गौतम चौधरी की खास रपट
भारत-पाकिस्तान सीमा पर डेरा बाबा नानक में 21 सितंबर की शाम एक ऐसा दृश्य सामने आया, जिसने बंद पड़े करतारपुर कॉरिडोर को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया। अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज के नेतृत्व में सिख संगत करतारपुर कॉरिडोर के जीरो लाइन के निकट अरदास करने पहुंची थी। पाकिस्तान की ओर भी सिख संगत ने इसी उद्देश्य से कार्यक्रम आयोजित किया था। परंतु भारतीय सीमा बल ने जत्थेदार और संगत को जीरो लाइन स्थित दर्शन स्थल तक जाने की अनुमति नहीं दी। सुरक्षा कारणों और निर्धारित प्रोटोकॉल का हवाला देते हुए उन्हें बैरिकेड के पास रोक दिया गया। इसके बाद जत्थेदार और संगत वहीं बैठ गई और रेहरास साहिब का पाठ, शबद-कीर्तन तथा अरदास जैसे कार्यक्रमों का आयोजन किया।
इस घटना को इसलिए केवल एक धार्मिक कार्यक्रम में आई प्रशासनिक बाधा के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। इसके पीछे करतारपुर कॉरिडोर के बंद होने की कहानी, भारत-पाकिस्तान संबंधों में आया तनाव और सिख समुदाय की धार्मिक भावनाएँ तीनों जुड़े हुए हैं।
करतारपुर साहिब सिखों के लिए सामान्य तीर्थस्थल नहीं है। गुरु नानक देव के जीवन का अंतिम चरण करतारपुर से जुड़ा है। पाकिस्तान के नारोवाल जिले में स्थित गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर भारत की सीमा से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है। 2019 में भारत और पाकिस्तान के बीच एक समझौते के बाद करतारपुर कॉरिडोर शुरू हुआ था। इसका उद्देश्य भारतीय श्रद्धालुओं को बिना वीजा करतारपुर साहिब तक पहुंच उपलब्ध कराना था। अक्टूबर 2024 में दोनों देशों ने इस व्यवस्था को अगले पांच वर्षों के लिए बढ़ाया भी था।
यह कॉरिडोर भारत-पाकिस्तान संबंधों की सामान्य कहानी से कुछ अलग था। दोनों देशों के बीच राजनीतिक और सैन्य तनाव के बावजूद धार्मिक यात्रियों के लिए यह रास्ता खुला रहा। इस अर्थ में करतारपुर कॉरिडोर केवल एक सड़क या गलियारा नहीं था। वह सीमा के दोनों ओर रहने वाली सिख संगत के लिए एक धार्मिक संपर्क था।
फिर अप्रैल 2025 में पहलगाम आतंकी हमले के बाद परिस्थितियाँ तेजी से बदलीं। भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ा और मई 2025 से भारतीय पक्ष से करतारपुर कॉरिडोर की तीर्थयात्रा निलंबित कर दी गई। अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने संसद में भी सुरक्षा परिस्थितियों के कारण कॉरिडोर की सेवाएँ निलंबित रहने की जानकारी दी थी।
21 सितंबर का कार्यक्रम गुरु नानक देव के ज्योति-जोत दिवस के अवसर पर आयोजित किया गया था। दोनों ओर की सिख संगत ने करतारपुर कॉरिडोर को फिर खोलने के लिए एक साथ अरदास करने की योजना बनाई थी। पाकिस्तान की ओर गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर से नगर कीर्तन निकाला गया, जो जीरो लाइन तक पहुंचा। भारत की ओर अकाल तख्त के कार्यवाहक जत्थेदार ज्ञानी कुलदीप सिंह गड़गज संगत के साथ डेरा बाबा नानक पहुंचे। कार्यक्रम के पीछे पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी का निमंत्रण भी था।
भारतीय पक्ष की इच्छा थी कि जत्थेदार और कुछ सिख प्रतिनिधि जीरो लाइन के निकट दर्शन स्थल तक जाएँ और पाकिस्तान की ओर मौजूद संगत से धार्मिक प्रतीकों का आदान-प्रदान करें। रिपोर्टों के अनुसार, केवल पांच सिखों को आगे जाने देने का अनुरोध भी किया गया था। उनके पास श्री गुरु ग्रंथ साहिब साहिब जी के लिए रुमाला साहिब और पंज प्यारों के लिए सिरोपा ले जाने की योजना थी। भारतीय सीमा बल ने यह अनुमति नहीं दी।
बीएसएफ ने सुरक्षा कारणों और वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों का हवाला देते हुए जत्थे को आगे बढ़ने की अनुमति नहीं दी। रिपोर्टों के अनुसार, अधिकारियों ने कहा कि यदि संगत अरदास करना चाहती है तो वह निकटवर्ती गुरुद्वारे में कर सकती है। सीमा क्षेत्र सामान्य धार्मिक स्थल नहीं है। यहां आवाजाही के लिए सुरक्षा प्रोटोकॉल लागू होते हैं। भारत-पाकिस्तान संबंधों में मौजूदा तनाव को देखते हुए सुरक्षा एजेंसियों के लिए जीरो लाइन तक किसी धार्मिक समूह की सामूहिक आवाजाही भी एक संवेदनशील विषय हो सकती है।
मगर दूसरी तरफ जत्थेदार और संगत का तर्क था कि वे किसी राजनीतिक गतिविधि के लिए नहीं बल्कि अरदास और करतारपुर साहिब के दर्शन की भावना के साथ वहां आए हैं। यही इस पूरे विवाद का मूल बिंदु है।
इस पूरे मामले में एक सूक्ष्म अंतर समझना जरूरी है। कुछ समाचार माध्यमों की सुर्खियों में यह कहा गया कि जत्थेदार को अरदास करने से रोक दिया गया। मगर उपलब्ध विवरण के अनुसार, उन्हें ’’जीरो लाइन अथवा दर्शन स्थल तक जाकर अरदास करने से रोका गया’’। इसके बाद जत्थेदार और संगत बीएसएफ बैरिकेड के सामने बैठ गए और वहीं रेहरास साहिब, शबद-कीर्तन और अरदास की गई।
अरदास के बाद जत्थेदार गड़गज ने इस रोक पर असंतोष जताया। उनका सवाल था कि यदि राजनीतिक और दूसरे विशिष्ट लोगों को कभी-कभी सीमा के निकट विशेष सुविधाएँ मिल सकती हैं तो धार्मिक संगत को जीरो लाइन तक जाने की अनुमति क्यों नहीं दी जा सकती।
उन्होंने केंद्र और पंजाब सरकार से सिख भावनाओं का सम्मान करने की अपील की। उन्होंने यह भी कहा कि अरदास केवल कॉरिडोर खोलने के लिए नहीं बल्कि भारत-पाकिस्तान के बीच शांति और पंजाब के रास्ते सीमा-पार व्यापार बहाल करने के लिए भी की गई। जत्थेदार ने घोषणा की कि जब तक करतारपुर कॉरिडोर नहीं खुलता, वे हर महीने डेरा बाबा नानक आकर संगत के साथ अरदास करेंगे।
पाकिस्तान की ओर गुरुद्वारा दरबार साहिब करतारपुर से नगर कीर्तन जीरो लाइन तक पहुंचा। वहां भी धार्मिक कार्यक्रम और अरदास हुई। इस तरह सीमा के दोनों ओर एक ही समय में एक ही मांग उठी-करतारपुर कॉरिडोर फिर खोला जाए और दोनों देशों के बीच सिख श्रद्धालुओं का धार्मिक आवागमन बहाल हो।
यह दृश्य अपने आप में महत्वपूर्ण था। सीमा के दो ओर दो सरकारें हैं, दो सुरक्षा व्यवस्थाएँ हैं और दोनों देशों के बीच गहरा अविश्वास है। इसके बावजूद एक धार्मिक परंपरा दोनों ओर के लोगों को एक ही स्थान की ओर देखने के लिए प्रेरित कर रही थी।
करतारपुर कॉरिडोर का सवाल केवल धार्मिक यात्रा का सवाल नहीं है। पंजाब की सामाजिक और आर्थिक स्मृति में भारत और पाकिस्तान की सीमा का विशेष महत्व है। विभाजन ने पंजाब को दो हिस्सों में बाँट दिया। परिवार अलग हुए। धार्मिक स्थल सीमा के दूसरी तरफ चले गए। लोगों की स्मृतियाँ एक ओर रह गईं और नागरिकता दूसरी ओर।
करतारपुर कॉरिडोर ने उस विभाजन के बीच एक सीमित लेकिन प्रतीकात्मक रास्ता बनाया था। इसीलिए इसके बंद होने का असर केवल उन श्रद्धालुओं पर नहीं है जो करतारपुर साहिब जाना चाहते हैं। यह भारत-पाकिस्तान के बीच बचे हुए मानवीय संपर्क के एक छोटे से रास्ते के बंद होने का भी प्रतीक है।
इस पूरी बहस में सुरक्षा पक्ष को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पहलगाम हमले के बाद भारत और पाकिस्तान के संबंध जिस स्तर पर तनावपूर्ण हुए, उसके बाद सीमा पर सुरक्षा एजेंसियों का सतर्क रहना स्वाभाविक है। करतारपुर कॉरिडोर धार्मिक आस्था से जुड़ा है, मगर वह अंतरराष्ट्रीय सीमा के बिल्कुल निकट स्थित है। इसलिए किसी भी सामूहिक कार्यक्रम के लिए सुरक्षा अनुमति और प्रोटोकॉल का पालन आवश्यक है।
दूसरी तरफ सुरक्षा व्यवस्था ऐसी भी होनी चाहिए कि धार्मिक भावनाओं को अनावश्यक रूप से चोट न पहुँचे। यही वह संतुलन है जिसकी परीक्षा इस घटना ने एक बार फिर सामने रख दी है। मौजूदा परिस्थितियों में करतारपुर कॉरिडोर को तुरंत खोलना या न खोलना एक सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा निर्णय है। इसका अंतिम निर्णय केंद्र सरकार और सुरक्षा एजेंसियों के आकलन पर निर्भर करेगा।
मगर धार्मिक कार्यक्रमों के लिए कोई सीमित और स्पष्ट व्यवस्था बनाने पर विचार किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, सुरक्षा एजेंसियों की निगरानी में सीमित संख्या में प्रतिनिधियों को निर्धारित स्थान तक जाने की अनुमति, दोनों पक्षों के धार्मिक प्रतिनिधियों के बीच पूर्व-समन्वय और स्पष्ट सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाया जा सकता है। ऐसी व्यवस्था तभी संभव होगी जब सुरक्षा एजेंसियाँ इसे सुरक्षित मानें और दोनों देशों के संबंधित पक्ष इसके लिए सहमत हों।
’’करतारपुर की राह आज भी कुछ किलोमीटर की ही है। मगर उसे खोलने के लिए केवल सीमा की दूरी कम करना पर्याप्त नहीं होगा। दोनों देशों के बीच विश्वास की दूरी कम करना भी उतना ही आवश्यक होगा।’’
