IT उद्योग का नया संकट : बढ़ते विशेषज्ञ, घटती नौकरियाँ

IT उद्योग का नया संकट : बढ़ते विशेषज्ञ, घटती नौकरियाँ

भारत का आईटी सेक्टर लंबे समय तक मध्यवर्गीय सपनों का सबसे बड़ा कारखाना रहा। एक इंजीनियरिंग डिग्री, कैंपस प्लेसमेंट, महानगर की नौकरी और फिर स्थिर जीवन—यह लगभग एक सामाजिक मॉडल बन चुका था। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। हाल ही में एक महिला द्वारा नौ वर्ष का आईटी करियर छोड़कर ऑटो चलाने की खबर इसलिए चर्चा में नहीं आई कि उसने पेशा बदला, बल्कि इसलिए कि उसने उस बेचैनी को उजागर कर दिया जिसे हजारों आईटी कर्मचारी भीतर ही भीतर महसूस कर रहे हैं।

सवाल यह नहीं है कि एक महिला ने नौकरी क्यों छोड़ी। असली सवाल यह है कि क्या भारत का आईटी मॉडल उस मोड़ पर पहुँच चुका है जहाँ रोजगार वृद्धि और तकनीकी वृद्धि अब एक-दूसरे के समानार्थी नहीं रह गए हैं?

भारत का आईटी उद्योग अभी भी विशाल है। FY26 में इसका आकार लगभग 315 अरब डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है और कुल प्रत्यक्ष रोजगार 59.5 लाख के आसपास है। उद्योग अब भी बढ़ रहा है। लेकिन समस्या वृद्धि की गति में है। FY25 में जहाँ 58.2 लाख लोग कार्यरत थे, वहीं FY26 में यह संख्या 59.5 लाख हुई। अर्थात रोजगार वृद्धि केवल 2.3 प्रतिशत रही।

यही वह आँकड़ा है जो सबसे अधिक ध्यान मांगता है। एक समय था जब भारतीय आईटी उद्योग का विकास सीधे भर्ती से जुड़ा होता था। कंपनी का राजस्व बढ़ता था तो कर्मचारियों की संख्या भी बढ़ती थी। अब पहली बार यह संबंध टूटता दिखाई दे रहा है। स्वयं उद्योग संगठन NASSCOM इसे “नॉन-लीनियर ग्रोथ” कह रहा है—यानी कम लोगों से अधिक उत्पादन।

रोजगार वृद्धि की यह धीमी चाल तब और गंभीर दिखाई देती है जब इसे इंजीनियरिंग शिक्षा के विस्तार के साथ रखकर देखा जाए। भारत हर वर्ष लगभग 15 लाख इंजीनियरिंग स्नातक तैयार कर रहा है। इनमें बड़ी संख्या कंप्यूटर साइंस, आईटी और इलेक्ट्रॉनिक्स पृष्ठभूमि की होती है। लेकिन उद्योग उतनी नौकरियाँ पैदा नहीं कर रहा। दूसरी ओर, उद्योग लगातार यह शिकायत भी कर रहा है कि उसे आवश्यक कौशल वाले लोग नहीं मिल रहे। यही भारतीय तकनीकी शिक्षा का सबसे बड़ा विरोधाभास है—डिग्री की अधिकता और कौशल की कमी।

दिलचस्प तथ्य यह है कि इंजीनियरों की रोजगार-योग्यता (Employability) में सुधार हुआ है। 2025 में B.Tech स्नातकों की Employability लगभग 71.5 प्रतिशत तक पहुँचने की बात कही गई।

क्योंकि उसी समय शीर्ष पाँच भारतीय आईटी कंपनियों—जैसे Tata Consultancy Services, Infosys, Wipro, HCLTech और Tech Mahindra—ने FY26 में संयुक्त रूप से लगभग 7,000 कर्मचारियों की कमी की। यह कोई सामान्य घटना नहीं है। यह संकेत है कि उद्योग अब “मैनपावर मॉडल” से “एआई-प्रोडक्टिविटी मॉडल” की ओर बढ़ रहा है।

दरअसल, कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने पहली बार आईटी उद्योग की उस बुनियादी संरचना को चुनौती दी है जिस पर भारत की तकनीकी अर्थव्यवस्था खड़ी थी। पहले एक प्रोजेक्ट के लिए सौ इंजीनियर चाहिए होते थे। अब वही काम पचास इंजीनियर और एआई टूल्स के साथ किया जा सकता है। इसलिए कंपनियाँ अधिक भर्ती की जगह “री-स्किलिंग” पर जोर दे रही हैं।

यही कारण है कि आज एक साथ दो विरोधी दृश्य दिखाई देते हैं— कंपनियाँ कहती हैं कि उन्हें योग्य लोग नहीं मिल रहे।लाखों युवा कहते हैं कि उन्हें नौकरी नहीं मिल रही।

दोनों बातें एक साथ सच हैं। समस्या बेरोजगारी भर नहीं, बल्कि “स्किल मिसमैच” की है। इस बीच एक और बड़ा परिवर्तन हो रहा है। रोजगार का केंद्र पारंपरिक आईटी सेवा कंपनियों से हटकर ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (GCCs) की ओर जा रहा है। भारत में अब 2,100 से अधिक GCC केंद्र कार्यरत हैं, जिनमें लगभग 23.6 लाख लोग काम करते हैं। ये केवल बैक-ऑफिस नहीं, बल्कि अनुसंधान, इंजीनियरिंग, एआई और उत्पाद विकास के केंद्र बनते जा रहे हैं।

इसका अर्थ है कि आईटी उद्योग मर नहीं रहा, बल्कि अपना स्वरूप बदल रहा है। फिर भी यह बदलाव सामाजिक तनाव पैदा करेगा। क्योंकि भारत की शिक्षा व्यवस्था अभी भी बड़ी संख्या में ऐसे इंजीनियर तैयार कर रही है जिनके लिए 2005–2020 वाला नौकरी बाजार अब मौजूद नहीं है। माता-पिता और छात्र अभी भी उसी पुराने सपने के पीछे दौड़ रहे हैं जिसमें डिग्री अपने-आप नौकरी की गारंटी थी। जबकि एआई के बाद की दुनिया में डिग्री नहीं, कौशल निर्णायक होगा।

सोशल मीडिया और ऑनलाइन मंचों पर बढ़ती चिंता भी इसी परिवर्तन को दर्शाती है। अनेक युवा यह प्रश्न पूछ रहे हैं कि यदि लाखों इंजीनियर हर वर्ष निकल रहे हैं तो रोजगार कहाँ हैं। वहीं उद्योग का तर्क है कि अवसर मौजूद हैं, लेकिन आवश्यक कौशल वाले उम्मीदवार कम हैं।

भारत के लिए वास्तविक चुनौती यही है। यदि शिक्षा प्रणाली, उद्योग और नीति-निर्माता इस अंतर को नहीं भर पाए, तो आने वाले वर्षों में देश एक विचित्र स्थिति का सामना कर सकता है—जहाँ लाखों डिग्रीधारी युवा होंगे, लेकिन उद्योग को फिर भी योग्य प्रतिभा नहीं मिलेगी।

इसलिए आईटी सेक्टर का संकट केवल नौकरी का संकट नहीं है। यह शिक्षा, कौशल, तकनीक और अर्थव्यवस्था के बीच बढ़ती दूरी का संकट है और शायद यही कारण है कि ऑटो चलाने वाली वह पूर्व आईटी कर्मचारी केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं, बल्कि उस बदलते भारत का प्रतीक है जहाँ तकनीकी विकास जारी है, लेकिन रोजगार का गणित पूरी तरह बदल चुका है। अब सवाल यह नहीं कि कितने इंजीनियर बन रहे हैं; सवाल यह है कि भविष्य की अर्थव्यवस्था को किस तरह के इंजीनियर चाहिए।

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