गौतम चौधरी
बनारस में मांस और मछली की दुकानों को शहर से बाहर करने का प्रस्ताव हो, उत्तराखंड और हिमाचल को ‘देवभूमि’ बताकर वहां कुछ समुदायों की मौजूदगी पर प्रश्नचिह्न लगाया जाए, या फिर किसी नदी, पर्वत अथवा नगर को ‘पवित्र’ घोषित कर उसके आधार पर नागरिक अधिकारों को सीमित करने की कोशिश हो-इन सभी घटनाओं में एक शब्द बार-बार सामने आता है ’’पवित्रता’’।
पहली दृष्टि में यह एक धार्मिक अवधारणा लगती है, लेकिन भारतीय समाज के इतिहास में इसका अर्थ केवल धार्मिक नहीं रहा है। ‘पवित्रता’ सदियों तक सामाजिक पदानुक्रम का आधार भी रही है। इसलिए आज जब यह शब्द सार्वजनिक जीवन और सरकारी नीतियों के विमर्श में प्रवेश करता है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि उसके सामाजिक और संवैधानिक अर्थों को भी समझा जाए।
भारतीय संविधान ने नागरिकों के अधिकारों का आधार जन्म नहीं, बल्कि नागरिकता को बनाया है। संविधान कहीं भी किसी नगर, नदी या प्रदेश को ऐसा दर्जा नहीं देता, जहां भोजन, व्यवसाय या निवास के अधिकार धार्मिक आधार पर सीमित किए जा सकें। इसलिए यदि किसी स्थान को ‘पवित्र’ बताकर नागरिक अधिकारों पर प्रतिबंध लगाने की कोशिश होती है, तो यह केवल धार्मिक प्रश्न नहीं रह जाता, यह संवैधानिक प्रश्न भी बन जाता है।
इतिहास बताता है कि भारतीय समाज में ‘पवित्र’ और ‘अपवित्र’ की अवधारणा का सबसे गहरा संबंध वर्ण-व्यवस्था से रहा है। शास्त्रीय वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण को सर्वाेच्च और सर्वाधिक पवित्र माना गया, जबकि श्रम से जुड़े अनेक समुदायों को क्रमशः निम्नतर स्थान दिया गया। समय के साथ यह व्यवस्था हजारों जातियों में विभाजित हुई, लेकिन ‘शुद्ध’ और ‘अशुद्ध’ का विचार सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बना रहा। भोजन, विवाह, पानी, मंदिर प्रवेश और सामाजिक संपर्क तक इसी सोच से प्रभावित रहे।
यहीं एक महत्वपूर्ण भेद समझना आवश्यक है। सभी ब्राह्मण एक जैसे नहीं रहे और न ही सभी ने इस व्यवस्था का समर्थन किया। भारतीय इतिहास में अनेक ब्राह्मण विद्वानों ने जाति-व्यवस्था की आलोचना भी की है लेकिन इसके समानांतर यह भी एक ऐतिहासिक तथ्य है कि ’’ब्राह्मणवादी सामाजिक व्यवस्था’’ ने जन्म-आधारित श्रेष्ठता को वैधता प्रदान की। इसलिए आलोचना किसी जाति विशेष के व्यक्तियों की नहीं, बल्कि उस विचारधारा की होनी चाहिए जो जन्म के आधार पर मनुष्यों का मूल्य निर्धारित करती है। यहां योग्यता को महत्व नहीं दिया जाता है।
अक्सर यह माना जाता है कि इस व्यवस्था में केवल दलित और पिछड़े समुदाय ही हाशिए पर रहे। किंतु वास्तविकता इससे अधिक जटिल है। स्वयं ब्राह्मण समाज भी अनेक उपसमूहों में विभाजित रहा है। कर्मकांडी या पुरोहित परंपरा से जुड़े समूहों ने लंबे समय तक अपने अतिरिक्त अनेक अन्य ब्राह्मण समूहों की सामाजिक स्थिति पर भी प्रश्न उठाए। भूमिहार, त्यागी, अनाविल, मोहियाल और ऐसे कई समुदाय स्वयं को ब्राह्मण परंपरा से जोड़ते रहे हैं, किंतु विभिन्न क्षेत्रों में उनकी सामाजिक स्वीकार्यता को लेकर विवाद भी होते रहे हैं।
कर्मकांडी ब्राह्मणें ने इन जातियों को अपनी श्रेष्ठता के सामने कभी महत्व नहीं दिया और इन्हें नीच घोषित करते रहे। इसके सबसे बड़े भुप्तभोगी भारतीय किसान आन्दोलन के प्रणेता स्वामी सहजानंद सरस्वती हैं। ब्राह्मणवादियों ने सहजानंद सरस्वती को सन्यासी माना ही नहीं। अभी हाल ही में गोवर्धनपीठ के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने एक बयान में कहा था कि सहजानंद को सन्यासी होने का अधिकार ही नहीं था क्योंकि वे ब्राह्मण नहीं थे। इन उक्त जातियों को कई स्थानों पर पूर्ण धार्मिक अधिकार देने में संकोच किया गया, तो कहीं उनके पुरोहित कर्म पर प्रश्न उठाए गए।
यह तथ्य इस बात की ओर संकेत करता है कि ‘पवित्रता’ का सिद्धांत केवल ब्राह्मण और बहुजन के बीच की रेखा तक सीमित नहीं था; वह स्वयं तथाकथित ऊंची जातियों के भीतर भी श्रेणीकरण का आधार बनता रहा। अर्थात्, जब सामाजिक प्रतिष्ठा का आधार जन्म और धार्मिक शुद्धता हो, तब विभाजन की प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती; वह लगातार नए स्तर बनाती रहती है।
यही कारण है कि समाजशास्त्री ‘ब्राह्मण’ और ‘ब्राह्मणवाद’ में अंतर करते हैं। पहला एक सामाजिक समुदाय है, जबकि दूसरा एक वैचारिक ढांचा है, जिसमें जन्म के आधार पर मनुष्यों की श्रेष्ठता और हीनता निर्धारित होती है। इस विचारधारा का प्रभाव केवल ब्राह्मण समुदाय तक सीमित नहीं रहा; अनेक अन्य जातियों ने भी समय-समय पर इसी श्रेणीबोध को अपनाया और अपने से नीचे माने जाने वाले समूहों पर लागू किया। इसलिए समस्या किसी एक जाति की नहीं, बल्कि उस मानसिकता की है जो जन्म को नैतिक और सामाजिक योग्यता का आधार मानती है।
आज ‘पवित्रता’ का विमर्श भोजन की राजनीति में भी दिखाई देता है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में भोजन की एकरूप संस्कृति कभी नहीं रही। कश्मीर, बंगाल, केरल, गोवा और पूर्वाेत्तर से लेकर बिहार के तिरहुत क्षेत्र तक अनेक ब्राह्मण समुदाय पारंपरिक रूप से मांसाहार करते रहे हैं। दूसरी ओर बड़ी संख्या में गैर-ब्राह्मण समुदाय शाकाहारी भी हैं। इसलिए शाकाहार को ‘हिंदू’ और मांसाहार को ‘गैर-हिंदू’ बताना न इतिहास के अनुरूप है और न समाजशास्त्र के।
यदि किसी एक क्षेत्र की भोजन परंपरा को पूरे देश की धार्मिक पहचान घोषित किया जाता है, तो उससे भारतीय समाज की वास्तविक विविधता छिप जाती है। यही कारण है कि भोजन का प्रश्न व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न भी है और सांस्कृतिक विविधता का भी।
नदियों और पर्वतों के संदर्भ में भी यही बात लागू होती है। गंगा करोड़ों लोगों की आस्था का केंद्र हो सकती है लेकिन वह एक प्राकृतिक धरोहर भी है, जिस पर किसी एक धार्मिक समुदाय का एकाधिकार नहीं हो सकता। यदि किसी नदी को इस प्रकार परिभाषित किया जाए कि उसके किनारे रहने वाले कुछ नागरिक स्वाभाविक रूप से संदिग्ध या अवांछित माने जाने लगें, तो यह संवैधानिक समानता की भावना के विरुद्ध होगा।
लोकतंत्र में राज्य का दायित्व धार्मिक आस्था का सम्मान करना है, न कि किसी एक धार्मिक व्याख्या को प्रशासनिक नीति का आधार बना देना। संविधान का धर्मनिरपेक्ष स्वरूप इसी संतुलन की मांग करता है।
आज आवश्यकता ‘पवित्रता’ की नहीं, बल्कि ‘समानता’ की राजनीति को मजबूत करने की है। स्वच्छता एक सार्वजनिक मूल्य है; पवित्रता व्यक्तिगत आस्था का विषय है। स्वच्छता का संबंध विज्ञान और सार्वजनिक स्वास्थ्य से है, जबकि पवित्रता का संबंध व्यक्ति के विश्वास से। जब इन दोनों को मिलाकर देखा जाता है, तब सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष पैदा होते हैं।
भारत की शक्ति उसकी विविधता में है। यदि जन्म, भोजन, पेशा या धार्मिक पहचान के आधार पर नागरिकों का मूल्यांकन होने लगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर होगी। लेकिन यदि संविधान को सर्वाेच्च मानते हुए सभी नागरिकों के अधिकारों की समान रक्षा की जाए, तो आस्था भी सुरक्षित रहेगी और सामाजिक न्याय भी।
प्रश्न यह नहीं है कि कौन पवित्र है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक भारत में किसी नागरिक की गरिमा जन्म से तय होगी या संविधान से। आधुनिक भारत का उत्तर स्पष्ट है-मनुष्य की प्रतिष्ठा का आधार उसकी जाति नहीं, उसकी नागरिकता और समान अधिकार हैं। यही भारतीय गणराज्य की सबसे बड़ी नैतिक उपलब्धि है।
