संवाद : दलित सिख चिंतक सरदार राजविंदर सिंह राही, के साथ खास बातचीत का संपादित अंश।
दया सिंह
पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर ने ये शब्द उस समय कहे थे जब ऑपरेशन ब्लू स्टार के बाद नवंबर 1984 में सिखों का नरसंहार हुआ था। उन्होंने कहा था— “If Sikhs are liquidated, country can’t survive” अर्थात यदि सिखों का अस्तित्व समाप्त कर दिया गया तो देश भी टिक नहीं पाएगा। दूसरे शब्दों में, सिख बचेगा तो देश बचेगा।
दुर्भाग्य से, लेखक के अनुसार, संघ परिवार की राजनीति ने पहले सिखों को राजनीतिक निर्माण प्रक्रिया से बाहर किया और उसका अंतिम चरण 1984 की घटनाओं के रूप में सामने आया। परिणामस्वरूप सिख केवल एक वोट बैंक बनकर रह गया। यदि अन्ना आंदोलन की भूमिका को देखा जाए तो उसका प्रत्यक्ष निशाना भले ही मनमोहन सिंह की सरकार थी, किंतु यह भी ध्यान देने योग्य है कि वे पहले प्रधानमंत्री थे जिन्होंने संसद में 1984 की त्रासदी के लिए माफी मांगी थी। आज सिख समाज कहाँ खड़ा है और गुरुओं के नाम पर जीवित पंजाब की क्या स्थिति है, इसे समझने की आवश्यकता है।
केंद्रीय श्री गुरु सिंह सभा की स्थापना का कारण सिंह सभा आंदोलन की शताब्दी थी। इसके अध्यक्ष रहे सरदार हुकम सिंह, जो संविधान सभा के सदस्य भी थे। उन्होंने संविधान पर हस्ताक्षर नहीं किए क्योंकि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सिखों से किए गए वादे पूरे नहीं किए गए थे और उन्होंने वॉकआउट कर दिया था। बाद में वे लोकसभा अध्यक्ष और राजस्थान के राज्यपाल भी रहे।
उनका स्पष्ट मत था कि सिखों और मुसलमानों की उपस्थिति के कारण ही भारत एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है। लेखक के अनुसार शायद यही कारण है कि पहले सिखों और बाद में मुसलमानों को राजनीतिक निर्माण प्रक्रिया से हाशिए पर धकेल दिया गया और वे केवल वोट बैंक बनकर रह गए।
पंजाब में 1980 के बाद जो भी आंदोलन उभरे, उनके पीछे अनेक शक्तियाँ सक्रिय रहीं ताकि सिखों को सिखों के माध्यम से ही विभाजित किया जा सके या उनके एजेंडे को आगे बढ़ने से रोका जा सके। परिणामस्वरूप सिख समाज आपसी टकराव में उलझता चला गया।
उस समय के नेताओं ने परिस्थितियों को समझते हुए, शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति के होते हुए भी केंद्रीय सिंह सभा की स्थापना की। इसका उद्देश्य सिंह सभाओं का मात्र एकीकरण नहीं था, बल्कि विश्वभर के सिखों को एक मंच पर लाना और उन्हें एकता के सूत्र में पिरोना था।
यह समझना आवश्यक है कि 1925 के कानून में शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक समिति को “शिरोमणि” इसलिए कहा गया था ताकि समस्त सिख ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित रह सके। लेकिन स्वतंत्रता के बाद एक बड़ी भूल यह हुई कि 1971 में दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक समिति बनी और बाद में विभिन्न राज्यों में अलग-अलग समितियाँ बनने लगीं। यह नहीं सोचा गया कि इससे पंथ बिखर जाएगा। आज स्थिति सबके सामने है।
लेखक के अनुसार उन्होंने दो प्रयोग किए। पहला, जब सरदार हुकम सिंह के निधन के बाद उन्हें राष्ट्रीय नेताओं से संपर्क का अवसर मिला तो उन्होंने आर्य समाज और सिख समाज को एक मंच पर लाने का प्रयास किया। पाँच मुद्दों—पाखंड, जातिवाद, शोषण, नशामुक्ति और भयमुक्त समाज—पर सहमति बनी और परिणाम सकारात्मक रहे।
दूसरा प्रयोग 2005 में गुरु अर्जन देव जी की शहादत की 400वीं वर्षगांठ पर किया गया। कुरुक्षेत्र के दयानंद महिला महाविद्यालय में आयोजित कार्यक्रम को हरियाणा के राज्यपाल ने “हक़-ए-अमन” नाम दिया। इसमें ए. आर. किदवई, सुरजीत सिंह बरनाला, सीस राम ओला, शेर सिंह तथा एसजीपीसी के प्रतिनिधि शामिल हुए। इसके बाद पंजाब का माहौल अधिक सौहार्दपूर्ण होने लगा।
बाद में गुरु तेग बहादुर जी की शहादत की 350वीं वर्षगांठ के अवसर पर मुस्लिम नेतृत्व आगे आया। दिल्ली, जयपुर और पुणे में संगोष्ठियाँ आयोजित की गईं, जिनका प्रभाव विश्व स्तर तक देखा गया। लेखक का मानना है कि देश सिखों की ओर आशा से देखता है क्योंकि सिख ही हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एक सेतु का कार्य कर सकते हैं।
इन प्रयासों ने सिख, मुस्लिम, जाट और मराठा समुदायों को एक मंच पर लाने का काम किया, जो मिलकर देश की लगभग 52 प्रतिशत आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। लेखक का मानना है कि सिख समाज स्वयं भी इस तथ्य को पूरी तरह नहीं समझ पाया।
लेखक एक प्रश्न उठाते हैं—हिंदू कौन है? संविधान में हिंदू की परिभाषा के अंतर्गत सिख, बौद्ध और जैन को शामिल किया गया है, लेकिन “हिंदू” की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई। जबकि लेखक के अनुसार ये तीनों परंपराएँ उस विचारधारा से भिन्न हैं जिसे सामान्यतः हिंदू कहा जाता है।
वे यह भी उल्लेख करते हैं कि मुगल काल में अबुल फज़ल ने हिंदू के बारे में लिखा था कि वह परंपरावादी है और आगे की सोच से दूर हो सकता है। लेखक का मानना है कि पिछले वर्षों की राजनीतिक दिशा इसी प्रवृत्ति की ओर संकेत करती है।
लेखक डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की आरक्षण नीति का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि आंबेडकर स्वयं कहते थे कि वे हिंदू पैदा हुए हैं, लेकिन हिंदू के रूप में नहीं मरेंगे, और अंततः उन्होंने बौद्ध धर्म स्वीकार किया। लेखक के अनुसार आरक्षण व्यवस्था और सामाजिक वर्गीकरण ने बहुसंख्यक हिंदू होने के दावे को राजनीतिक आधार प्रदान किया।
वे चुनावी आँकड़ों का हवाला देते हुए कहते हैं कि 2014 में भाजपा को 31 प्रतिशत, 2019 में 37 प्रतिशत और 2024 में इससे कम वोट मिले। लेखक प्रश्न उठाते हैं कि शेष समाज कौन है, जिसकी बात गुरु नानक देव जी ने की और जिसे गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना के समय पंचायत आधारित व्यवस्था में स्थान दिया।
लेखक को 1984 के सिख विरोधी दंगों के बाद का एक प्रसंग याद है। वे बताते हैं कि पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह इन घटनाओं से इतने दुखी थे कि जब उनसे मुलाकात हुई तो उन्होंने कहा—“यदि यही हिंदू होना है, तो मैं इसे त्यागता हूँ; मुझे सिख बना लो।”
लेखक के अनुसार यही वर्तमान स्थिति की गंभीरता को दर्शाता है। वे याद दिलाते हैं कि संसार में एकमात्र ऐसा धर्मग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब है जिसमें गुरुओं की वाणी के साथ-साथ अनेक संतों, भक्तों और बाबा फरीद की वाणी भी शामिल है। इसके बावजूद मूल प्रश्न वही है—आज सिख समाज कहाँ खड़ा है?
लेखक अंत में कहते हैं कि पंजाब के लोगों के पास अभी भी एक अवसर है। उन्हें ऐसे मुद्दों को प्रोत्साहित करना चाहिए जो पंजाब की पहचान, एकता और सामाजिक-सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में सहायक हों, ताकि पंजाब को उसके मूल स्वरूप में संरक्षित किया जा सके।
आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।
संवाद : दलित सिख चिंतक सरदार राजविंदर सिंह राही, के साथ खास बातचीत का संपादित अंश।
