी कर्मचारी थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर लगभग 10,000 रह गई है। सरकार संविदा सीवर कर्मचारियों की जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेती है। उन्हें न्यूनतम वेतन, सुरक्षा उपकरण, प्रशिक्षण, ईएसआई कार्ड और नियमित स्वास्थ्य जांच तक नहीं मिलती। पहले हर छह महीने में स्वास्थ्य जांच होती थी, लेकिन अब कर्मचारियों को वर्षों तक इंतजार करना पड़ता है। सीवर कर्मचारी हर दिन जहरीली गैसों के संपर्क में आते हैं, जिससे वे गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाते हैं।
उनके अनुसार, यदि कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन मिलता, तो वे रविवार या खाली समय में मात्र 400-500 रुपये प्रतिदिन के लिए सीवर में उतरकर अपनी जान जोखिम में नहीं डालते। मृत कर्मचारियों के परिवारों को निश्चित समयसीमा के भीतर मुआवजा मिलना चाहिए, क्योंकि कई परिवार अंतिम संस्कार तक करने में असमर्थ होते हैं। सभी सीवर कर्मचारियों को डीजेबी में स्थायी नौकरी दी जानी चाहिए, संविदा कर्मचारियों को नियमित किया जाना चाहिए और सरकार व प्रशासन को उनके कल्याण के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए।” अधिवक्ता कवलप्रीत कौर के अनुसार, दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच की रिपोर्ट के अनुसार केवल तीन महीनों में 36 सीवर कर्मचारियों की मौत हुई, यानी हर महीने औसतन 12 मौतें। यह पूरी तरह अस्वीकार्य है।
मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट, 2013 और कई अदालती फैसलों के बावजूद ये मौतें जारी हैं।बलराम सिंह मामले में सीवर मौतों के लिए मुआवजा बढ़ाकर 30 लाख रुपये किया गया, लेकिन सवाल यह है कि कर्मचारी आज भी 400-500 रुपये प्रतिदिन के लिए अपनी जान जोखिम में डालने को मजबूर क्यों हैं? ऐसी कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो कर्मचारियों को जानबूझकर मौत के कुएँ में उतरने के लिए मजबूर करती हैं? यह प्रशासन और समाज दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है क्योंकि कर्मचारियों को गुलामी जैसी परिस्थितियों में धकेला जा रहा है। “ठेका प्रणाली में न तो नगर निकाय और न ही ठेकेदार कर्मचारियों की सुरक्षा की जिम्मेदारी लेते हैं। नियमित व्यवस्था में कम-से-कम राज्य जवाबदेह होता है। कर्मचारियों को न्यूनतम वेतन तक नहीं मिल रहा, जिसे अदालतों ने बंधुआ मजदूरी का एक रूप माना है। सीवर कर्मचारियों को केवल न्यूनतम नहीं बल्कि जीवन-निर्वाह योग्य वेतन मिलना चाहिए। चूँकि सीवर कार्य सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है, इसलिए सफाई कर्मचारियों को फ्रंटलाइन वर्कर के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए। सभी संविदा कर्मचारियों को नियमित कर स्थायी रोजगार दिया जाना चाहिए।”
कोई भी सीवर कर्मचारियों की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं की बात नहीं करता। उन्हें उचित स्वास्थ्य सेवा और दीर्घकालिक चिकित्सीय सहायता से वंचित रखा जाता है। मृत्यु पर 30 लाख रुपये और चोट पर 20 लाख रुपये का मुआवजा भी पर्याप्त नहीं है। सफाई कर्मचारियों को सम्मानजनक जीवन और जीवन-निर्वाह योग्य वेतन मिलना चाहिए।”अखिल भारतीय निगम मजदूर अधिकार यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव पालिवाल के अनुसार, “सीवर कर्मचारियों की 36 मौतें बेहद निंदनीय हैं और ज़मीनी स्थिति बहुत दयनीय है। भारत की स्वतंत्रता के 78 वर्षों बाद भी दलितों के साथ गुलामों जैसा व्यवहार किया जा रहा है। सरकार को पीड़ितों के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि उनके पीछे परिवार हैं, जो कर्मचारी की मृत्यु के बाद गरीबी और बेबसी का जीवन जीने को मजबूर हो जाते हैं।” कम-से-कम पुनर्वास की व्यवस्था होनी चाहिए ताकि ये परिवार और अधिक पीड़ा न झेलें। सफाई कर्मचारियों के कल्याण और बेहतर कार्य परिस्थितियों के लिए हमें एक व्यापक राष्ट्रीय अभियान शुरू करना चाहिए।
प्रशासन को नीतियों और वैधानिक कानूनों को पूरी तरह लागू करना चाहिए ताकि इन मौतों को रोका जा सके, अन्यथा मज़बूत मशीनीकरण और उचित प्रशिक्षण सुनिश्चित किया जाए।”दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच की राष्ट्रीय समन्वयक मोहसिना अख्तर के अनुसार “मार्च से मई 2026 के बीच ही कम-से-कम 36 सफाई कर्मचारियों ने सीवर, सेप्टिक टैंक, नालों, मैनहोल और सीवेज चौम्बरों की सफाई करते हुए असुरक्षित, अवैध और अमानवीय परिस्थितियों में अपनी जान गंवाई। ये मौतें जाति-आधारित सफाई श्रम, संस्थागत लापरवाही, कानूनों के कमजोर क्रियान्वयन, मशीनीकरण की कमी, शोषणकारी ठेकेदारी व्यवस्था और जवाबदेही से व्यवस्थित इनकार की निरंतर वास्तविकता को उजागर करती हैं। विभिन्न राज्यों से सामने आए ये मामले एक राष्ट्रीय पैटर्न को दर्शाते हैं, जहाँ कर्मचारियों को बिना सुरक्षा उपकरण, ऑक्सीजन सहायता, गैस डिटेक्टर, ब्रीदिंग अपरेटस या बचाव प्रणाली के जहरीले बंद स्थानों में उतरने के लिए मजबूर किया जाता है।
अनौपचारिक और अनियमित ठेकेदारी व्यवस्था सफाई कार्य पर हावी बनी हुई है, जिसके कारण लगातार रेस्क्यू-चेन मौतें, मुआवजे में देरी और जिम्मेदारी से इनकार देखने को मिलता है। दलित समुदाय, विशेष रूप से वाल्मीकि और अन्य ऐतिहासिक रूप से उत्पीड़ित जातियाँ, साथ ही प्रवासी और आर्थिक रूप से कमजोर मजदूर, आज भी असमान रूप से खतरनाक सफाई कार्यों में धकेले जा रहे हैं। ये मौतें अलग-थलग दुर्घटनाएँ नहीं हैं, बल्कि संरचनात्मक जातिगत भेदभाव, शोषणकारी श्रम व्यवस्था, प्रशासनिक विफलता, कानून के कमजोर क्रियान्वयन और खतरनाक सफाई प्रथाओं पर निर्भरता का परिणाम हैं।
मैनुअल स्कैवेंजर्स के रूप में रोजगार निषेध और उनका पुनर्वास अधिनियम, 2013 तथा सर्वाेच्च न्यायालय के बार-बार दिए गए निर्देशों के बावजूद पूरे देश में खतरनाक मैनुअल सफाई जारी है। मैनुअल स्कैवेंजिंग और खतरनाक सफाई कार्य गंभीर दीर्घकालिक शारीरिक, न्यूरोलॉजिकल, मनोवैज्ञानिक और व्यावसायिक स्वास्थ्य प्रभाव भी उत्पन्न करते हैं, जिनमें जहरीली गैस से दम घुटना, श्वसन रोग, त्वचा संक्रमण, मस्कुलोस्केलेटल विकार, न्यूरोलॉजिकल जटिलताएँ, डूबने का खतरा, मानसिक आघात, मानसिक स्वास्थ्य समस्याएँ, नशे की निर्भरता और जीवन प्रत्याशा में कमी शामिल हैं। इसके बावजूद व्यावसायिक स्वास्थ्य निगरानी, नियमित चिकित्सीय जांच, बीमा कवरेज, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, मुआवजा और पुनर्वास सहायता लगभग अनुपस्थित हैं।
इन लोगों ने मैनुअल स्कैवेंजिंग एक्ट और श्रम सुरक्षा कानूनों का सख्ती से पालन करने, खतरनाक सफाई कार्यों के लिए जिम्मेदार ठेकेदारों, नगर अधिकारियों, उद्योगों और संस्थानों की आपराधिक जवाबदेही तय करने,सीवर और सेप्टिक टैंक सफाई कार्यों का सार्वभौमिक मशीनीकरण करने, बंद-स्थान सुरक्षा प्रोटोकॉल का तत्काल अनिवार्य क्रियान्वयन;प्रभावित परिवारों को समयबद्ध मुआवजा और पुनर्वास;सफाई कर्मचारियों के लिए स्थायी वैकल्पिक आजीविका;सीवर और सेप्टिक टैंक मौतों को अलग-थलग दुर्घटना नहीं बल्कि संरचनात्मक जातिगत हिंसा के रूप में मान्यता देने, मैनुअल स्कैवेंजिंग की अमानवीयता और अवैधता के बारे में व्यापक सार्वजनिक एवं संस्थागत जागरूकता अभियान चलाने की मांग की गई। सामूहिक रूप से तत्काल आपराधिक जवाबदेही, सफाई व्यवस्था के पूर्ण मशीनीकरण, सफाई कर्मचारियों के लिए राष्ट्रीय व्यावसायिक स्वास्थ्य ढाँचे, समयबद्ध मुआवजा और पुनर्वास, देशव्यापी स्वतंत्र ऑडिट, सफाई कर्मचारियों की मौतों का पारदर्शी राष्ट्रीय डेटाबेस, संस्थागत प्रशिक्षण और जाति-आधारित सफाई श्रम व्यवस्था को समाप्त करने हेतु दीर्घकालिक उपायों की मांग की गई।
सफाई कर्मचारियों की लगातार मौतें भारत में जाति-आधारित संरचनात्मक हिंसा के सबसे गंभीर और स्थायी रूपों में से एक हैं। ये कर्मचारी कोई उपेक्षित मजदूर नहीं हैं। वे ऐसे इंसान हैं जिन्हें गरिमा, समानता, सुरक्षा, स्वास्थ्य सेवा और संवैधानिक संरक्षण का अधिकार है। मार्च से मई 2026 के बीच दर्ज हुई मौतें यह साबित करती हैं कि कानूनी प्रतिबंध, अदालती निर्देशों और उन्मूलन के सरकारी दावों के बावजूद सीवर और सेप्टिक टैंकों की खतरनाक मैनुअल सफाई जारी है। जब तक सख्त जवाबदेही, पूर्ण मशीनीकरण, व्यापक पुनर्वास, व्यावसायिक स्वास्थ्य सुरक्षा और जाति-आधारित सफाई श्रम व्यवस्था को समाप्त करने के गंभीर प्रयास नहीं किए जाते, तब तक सफाई कर्मचारी ऐसे खतरनाक कार्य करते हुए मरते रहेंगे जिनके लिए किसी भी इंसान को कभी सीवर में उतरने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए।
दलित आदिवासी शक्ति अधिकार मंच केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, नगर निकायों, न्यायपालिका, मानवाधिकार संस्थाओं तथा नागरिक समाज से अपील करता है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी कर्मचारी को दोबारा अपनी आजीविका कमाने के लिए अपनी जान जोखिम में डालकर सीवर या सेप्टिक टैंक में उतरने के लिए मजबूर न होना पड़े।
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