भारत का वह एतिहासिक द्वीप जहां से यूरोपीय साम्राज्यवाद की शुरुआत हुई

भारत का वह एतिहासिक द्वीप जहां से यूरोपीय साम्राज्यवाद की शुरुआत हुई

इतिहास में कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं जो देखने में मामूली लगती हैं, लेकिन उनके दूरगामी परिणाम सदियों तक दिखाई देते हैं। 1498 में भारत पहुँचे वास्को डी गामा की पहली यात्रा भी ऐसी ही एक घटना थी। आम तौर पर इसे यूरोप द्वारा भारत की समुद्री खोज के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, लेकिन वास्तविकता कहीं अधिक जटिल और रोचक है। यह केवल एक समुद्री यात्रा नहीं थी, बल्कि उस भू-राजनीतिक परिवर्तन की शुरुआत थी जिसने आने वाली सदियों में भारत और यूरोप के संबंधों की दिशा बदल दी। विडंबना यह है कि जिस यात्रा को इतिहास ने महान सफलता के रूप में दर्ज किया, उसकी शुरुआत और अंत दोनों ही वास्को डी गामा के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं थे।

भारत पहुँचने के बाद वास्को डी गामा ने कालीकट के शासक समुत्री (जमोरिन) से व्यापारिक संबंध स्थापित करने का प्रयास किया। किंतु अरब व्यापारियों के प्रभाव और पुर्तगालियों द्वारा लाए गए साधारण उपहारों के कारण उन्हें अपेक्षित सम्मान नहीं मिला। व्यापारिक सफलता भी सीमित रही और अंततः उन्हें निराश होकर लौटना पड़ा लेकिन इतिहास का खेल यहीं शुरू होता है।

अरब सागर में मौसम खराब हो चुका था। तेज़ तूफानों के कारण पुर्तगाली जहाज़ उस मार्ग से वापस नहीं जा सके जिससे वे भारत आए थे। मजबूरन उन्हें भारत के पश्चिमी तट के साथ-साथ उत्तर दिशा में बढ़ना पड़ा। यहीं से एक असफल यात्रा ने इतिहास का नया मोड़ लिया।

कालीकट छोड़ने के बाद पुर्तगाली जहाज़ वर्तमान केरल के उत्तरी तटों तक पहुँचे। यात्रा विवरणों में वर्णित ष्कोम्पियाष् को कई इतिहासकार आज के कन्नूर क्षेत्र से जोड़ते हैं, जहाँ के स्थानीय शासकों के कालीकट से राजनीतिक मतभेद थे।

तूफान थमने की प्रतीक्षा करते हुए पुर्तगालियों ने स्थानीय मछुआरों से संपर्क किया। इसके बाद वे उत्तर की ओर बढ़े और वर्तमान कर्नाटक तट के निकट स्थित सुंदर नेतरानी द्वीप पहुँचे, जिसे उन्होंने ‘सांता मारिया’ नाम दिया लेकिन उनकी वास्तविक दिलचस्पी कुछ और मील आगे उनका इंतजार कर रही थी।

कारवार तट के निकट स्थित अंजेदिवा द्वीप उस समय शायद एक साधारण समुद्री पड़ाव भर रहा होगा। वास्को डी गामा के लिए भी यह शुरुआत में सिर्फ़ पानी, भोजन और विश्राम का स्थान था। लेकिन आगे चलकर यही द्वीप पुर्तगालियों के लिए रणनीतिक महत्व का केंद्र बन गया और लगभग चार शताब्दियों तक पुर्तगाली प्रभाव का हिस्सा रहा।

यात्रा विवरणों में उल्लेख है कि स्थानीय लोगों ने पुर्तगालियों को मीठे पानी के स्रोत, खाद्य सामग्री और जंगलों में उपलब्ध दालचीनी के वृक्षों की जानकारी दी। इससे वे प्रभावित हुए कि इतना छोटा द्वीप भी प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर था।

यहाँ उन्हें एक ऐसा धार्मिक स्थल भी दिखाई दिया जिसे उन्होंने अपनी समझ के अनुसार ष्गिरजाघरष् के अवशेष के रूप में वर्णित किया। वहाँ स्थापित काले पत्थरों को उन्होंने ईसाई पूजा से जोड़कर देखा। आधुनिक दृष्टि से यह संभव प्रतीत होता है कि वे स्थानीय हिंदू धार्मिक परंपराओं और शिवलिंगों को समझ नहीं पाए थे। वास्तव में उस समय यूरोपीय यात्रियों की धार्मिक समझ मुख्यतः ईसाई और मुस्लिम समाजों तक सीमित थी।

वास्को डी गामा के यात्रा विवरणों का अध्ययन यह संकेत देता है कि यूरोप में समाप्त हो चुके धर्मयुद्धों (क्रूसेड) की मानसिकता अभी भी जीवित थी। भारत पहुँचकर भी पुर्तगाली व्यापार को केवल आर्थिक दृष्टि से नहीं देख रहे थे।

उनकी दृष्टि में मुस्लिम व्यापारी मुख्य प्रतिद्वंद्वी थे, जबकि स्थानीय गैर-मुस्लिम समाज को वे अक्सर अपनी परिचित धार्मिक श्रेणियों में समझने का प्रयास करते थे। इस कारण भारतीय धार्मिक और सामाजिक विविधता को समझने में उन्हें कठिनाई हुई।

अंजेदिवा में ही वास्को डी गामा की मुलाकात एक ऐसे व्यक्ति से हुई जिसने आगे चलकर पुर्तगाली साम्राज्य के इतिहास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वह व्यक्ति स्थानीय भाषाओं के साथ-साथ यूरोपीय भाषाओं से भी परिचित था। उसने स्वयं को पश्चिम एशिया और भारत के राजनीतिक जगत से जुड़ा बताया। उसकी पहचान को लेकर इतिहासकारों में मतभेद हैं। कुछ उसे यहूदी मूल का मानते हैं, कुछ उसे बहुभाषी व्यापारी या राजनीतिक मध्यस्थ बताते हैं। वास्को डी गामा को उस पर संदेह भी था और आकर्षण भी।

अंततः उसे अपने साथ पुर्तगाल ले जाया गया, जहाँ उसका नाम ‘गैस्पर डी गामा’ रखा गया। आगे चलकर वही व्यक्ति भारतीय महासागर क्षेत्र, व्यापारिक मार्गों और स्थानीय राजनीति की जानकारी का महत्वपूर्ण स्रोत बना। उसने पुर्तगालियों को भारत और एशिया को एक बेहद जटिल और अज्ञत दुनिया से परिचय कराने में मदद की।

इतिहास के विडंबनापूर्ण पात्रों में उसका नाम अवश्य लिया जाना चाहिए-एक ऐसा व्यक्ति जिसे स्थानीय लोग ठग और कहानीबाज समझते थे लेकिन देखिए उसी ने साम्राज्यवादी विस्तार की दिशा को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

वास्को डी गामा की पहली भारत यात्रा को केवल समुद्री खोज के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वास्तव में यह उस समय की वैश्विक राजनीति, व्यापारिक प्रतिस्पर्धा और धार्मिक संघर्षों का हिस्सा थी। यदि कालीकट में उसे मनचाही सफलता मिल जाती, तो शायद आगे की घटनाएँ अलग होतीं। यदि मौसम खराब न होता, तो शायद वह अंजेदिवा तक न पहुँचता। यदि गैस्पर डी गामा से उसकी मुलाकात न होती, तो संभव है कि पुर्तगाली विस्तार का स्वरूप भी कुछ भिन्न होता लेकिन इतिहास संयोगों से ही बनता है।

वास्को डी गामा भारत आया तो मसालों की खोज में था, लेकिन वह अनजाने में एक ऐसे युग का द्वार खोल गया जिसने भारतीय महासागर की राजनीति बदल दी। उसकी पहली यात्रा विजय यात्रा कम और सीखने की यात्रा अधिक थी। कालीकट में उसे निराशा मिली, लेकिन वापसी के दौरान मिले अनुभवों ने पुर्तगाल को भारत में स्थायी उपस्थिति स्थापित करने का मार्ग दिखाया। चार शताब्दियों तक गोवा और पश्चिमी तट पर बना रहा पुर्तगाली प्रभाव उसी यात्रा की विरासत था। आज भी गोवा के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन और पुर्तगाल से उसके ऐतिहासिक संबंधों में उस कहानी की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।

इस दृष्टि से वास्को डी गामा की पहली भारत यात्रा केवल एक नाविक की कहानी नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक क्षण की कथा है जहाँ संयोग, राजनीति, व्यापार और साम्राज्यवाद एक-दूसरे से आकर मिलते हैं। यह आलेख इतिहास-कथा और विश्लेषणात्मक इतिहास-लेखन के बीच संतुलन बनाते हुए लिखा गया है, ताकि पाठक को घटनाओं का रोमांच भी मिले और उनके व्यापक ऐतिहासिक महत्व का बोध भी हो।

यह आलेख प्रवीण झा जी के द्वारा साझा किए गए उनके फेसबुक पन्ने से लिया गया है। इसे हमलोगों ने भाषा और तथ्यों को थोड़ा संपादित किया है। वैसे मुख्य तथ्य यथावत वत हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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