राजमहल की पहाड़ियों से उठती सभ्यता की गुंज

राजमहल की पहाड़ियों से उठती सभ्यता की गुंज

राजमहल की पहाड़ियों में बहती हवा केवल पेड़ों की सरसराहट नहीं, बल्कि एक प्राचीन सभ्यता की स्मृतियों को भी अपने साथ लेकर चलती है। इन पहाड़ियों, जंगलों और घाटियों में सदियों से माल पहाड़िया समुदाय निवास करता आया है, जिसने प्रकृति को कभी महज संसाधन नहीं माना, बल्कि उसे अपने अस्तित्व, आस्था और आत्मीय रिश्ते के रूप में जिया। झारखंड की पहचान केवल उसकी खनिज संपदा से नहीं, बल्कि उन जनजातीय समुदायों से भी है, जिन्होंने जंगल, पहाड़ और नदियों के साथ सह-अस्तित्व का ऐसा जीवन-दर्शन विकसित किया, जो आज जलवायु संकट से जूझती दुनिया के लिए भी प्रेरणा बन सकता है।

माल पहाड़िया भारत सरकार द्वारा विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह (च्टज्ळ) के रूप में अधिसूचित समुदाय है। इनकी आबादी मुख्यतः झारखंड के साहिबगंज, पाकुड़, दुमका और गोड्डा जिलों में है, जबकि कुछ परिवार बिहार और पश्चिम बंगाल में भी रहते हैं। उनकी सांस्कृतिक पहचान का केंद्र आज भी राजमहल की पहाड़ियाँ और दामिन-ए-कोह का वन क्षेत्र है।

जनजातीय महोत्सव इसलिए केवल नृत्य, गीत और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों का आयोजन नहीं होना चाहिए। यह उन समुदायों की जीवित विरासत को समझने और सम्मान देने का अवसर है, जिन्होंने सदियों से इस भूभाग की प्रकृति, संस्कृति और सामुदायिक चेतना को संरक्षित रखा है। विकास की कोई भी कहानी तब तक अधूरी है, जब तक उसमें उन लोगों की आवाज शामिल न हो, जिन्होंने अपनी स्मृतियों, श्रम और परंपराओं से इस धरती को सींचा है।

माल पहाड़िया इतिहास में केवल एक जनजातीय समुदाय के रूप में नहीं, बल्कि प्रतिरोध और आत्मसम्मान की परंपरा के रूप में भी सामने आते हैं। औपनिवेशिक शासन के शुरुआती दौर में राजमहल की दुर्गम पहाड़ियों पर नियंत्रण स्थापित करना अंग्रेजों के लिए आसान नहीं था। बाहरी हस्तक्षेप के विरुद्ध उनका संघर्ष केवल भूभाग की रक्षा का नहीं, बल्कि अपनी सामाजिक स्वायत्तता और जीवन-पद्धति की रक्षा का संघर्ष भी था।

उनकी सबसे महत्वपूर्ण सांस्कृतिक धरोहर उनकी भाषा माल्टो है, जिसे द्रविड़ भाषा परिवार से जोड़ा जाता है। यह केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि लोकज्ञान, औषधीय परंपराओं, कृषि अनुभवों, मिथकों और सामुदायिक स्मृतियों का जीवित भंडार है। आधुनिक शिक्षा, प्रशासन और रोजगार की बदलती संरचना के कारण नई पीढ़ी में मातृभाषा का प्रयोग घट रहा है। भाषा कमजोर पड़ती है तो उसके साथ एक समुदाय की सांस्कृतिक स्मृति भी धीरे-धीरे क्षीण होने लगती है।

माल पहाड़िया समाज की सामाजिक संरचना सामुदायिक जीवन पर आधारित रही है। पारंपरिक ग्राम नेतृत्व सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन के संचालन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है तथा विवादों का समाधान सामूहिक सहमति से करने की परंपरा रही है। यह हमें याद दिलाता है कि लोकतांत्रिक संवाद और सामुदायिक निर्णय की परंपरा केवल आधुनिक संस्थाओं की देन नहीं है।

प्रकृति के साथ उनका संबंध उनकी जीवन-पद्धति का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है। जंगल उनके लिए बाजार की वस्तु नहीं, जीवन का आधार हैं; पहाड़ केवल भूगोल नहीं, आस्था का हिस्सा हैं और धरती केवल भूमि नहीं, पूर्वजों की स्मृति है। उनकी पारंपरिक आजीविका में झूम खेती, वनोपज, शहद, कंद-मूल, औषधीय पौधों और लघु वन उत्पादों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है। बदलते वन कानून, घटते जंगल और जलवायु परिवर्तन ने इस अर्थव्यवस्था को गहराई से प्रभावित किया है। रोजगार की तलाश में युवाओं का पलायन अब केवल आर्थिक समस्या नहीं, बल्कि सांस्कृतिक निरंतरता के लिए भी चुनौती बन गया है।

उनकी सांस्कृतिक पहचान लोकगीतों, लोकनृत्यों और पर्व-त्योहारों में जीवित है। मांदर और ढोल की थाप पर होने वाला सामूहिक नृत्य मनोरंजन भर नहीं, बल्कि सामुदायिक एकता और पीढ़ियों के बीच सांस्कृतिक संवाद का माध्यम है। लिखित इतिहास के सीमित अभिलेखों के बीच यही लोकपरंपराएँ उनकी जीवित स्मृति बनकर एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही हैं।

आज सबसे बड़ी चुनौतियाँ शिक्षा, स्वास्थ्य और आजीविका से जुड़ी हैं। पहाड़ी क्षेत्रों में विद्यालयों और स्वास्थ्य सेवाओं की सीमित पहुंच, मातृभाषा में शिक्षा का अभाव, आर्थिक कठिनाइयाँ और पलायन समुदाय के विकास को प्रभावित करते हैं। शिक्षा तभी प्रभावी होगी, जब वह स्थानीय भाषा और संस्कृति से जुड़े। इसी तरह आधुनिक चिकित्सा और पारंपरिक औषधीय ज्ञान के बीच सम्मानजनक संवाद विकसित करने की आवश्यकता है।

सरकार की छात्रवृत्तियों, छात्रावासों, कौशल विकास और च्टज्ळ समुदायों के लिए विशेष योजनाओं का महत्व है, लेकिन किसी योजना की सफलता केवल बजट खर्च से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जानी चाहिए कि उसका वास्तविक लाभ राजमहल की पहाड़ियों के अंतिम गाँव तक पहुँचा या नहीं।

जनजातीय महोत्सव की सार्थकता भी तभी होगी, जब वह मंचीय प्रस्तुतियों से आगे बढ़कर माल्टो भाषा के संरक्षण, लोकसाहित्य के दस्तावेजीकरण, पारंपरिक कृषि ज्ञान के अध्ययन, हस्तशिल्प को बाजार और युवाओं को सम्मानजनक अवसर देने का माध्यम बने। विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों और सांस्कृतिक संगठनों को भी इस दिशा में आगे आना होगा। डिजिटल अभिलेखीकरण, लोकगीतों का संकलन, पारंपरिक चिकित्सा का अध्ययन और स्थानीय युवाओं को शोध एवं नेतृत्व से जोड़ना समय की आवश्यकता है।

माल पहाड़िया समाज को केवल विकास से वंचित समुदाय के रूप में देखना भी उचित नहीं होगा। उनके पास सीमित उपभोग, सामुदायिक संसाधन प्रबंधन, जैव विविधता संरक्षण और प्रकृति के प्रति उत्तरदायित्व का ऐसा पारंपरिक ज्ञान है, जिसकी आज पूरी दुनिया को आवश्यकता है।

राजमहल की पहाड़ियाँ आज भी मौन नहीं हैं। उनकी हवाएँ, जंगल, पगडंडियाँ और लोकगीत उस सभ्यता की गवाही देते हैं, जिसने मनुष्य और प्रकृति के बीच संतुलन को जीवन का मूल्य माना। माल पहाड़िया उसी जीवित परंपरा के संवाहक हैं।

उन्हें सुरक्षित रखना केवल एक जनजाति का संरक्षण नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक स्मृति, पर्यावरणीय चेतना और सामुदायिक लोकतांत्रिक विरासत की रक्षा है। किसी सभ्यता की वास्तविक प्रगति उसकी ऊँची इमारतों से नहीं, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने सबसे प्राचीन समुदायों की भाषा, संस्कृति, ज्ञान और प्रकृति के साथ उनके आत्मीय रिश्ते को कितनी गरिमा और संवेदनशीलता से सुरक्षित रखती है।

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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