अब सामने आने लगे हैं ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के दुष्परिणाम

अब सामने आने लगे हैं ‘लिव-इन रिलेशनशिप’ के दुष्परिणाम

भारत सहित विश्व के अनेक देशों में पिछले कुछ वर्षों के दौरान लिव-इन रिलेशनशिप (स्पअम-पद त्मसंजपवदेीपच) का चलन तेजी से बढ़ा है। आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण, आर्थिक स्वतंत्रता, शिक्षा के विस्तार और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की बढ़ती अवधारणा ने इस व्यवस्था को समाज के एक वर्ग में स्वीकार्यता दिलाई है। लिव-इन रिलेशनशिप का मूल विचार यह है कि दो वयस्क बिना विवाह के एक साथ पति-पत्नी की तरह रहें और अपने संबंध को आगे बढ़ाने या परखने का अवसर प्राप्त करें। इसके समर्थक इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और आधुनिक जीवन का हिस्सा मानते हैं। किंतु हाल के वर्षों में देश के विभिन्न भागों से सामने आ रही घटनाओं ने इस व्यवस्था के कई नकारात्मक पहलुओं को भी उजागर किया है। हत्या, आत्महत्या, मानसिक उत्पीड़न, आर्थिक शोषण, विश्वासघात, कानूनी विवाद और बच्चों के भविष्य से जुड़े प्रश्न लगातार चर्चा का विषय बन रहे हैं। ऐसे में लिव-इन रिलेशनशिप के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और कानूनी प्रभावों पर गंभीर चिंतन आवश्यक हो गया है।

लिव-इन रिलेशनशिप की सबसे बड़ी चुनौती इसकी अस्थिरता मानी जाती है। विवाह एक सामाजिक, कानूनी और सांस्कृतिक संस्था है जिसके साथ जिम्मेदारियों और प्रतिबद्धताओं का स्पष्ट ढांचा जुड़ा होता है। इसके विपरीत लिव-इन संबंधों में अक्सर यह स्थायित्व और स्पष्टता नहीं होती। जब संबंध केवल पारस्परिक सहमति पर आधारित होता है और उसे समाप्त करने की प्रक्रिया भी अपेक्षाकृत सरल होती है, तब कई बार दोनों पक्षों में दीर्घकालिक जिम्मेदारी की भावना कमजोर पड़ जाती है। परिणामस्वरूप संबंधों में असुरक्षा, अविश्वास और अनिश्चितता का वातावरण पैदा हो सकता है। यही कारण है कि अनेक मामलों में कुछ समय बाद संबंध टूट जाते हैं और दोनों पक्ष भावनात्मक संकट का सामना करते हैं।

मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव भी चिंता का विषय हैं। किसी भी घनिष्ठ संबंध में भावनात्मक निवेश अत्यधिक होता है। यदि संबंध अचानक टूट जाए या किसी एक पक्ष द्वारा विश्वासघात किया जाए तो उसका गहरा मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ता है। अवसाद, तनाव, चिंता, अकेलापन और आत्मविश्वास में कमी जैसी समस्याएँ सामने आ सकती हैं। कई समाचारों में ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ संबंध विच्छेद के बाद युवाओं ने आत्महत्या जैसे कदम उठाए या गंभीर मानसिक आघात का सामना किया। यह स्थिति बताती है कि केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर्याप्त नहीं है, बल्कि भावनात्मक परिपक्वता और जिम्मेदारी भी उतनी ही आवश्यक है।

लिव-इन रिलेशनशिप से जुड़े अपराधों में वृद्धि भी समाज को चिंतित कर रही है। पिछले कुछ वर्षों में ऐसे कई चर्चित मामले सामने आए जिनमें लिव-इन पार्टनर द्वारा हत्या, हिंसा या शारीरिक उत्पीड़न की घटनाएँ हुईं। यद्यपि अपराध केवल लिव-इन संबंधों तक सीमित नहीं हैं और वैवाहिक जीवन में भी घरेलू हिंसा तथा अपराध होते हैं, फिर भी लिव-इन संबंधों में पारिवारिक और सामाजिक निगरानी का अपेक्षाकृत अभाव कई बार जोखिम को बढ़ा देता है। जब कोई व्यक्ति अपने परिवार और सामाजिक नेटवर्क से दूर रहकर संबंध में होता है, तब समस्याओं के समय उसे पर्याप्त सहयोग और हस्तक्षेप नहीं मिल पाता।

महिलाओं की सुरक्षा और अधिकारों का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। भारतीय न्यायपालिका ने समय-समय पर लिव-इन संबंधों में रहने वाली महिलाओं के कुछ अधिकारों को मान्यता दी है, किंतु व्यवहारिक स्तर पर अनेक कठिनाइयाँ बनी हुई हैं। यदि संबंध टूट जाता है तो महिला को आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और भविष्य की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ सकता है। कई मामलों में विवाह का आश्वासन देकर लंबे समय तक संबंध बनाए रखने और बाद में त्याग देने की शिकायतें सामने आती रही हैं। ऐसे मामलों में कानूनी प्रक्रिया जटिल हो सकती है और पीड़ित पक्ष को न्याय प्राप्त करने में कठिनाई हो सकती है।

बच्चों का भविष्य भी इस बहस का एक महत्वपूर्ण पहलू है। यदि लिव-इन संबंध से संतान जन्म लेती है, तो उसके पालन-पोषण, अभिभावकीय जिम्मेदारी और सामाजिक पहचान से जुड़े प्रश्न सामने आ सकते हैं। भारतीय कानून बच्चों के अधिकारों की रक्षा का प्रयास करता है, किंतु संबंध टूटने की स्थिति में बच्चे अक्सर सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। पारिवारिक अस्थिरता का प्रभाव उनके मानसिक विकास, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार पर पड़ सकता है। बाल मनोविज्ञान के विशेषज्ञ लंबे समय से यह बताते रहे हैं कि बच्चों के लिए स्थिर और सहयोगी पारिवारिक वातावरण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

भारतीय समाज की सांस्कृतिक संरचना भी इस विषय पर विचार करते समय ध्यान में रखनी चाहिए। भारत में परिवार केवल पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक सामाजिक संस्था है जिसमें माता-पिता, भाई-बहन, रिश्तेदार और समुदाय की भी भूमिका होती है। विवाह इस संरचना को जोड़ने वाला एक महत्वपूर्ण माध्यम रहा है। लिव-इन रिलेशनशिप के बढ़ते चलन के साथ पारंपरिक पारिवारिक संबंधों में दूरी और विखंडन की आशंका व्यक्त की जाती है। हालांकि समाज परिवर्तनशील है और नई जीवनशैलियाँ विकसित होती रहती हैं, फिर भी किसी भी परिवर्तन के सामाजिक परिणामों का गंभीर मूल्यांकन आवश्यक है।

यह भी ध्यान रखना चाहिए कि लिव-इन रिलेशनशिप के समर्थकों के अपने तर्क हैं। उनका कहना है कि यह व्यवस्था दो वयस्कों को स्वतंत्र रूप से अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार देती है। वे इसे विवाह से पहले अनुकूलता समझने का माध्यम मानते हैं। कई लोग यह भी तर्क देते हैं कि असफल विवाहों और तलाक की बढ़ती संख्या को देखते हुए संबंधों के वैकल्पिक मॉडल पर विचार किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक समाज में वयस्कों की स्वतंत्रता और निजता का सम्मान किया जाना चाहिए। इसलिए इस विषय पर चर्चा करते समय संतुलित दृष्टिकोण आवश्यक है।

फिर भी यह तथ्य अनदेखा नहीं किया जा सकता कि स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। यदि कोई संबंध केवल तात्कालिक आकर्षण या भावनात्मक आवेग पर आधारित हो और उसमें दीर्घकालिक प्रतिबद्धता का अभाव हो, तो उसके नकारात्मक परिणाम सामने आने की संभावना बढ़ जाती है। संबंध चाहे विवाह का हो या लिव-इन का, उसकी सफलता का आधार पारदर्शिता, विश्वास, सम्मान और उत्तरदायित्व ही होते हैं। इन मूल्यों के बिना कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक स्वस्थ नहीं रह सकती।

सरकार, समाज और शैक्षणिक संस्थानों की भी इस विषय में महत्वपूर्ण भूमिका है। युवाओं को केवल अधिकारों की जानकारी देना पर्याप्त नहीं है; उन्हें संबंधों की जिम्मेदारियों, भावनात्मक स्वास्थ्य, कानूनी प्रावधानों और सामाजिक परिणामों के बारे में भी जागरूक किया जाना चाहिए। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में जीवन कौशल (स्पमि ैापससे), मानसिक स्वास्थ्य और जिम्मेदार संबंधों पर संवाद को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। साथ ही, कानूनों को भी इस प्रकार विकसित किया जाना चाहिए कि किसी भी प्रकार के संबंध में रहने वाले व्यक्तियों के अधिकार और सुरक्षा सुनिश्चित हो सकें।

लिव-इन रिलेशनशिप को केवल आधुनिकता बनाम परंपरा के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। यह एक जटिल सामाजिक विषय है जिसके अनेक आयाम हैं। जहाँ एक ओर व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विकल्प का प्रश्न है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक स्थिरता, मानसिक स्वास्थ्य, महिलाओं की सुरक्षा और बच्चों के भविष्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे भी जुड़े हुए हैं। हाल के वर्षों में सामने आई घटनाएँ संकेत देती हैं कि इस व्यवस्था के कुछ गंभीर दुष्परिणाम भी हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आवश्यकता इस बात की है कि समाज भावनात्मक परिपक्वता, जिम्मेदारी और पारस्परिक सम्मान के मूल्यों को मजबूत करे। किसी भी संबंध की सफलता केवल उसके स्वरूप में नहीं, बल्कि उसमें निहित प्रतिबद्धता, संवेदनशीलता और उत्तरदायित्व में निहित होती है। यही दृष्टिकोण स्वस्थ व्यक्ति, स्वस्थ परिवार और स्वस्थ समाज के निर्माण का आधार बन सकता है।

लेखक सृजन संसार के समूह संपादक हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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