गौतम चौधरी
देहरादून/ विशेष आलेख/ 31 अक्टूबर 2026
देहरादून की सांस्कृतिक पहचान केवल उसकी प्राकृतिक सुंदरता, पहाड़ों और शैक्षणिक संस्थानों तक सीमित नहीं है। इस शहर की एक विशिष्ट सांस्कृतिक चेतना भी है, जो साहित्य, संगीत, कला और सामाजिक संवाद की विभिन्न धाराओं से निर्मित हुई है। इसी सांस्कृतिक चेतना को व्यापक मंच प्रदान करने वाला आयोजन है—’विरासत आर्ट एंड हेरिटेज फेस्टिवल’। वर्ष 2026 में आयोजित इसका 31वां संस्करण अब अपने आधे से अधिक पड़ाव पार कर चुका है। पिछले आठ दिनों की गतिविधियों पर नजर डालें तो यह आयोजन केवल मनोरंजन का उत्सव नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक विविधता को एक साथ देखने और समझने का अवसर बनता दिखाई देता है।
रीच (REACH—Rural Entrepreneurship for Art & Cultural Heritage) संस्था द्वारा आयोजित यह महोत्सव 23 अक्टूबर से 6 नवंबर तक चल रहा है। इस बार आयोजन स्थल में परिवर्तन करते हुए इसे गढ़ी कैंट के नींबूवाला स्थित हिमालयन कल्चरल सेंटर में स्थानांतरित किया गया है। पहले यह आयोजन कौलागढ़ रोड पर होता था। नए परिसर में बड़े सभागार, खुले मंच और विस्तृत आयोजन स्थल के माध्यम से इसे अधिक व्यवस्थित और व्यापक स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। आयोजन के संस्थापक एवं अध्यक्ष आरके सिंह ने इसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थापित करने की अपनी महत्वाकांक्षा भी व्यक्त की है।
लोक परंपराओं से शास्त्रीय संगीत तक
विरासत की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां भारतीय संस्कृति को किसी एक विधा या क्षेत्र की सीमा में बांधकर नहीं देखा जाता। इसका आरंभ उत्तराखंड के पारंपरिक छोलिया नृत्य और उप्रेती बहनों के मंगल गायन से हुआ। इसके बाद पद्मभूषण पंडित साजन मिश्रा और स्वरांश मिश्रा की शास्त्रीय गायन प्रस्तुति ने बनारस घराने की संगीत परंपरा का परिचय कराया। यह प्रस्तुति इस बात का उदाहरण थी कि भारतीय शास्त्रीय संगीत आज भी अपनी रचनात्मक ऊर्जा और सांगीतिक गहराई के साथ श्रोताओं को जोड़ने की क्षमता रखता है।
महोत्सव के दूसरे दिन जौनसार-बावर के लोकनृत्य, सरोद वादन और प्रसिद्ध गायक जसबीर जस्सी की प्रस्तुति ने एक अलग सांस्कृतिक रंग प्रस्तुत किया। जस्सी की प्रस्तुति में सूफी संगीत, पॉप और बॉलीवुड की विविधता देखने को मिली। अगले दिनों में विंटेज कार रैली भी आकर्षण का केंद्र बनी। इसमें 28 कारों और 51 दोपहिया वाहनों ने हिस्सा लिया। 1928 की फोर्ड से लेकर 1935 की रोल्स रॉयस और पुराने भारतीय दोपहिया वाहनों तक ने शहरवासियों को मोटर इतिहास की एक झलक दिखाई।
इस प्रकार विरासत ने संगीत और नृत्य के साथ-साथ जीवनशैली, तकनीक और ऐतिहासिक धरोहर को भी अपनी सांस्कृतिक अभिव्यक्ति का हिस्सा बनाया है।
लोक संस्कृति की जीवंतता और नई पीढ़ी
किसी भी सांस्कृतिक महोत्सव की वास्तविक सफलता इस बात से तय होती है कि वह परंपराओं को केवल मंच पर प्रदर्शित करता है या अगली पीढ़ी तक भी पहुंचाता है। इस कसौटी पर विरासत के कुछ आयोजन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं।
‘विरासत साधना’ के अंतर्गत 21 विद्यालयों के विद्यार्थियों ने गायन और वादन की प्रस्तुतियां दीं। बांसुरी, सितार, वायलिन, तबला और पखावज जैसे वाद्ययंत्रों के माध्यम से बच्चों ने अपनी प्रतिभा का परिचय दिया। यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है कि संगीत और कला का संस्कार केवल पुस्तकीय शिक्षा से विकसित नहीं होता। इसके लिए अभ्यास, गुरु-शिष्य परंपरा और सार्वजनिक मंच पर अपनी कला प्रस्तुत करने का अवसर भी आवश्यक है।
इसी क्रम में 30 अक्टूबर को आयोजित ‘सिट एंड ड्रॉ’ प्रतियोगिता में 13 विद्यालयों के 275 विद्यार्थियों ने भाग लिया। ‘माय सिटी एंड नेचर’ विषय पर बच्चों ने देहरादून की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े अपने विचारों को चित्रों के माध्यम से व्यक्त किया। यह गतिविधि संस्कृति और प्रकृति के बीच संबंध को समझने का एक सार्थक प्रयास है।
साहित्य का प्रवेश : विरासत का एक नया आयाम
इस वर्ष के आयोजन में साहित्यिक संवाद का विस्तार भी उल्लेखनीय है। पहली बार ‘वैली ऑफ वर्ड्स’ के साथ मिलकर ‘VoW\@VIRASAT’ कार्यक्रम आयोजित किया गया। 30 अक्टूबर को हुए इस आयोजन में साहित्य, कविता, पुस्तक चर्चा और संगीत को एक मंच पर लाया गया।
राजकुमार पंवार की पुस्तक ‘अब हुआ सवेरा’ पर चर्चा के दौरान उत्तराखंड में पलायन और युवाओं में बढ़ती नशे की समस्या जैसे प्रश्न सामने आए। प्रख्यात गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र की साहित्यिक यात्रा पर भी विमर्श हुआ। उत्तराखंड राज्य के 25 वर्षों की यात्रा पर केंद्रित पुस्तक ‘उत्तराखंड के 25 वर्ष’ के माध्यम से राज्य के सामाजिक, सांस्कृतिक और विकास संबंधी अनुभवों पर चर्चा की गई। पंजाबी के प्रसिद्ध कवि शिव कुमार बटालवी के गीतों की प्रस्तुति ने इस साहित्यिक सत्र को संगीत से भी जोड़ दिया।
यह प्रयोग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। संस्कृति का अर्थ केवल नृत्य, संगीत और उत्सव नहीं है। इसमें विचार, साहित्य, सामाजिक प्रश्न और सामूहिक स्मृति भी शामिल हैं। जब किसी महोत्सव में पलायन, नशे की समस्या और राज्य के विकास जैसे विषयों पर चर्चा होती है तो वह मनोरंजन से आगे बढ़कर समाज के आत्मचिंतन का माध्यम बनता है।
इंडियन ओशियन : परंपरा और आधुनिकता का संगम
30 अक्टूबर की संगीत संध्या में भारतीय रॉक बैंड इंडियन ओशियन की प्रस्तुति ने महोत्सव को एक अलग पहचान दी। भारतीय लोक संगीत, शास्त्रीय सुरों और आधुनिक रॉक संगीत के मिश्रण ने श्रोताओं को आकर्षित किया। बैंड ने अपनी विशिष्ट फ्यूजन शैली में यह दिखाया कि भारतीय संगीत परंपरा आधुनिक संगीत के साथ संवाद करते हुए भी अपनी मौलिकता बनाए रख सकती है। ‘कंडीसा’ की प्रस्तुति के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ।
यहां एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक प्रश्न भी सामने आता है। क्या आधुनिकता का अर्थ अपनी परंपराओं से दूरी बनाना है? इंडियन ओशियन जैसी प्रस्तुतियां बताती हैं कि ऐसा आवश्यक नहीं है। भारतीय संगीत की जड़ें लोकधुनों, शास्त्रीय रागों और आध्यात्मिक-सांस्कृतिक अनुभवों में हैं। इन्हें आधुनिक वाद्ययंत्रों और नई संगीत शैलियों के साथ जोड़कर भी एक प्रभावशाली अभिव्यक्ति विकसित की जा सकती है।
विरासत के सामने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न
किसी भी बड़े आयोजन का मूल्यांकन केवल उसकी भव्यता और लोकप्रिय कलाकारों की उपस्थिति से नहीं किया जाना चाहिए। उसके सामाजिक और सांस्कृतिक प्रभाव को भी समझना आवश्यक है।
इस वर्ष आयोजन स्थल में परिवर्तन और प्रवेश व्यवस्था में बदलाव महत्वपूर्ण विषय हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की 21 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, विरासत के 31वें संस्करण में पहली बार 50 रुपये का प्रवेश शुल्क निर्धारित किया गया है। हालांकि सभागार में होने वाले कुछ विशेष कार्यक्रमों के लिए अलग टिकट व्यवस्था भी है। आयोजकों के अनुसार, आयोजन स्थल बदलने का एक उद्देश्य यातायात संबंधी असुविधाओं को कम करना और दर्शकों को बेहतर अनुभव देना है।
यहां आयोजकों के सामने एक चुनौती है। विरासत को अंतरराष्ट्रीय पहचान दिलाने की महत्वाकांक्षा के साथ उसकी जनसुलभता भी बनी रहनी चाहिए। लोक संस्कृति का वास्तविक आधार सामान्य जनसमुदाय है। यदि किसी सांस्कृतिक आयोजन में समाज के सभी वर्गों, विशेषकर स्थानीय युवाओं, विद्यार्थियों, ग्रामीण कलाकारों और आर्थिक रूप से कमजोर लोगों की भागीदारी सुनिश्चित होती है, तभी उसका सामाजिक प्रभाव व्यापक हो सकता है।
दूसरा महत्वपूर्ण प्रश्न स्थानीय कलाकारों और शिल्पकारों के आर्थिक सशक्तीकरण का है। विरासत में देश के विभिन्न हिस्सों से आए शिल्पकारों और पारंपरिक उत्पादों को बाजार उपलब्ध कराने की परंपरा रही है। इस बार भी हस्तशिल्प, पारंपरिक वस्त्र, लकड़ी और धातु शिल्प सहित अनेक उत्पादों के प्रदर्शन और बिक्री की व्यवस्था है। इस पहल का मूल्यांकन केवल बिक्री के आधार पर नहीं, बल्कि शिल्पकारों को मिलने वाले दीर्घकालिक बाजार, उचित मूल्य और नए अवसरों के आधार पर भी होना चाहिए।
देहरादून की सांस्कृतिक पहचान का विस्तार
विरासत का 31वां संस्करण एक ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब देश तेजी से आर्थिक, तकनीकी और सामाजिक परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है। वैश्वीकरण और डिजिटल माध्यमों ने दुनिया को निकट ला दिया है। इसके साथ ही स्थानीय भाषाओं, लोककलाओं और पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण की चुनौती भी बढ़ी है।
ऐसे समय में विरासत जैसे आयोजन सांस्कृतिक निरंतरता का माध्यम बन सकते हैं। इनकी सार्थकता इस बात में है कि वे किसी परंपरा को संग्रहालय की वस्तु बनाकर नहीं रखते, बल्कि उसे वर्तमान समाज के जीवन से जोड़ते हैं। उत्तराखंड का छोलिया, जौनसारी नृत्य, गढ़वाली संगीत, बनारस का शास्त्रीय गायन, पंजाबी काव्य परंपरा और आधुनिक भारतीय फ्यूजन संगीत—इन सभी की एक साथ उपस्थिति भारत की बहुलतावादी सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करती है।
देहरादून जैसे शहर के लिए यह अवसर और भी महत्वपूर्ण है। यहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोगों की बड़ी आबादी रहती है। विविध भाषाओं, जीवनशैलियों और सांस्कृतिक परंपराओं का सह-अस्तित्व इस शहर की विशेषता है। विरासत इस विविधता को एक साझा सांस्कृतिक अनुभव में बदलने की क्षमता रखता है।
विरासत का वास्तविक अर्थ अतीत को दोहराना नहीं, बल्कि अतीत से प्राप्त सांस्कृतिक मूल्यों को वर्तमान में जीवित रखना और भविष्य तक पहुंचाना है।
महोत्सव के अभी कुछ दिन शेष हैं। आने वाले दिनों में बेगम परवीन सुल्ताना, रागिनी शंकर, महेश काले, रामना बालचंद्रन और ऊषा उत्थुप जैसे कलाकारों की प्रस्तुतियां इसकी सांगीतिक विविधता को और विस्तार देंगी। 6 नवंबर को ऊषा उत्थुप की प्रस्तुति के साथ इस वर्ष के आयोजन का समापन होगा।
विरासत 2026 का मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि इसने कितने बड़े कलाकारों को मंच दिया, इससे आगे बढ़कर यह देखना होगा कि कितने नए कलाकारों को अवसर मिला, कितने शिल्पकारों को बाजार मिला, कितने बच्चों में अपनी संस्कृति के प्रति जिज्ञासा पैदा हुई और कितने लोगों ने भारत की विविध सांस्कृतिक परंपराओं को निकट से समझा।
यदि यह महोत्सव इन उद्देश्यों को आगे बढ़ा पाता है तो देहरादून का यह आयोजन केवल एक वार्षिक सांस्कृतिक उत्सव नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना को जीवंत बनाए रखने वाला एक महत्वपूर्ण राष्ट्रीय मंच बन सकेगा।
