गौतम चौधरी
भारत लंबे समय से स्वयं को दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। यह दावा केवल उसकी जनसंख्या या चुनावों के विशाल पैमाने के कारण नहीं, बल्कि उसकी बहुलतावादी परंपरा, संवैधानिक व्यवस्था और लोकतांत्रिक संस्थाओं के कारण भी रहा है। किंतु पिछले कुछ वर्षों में अंतरराष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में भारत के संदर्भ में एक दूसरा शब्द भी तेजी से उभरा है – “Electoral Autocracy” (निर्वाचनी अधिनायकवाद)।
लोकतंत्र पर शोध करने वाली संस्था ट-क्मउ प्देजपजनजम ने भारत को इसी श्रेणी में रखा है। दूसरी ओर अनेक विद्वान, नीति-विश्लेषक और भारतीय राजनीतिक पर्यवेक्षक इस निष्कर्ष को अतिरंजित, विवादास्पद और पद्धतिगत त्रुटियों के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं। इस प्रकार प्रश्न केवल भारत की राजनीतिक व्यवस्था का नहीं, बल्कि उस वैश्विक बहस का भी है जिसमें लोकतंत्र की परिभाषा, उसकी गुणवत्ता और उसकी संस्थागत मजबूती पर चर्चा हो रही है।
यदि हम चुनाव बनाम लोकतंत्र की बात करते हैं तो थोड़ी तसल्ली से विश्लेषण करना होगा। मसलन,
इस पूरे विवाद का केंद्र एक मूलभूत प्रश्न है-क्या नियमित चुनाव ही लोकतंत्र का प्रमाण हैं?
लोकतंत्र के समर्थक और आलोचक दोनों इस बात पर सहमत हैं कि चुनाव लोकतंत्र का आवश्यक तत्व हैं लेकिन पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर भी होता है कि क्या मीडिया स्वतंत्र है, क्या न्यायपालिका निष्पक्ष है, क्या नागरिक समाज बिना भय के कार्य कर सकता है, क्या विपक्ष के लिए राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के समान अवसर उपलब्ध हैं और क्या सत्ता पर प्रभावी संस्थागत नियंत्रण मौजूद है?
भारत के आलोचक कहते हैं कि चुनावों की निरंतरता के बावजूद इन क्षेत्रों में चिंताजनक बदलाव दिखाई दे रहे हैं। मीडिया की स्वायत्तता, नागरिक स्वतंत्रताओं, विश्वविद्यालयों की स्वतंत्रता, जांच एजेंसियों की निष्पक्षता और राजनीतिक केंद्रीकरण को लेकर लगातार प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
दूसरी ओर यह भी उतना ही सत्य है कि भारत आज भी उन देशों की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता जहाँ लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा लगभग समाप्त हो चुकी है। भारत में सत्ता परिवर्तन संभव है, विपक्ष चुनाव लड़ता है, राज्य सरकारें केंद्र से असहमति व्यक्त करती हैं, न्यायपालिका समय-समय पर सरकारों को चुनौती देती है और मीडिया का एक हिस्सा आलोचनात्मक भूमिका निभाता है।
इसीलिए भारत की स्थिति को ‘लोकतंत्र’ और ‘अधिनायकवाद’ जैसी दो परस्पर विरोधी श्रेणियों में बाँटना वास्तविकता को अत्यधिक सरल बना देना होगा।
फिर भी यह तथ्य नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि लोकतंत्र की गुणवत्ता को लेकर चिंताएँ बढ़ी हैं। उस चिंता को स्वाभाविक रूप से देखा जा सकता है। पिछले दशक में सत्ता का केंद्रीकरण, राजनीतिक व्यक्तित्वों का बढ़ता प्रभाव, चुनावी वित्तपोषण की पारदर्शिता पर बहस, विपक्षी नेताओं के विरुद्ध एजेंसियों की कार्रवाई, मीडिया स्वामित्व के बदलते स्वरूप और सार्वजनिक विमर्श में बढ़ते ध्रुवीकरण ने कई प्रश्न खड़े किए हैं।
इन प्रश्नों को केवल विदेशी षड्यंत्र या पश्चिमी पूर्वाग्रह कहकर खारिज कर देना उतना ही गलत होगा, जितना यह मान लेना कि भारत में लोकतंत्र समाप्त हो चुका है। लोकतंत्र की मजबूती का आकलन भावनाओं से नहीं, बल्कि संस्थागत व्यवहार से होता है। यही कारण है कि लोकतांत्रिक स्वास्थ्य पर होने वाली आलोचनाएँ किसी राष्ट्र के विरोध में नहीं, बल्कि उसकी संस्थाओं की स्थिति को समझने का प्रयास भी हो सकती हैं।
हमें इस विषय पर भी सोचना चाहिए कि क्या विदेशी रिपोर्टें अंतिम सत्य हैं? यहाँ एक दूसरी सावधानी भी आवश्यक है। लोकतंत्र को मापने वाली संस्थाओं की अपनी सीमाएँ हैं। उनके आकलन अक्सर विशेषज्ञों की राय, सांख्यिकीय मॉडलों और चयनित संकेतकों पर आधारित होते हैं। कई विद्वान मानते हैं कि इन सूचकांकों में सांस्कृतिक और राजनीतिक पूर्वाग्रह की संभावना से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।
इसलिए किसी भी रिपोर्ट को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता। लोकतंत्र की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन अंततः उस समाज के अनुभव, संस्थागत व्यवहार और नागरिकों के विश्वास से ही होता है।
इस पूरी चर्चा का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वह है जिस पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जा रहा है। यदि भारत को बार-बार ‘निर्वाचनी अधिनायकवाद’ कहा जाता है और इसके समर्थन या विरोध में राजनीतिक खेमेबंदी होती है, तो इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं। सबसे पहला प्रभाव अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पर पड़ेगा। आज वैश्विक अर्थव्यवस्था में निवेश केवल बाजार के आकार को नहीं देखता; वह संस्थागत स्थिरता, कानून के शासन और लोकतांत्रिक विश्वसनीयता को भी महत्व देता है। यदि किसी देश की लोकतांत्रिक साख पर लगातार प्रश्न उठते हैं, तो उसका प्रभाव उसकी वैश्विक छवि पर पड़ सकता है।
दूसरा प्रभाव आंतरिक सामाजिक ध्रुवीकरण का है। लोकतंत्र पर चर्चा धीरे-धीरे तथ्यात्मक बहस से हटकर पहचान की राजनीति का हिस्सा बन सकती है। एक पक्ष हर आलोचना को राष्ट्र-विरोधी बताने लगता है, जबकि दूसरा पक्ष हर सरकारी निर्णय को अधिनायकवाद का प्रमाण मानने लगता है। ऐसी स्थिति में लोकतांत्रिक सुधारों की गंभीर चर्चा पीछे छूट जाती है।
तीसरा और अधिक गंभीर खतरा संस्थागत विश्वास के क्षरण का है। लोकतंत्र केवल संविधान में नहीं, बल्कि नागरिकों के भरोसे में जीवित रहता है। यदि जनता का बड़ा हिस्सा चुनाव आयोग, न्यायपालिका, मीडिया, विश्वविद्यालयों या अन्य सार्वजनिक संस्थाओं पर विश्वास खोने लगे, तो लोकतंत्र का औपचारिक ढाँचा भले बना रहे, उसकी नैतिक शक्ति कमजोर पड़ जाती है।
चौथा खतरा युवा पीढ़ी का देश के सत्ता प्रतिष्ठान से मोहभंग का है। यदि युवाओं को यह लगने लगे कि अवसर समान नहीं हैं, संस्थाएँ निष्पक्ष नहीं हैं और उनकी आवाज़ का कोई महत्व नहीं है, तो लोकतंत्र के प्रति उनका विश्वास कम हो सकता है। किसी भी राष्ट्र के लिए इससे बड़ा संकट शायद ही कोई हो।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह स्वयं की आलोचना करने की क्षमता रखता है। इसलिए लोकतंत्र पर उठने वाले प्रश्नों को दबाना समाधान नहीं हो सकता। आलोचना से असहमति संभव है, लेकिन आलोचना को ही अवैध घोषित कर देना लोकतांत्रिक आत्मविश्वास का संकेत नहीं माना जाता। साथ ही, यह भी उतना ही आवश्यक है कि आलोचना तथ्य, प्रमाण और संस्थागत विश्लेषण पर आधारित हो, न कि वैचारिक पूर्वाग्रहों पर। लोकतंत्र का स्वास्थ्य न तो अंधभक्ति से सुधरता है और न ही निरंतर निराशावाद से।
अंत में, भारत के सामने वास्तविक प्रश्न यह नहीं है कि कोई विदेशी संस्था उसे क्या कहती है। न ही यह कि वह लोकतंत्र है या अधिनायकवाद। वास्तविक प्रश्न यह है कि क्या भारत अपनी लोकतांत्रिक संस्थाओं को इतना मजबूत बना रहा है कि नागरिकों का विश्वास निरंतर बना रहे? क्या न्यायपालिका पर किसी प्रकार का कोई शासनात्मक दबाव नहीं है? क्या मीडिया विविध और आलोचनात्मक है? क्या विपक्ष को निष्पक्ष अवसर मिल रहे हैं? क्या नागरिक स्वतंत्रताएँ सुरक्षित हैं? क्या राज्य की संस्थाएँ राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर कार्य कर रही हैं?
यदि इन प्रश्नों के सकारात्मक उत्तर मिलते हैं, तो कोई भी रिपोर्ट भारत की लोकतांत्रिक प्रतिष्ठा को स्थायी नुकसान नहीं पहुँचा सकती लेकिन यदि संस्थागत विश्वास कमजोर पड़ने लगे, तो दुनिया के सबसे बड़े चुनाव, सबसे बड़ी आबादी और सबसे बड़े लोकतांत्रिक दावे भी पर्याप्त नहीं होंगे। लोकतंत्र चुनावों से नहीं, बल्कि नागरिकों के विश्वास, संस्थाओं की विश्वसनीयता और असहमति को सहन करने की क्षमता से जीवित रहता है। भारत की लोकतांत्रिक यात्रा की सफलता भी इसी कसौटी पर परखी जाएगी।
