गौतम चौधरी
इतिहास में कुछ अपराध ऐसे होते हैं, जिनकी भयावहता केवल पीड़ितों की संख्या से नहीं मापी जा सकती। वे समाज की नैतिक चेतना, संस्थाओं की विश्वसनीयता और न्याय की व्यवस्था पर भी प्रश्नचिह्न लगाते हैं। स्पेन में कथित रूप से चुराए गए बच्चों का मामला ऐसा ही है। यह कहानी केवल नवजात शिशुओं के अवैध गोद लेने की नहीं, बल्कि मातृत्व के अधिकार, धार्मिक-सामाजिक रूढ़ियों, सत्ता के प्रभाव और संस्थागत जवाबदेही की भी है। इस प्रकरण में तीन लाख बच्चों को चुराकर अमीर दंपतियों को बेच दिए जाने का दावा लंबे समय से चर्चा में है। किंतु इस संख्या को प्रमाणित तथ्य मान लेना उतना ही अनुचित होगा, जितना पूरे प्रकरण को निराधार कहकर खारिज कर देना।
स्पेन में फ्रांसिस्को फ्रांको का तानाशाही शासन 1939 से 1975 तक रहा। इस अवधि में कैथोलिक चर्च का सामाजिक जीवन और पारिवारिक नैतिकता पर पर्याप्त प्रभाव था। शासन और चर्च के बीच संबंधों ने विवाह, मातृत्व, स्त्री की सामाजिक भूमिका तथा पारिवारिक जीवन से जुड़ी मान्यताओं को प्रभावित किया। विशेषकर अविवाहित माताओं को सामाजिक कलंक और नैतिक निंदा का सामना करना पड़ता था।
ऐसे वातावरण में गर्भवती अविवाहित महिलाओं तथा सामाजिक रूप से कमजोर परिवारों की स्थिति बेहद कठिन थी। कुछ महिलाओं ने बाद में आरोप लगाया कि प्रसव के बाद उन्हें बताया गया कि उनका बच्चा मर गया है, जबकि उन्हें उसके शव को देखने या मृत्यु के पर्याप्त प्रमाण प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला। कुछ परिवारों ने दावा किया कि उनके बच्चों को उनकी जानकारी या स्वतंत्र सहमति के बिना दूसरे परिवारों को सौंप दिया गया।
इन आरोपों के पीछे एक गंभीर मानवीय प्रश्न है। क्या किसी महिला की सामाजिक स्थिति, आर्थिक विवशता अथवा विवाहेतर मातृत्व के आधार पर उससे उसके बच्चे को अलग करना उचित ठहराया जा सकता है? इसका उत्तर स्पष्ट हैकृनहीं। बच्चे के सर्वाेत्तम हित के नाम पर भी माता-पिता के अधिकारों, स्वतंत्र सहमति और कानूनी प्रक्रिया की अनदेखी नहीं की जा सकती।
इस प्रकरण की चर्चा में तीन लाख बच्चों की संख्या बार-बार सामने आती है लेकिन किसी दावे का बार-बार दोहराया जाना उसके प्रमाणित होने का आधार नहीं है। इस संख्या को लेकर यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि क्या यह न्यायिक रूप से प्रमाणित अपहरणों की संख्या है, संदिग्ध गोद लेने के मामलों का अनुमान है अथवा उन बच्चों की व्यापक संख्या से निकाला गया आँकड़ा है जिनकी जन्म-संबंधी जानकारी पर प्रश्न उठे। संदिग्ध जन्म-अभिलेख, अवैध गोद लेना, माता-पिता की सहमति के बिना बच्चों को सौंपना और योजनाबद्ध अपहरण-ये सभी अलग-अलग कानूनी तथा ऐतिहासिक श्रेणियाँ हैं। इनके बीच संबंध हो सकता है, किंतु प्रत्येक घटना के प्रमाण एक नहीं हैं।
अप्रैल 2026 में प्रकाशित एक फॉरेंसिक जाँच से संबंधित रिपोर्ट में कथित चोरी के मामलों में कब्रों की खुदाई और जैविक अवशेषों की जाँच का उल्लेख किया गया। इस प्रकार की जाँच उन परिवारों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है जो अपने बच्चों की मृत्यु या पहचान को लेकर दशकों से अनिश्चितता में हैं। फिर भी, कब्रों से मानव अवशेष मिलना अथवा किसी मामले में जैविक प्रमाण का अभाव अपने आप में पूरे प्रकरण को सिद्ध या असिद्ध नहीं करता। इसके लिए डीएनए परीक्षण, जन्म और मृत्यु के अभिलेख, अस्पतालों के दस्तावेज तथा संबंधित व्यक्तियों की गवाही को साथ रखकर देखना होगा।
अतः तीन लाख बच्चों की चोरी को स्थापित तथ्य बताने से पहले यह जानना जरूरी है कि इस संख्या का मूल स्रोत क्या है, इसकी गणना किस पद्धति से हुई है और स्वतंत्र जाँचों ने इसके कितने मामलों की पुष्टि की है।
इस प्रकरण का सबसे संवेदनशील पक्ष कैथोलिक चर्च तथा उससे जुड़े संस्थानों की भूमिका है। कुछ आरोप अस्पतालों, डॉक्टरों, ननों और धार्मिक संस्थानों से जुड़े व्यक्तियों पर लगे हैं। यदि किसी संस्था के कर्मचारी ने नवजात शिशु की पहचान छिपाई, मृत्यु का झूठा प्रमाण दिया, अभिलेखों में हेरफेर किया अथवा किसी बच्चे को अवैध रूप से दूसरे परिवार को सौंपा, तो उस व्यक्ति की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। यदि ऐसे कार्यों में संस्थागत संरक्षण, मिलीभगत या जानबूझकर की गई अनदेखी प्रमाणित होती है, तो जवाबदेही संबंधित संस्था तक भी पहुँचनी चाहिए।
इस प्रश्न पर धार्मिक पहचान के आधार पर न तो आरोपों से छूट दी जा सकती है और न ही सामूहिक दोष निर्धारित किया जा सकता है। कैथोलिक चर्च एक विशाल और विविध संस्था है। कुछ व्यक्तियों या संस्थानों के विरुद्ध प्रमाण पूरे धार्मिक समुदाय को अपराधी घोषित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। उसी तरह, धार्मिक सेवा, परोपकार और शिक्षा के क्षेत्र में किसी संस्था के योगदान का उल्लेख उसके भीतर हुए संभावित अपराधों की जाँच का विकल्प नहीं बन सकता। बावजूद इसके कैथोलिक चर्च इस आरोप से भाग नहीं सकता। दरअसल, उस दौर में शासन के कई सूत्र उसके पास थे और चर्च शासन का महत्वपूर्ण स्तंभों में से एक था।
नैतिक संस्थाओं की विश्वसनीयता केवल उनके उपदेशों से नहीं, बल्कि इस बात से भी निर्धारित होती है कि वे अपने भीतर हुई गलतियों का सामना कैसे करती हैं। यदि आरोप प्रमाणित हों, तो अभिलेखों तक पहुँच, स्वतंत्र जाँच, पीड़ितों को क्षतिपूर्ति और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई आवश्यक होनी चाहिए। धार्मिक प्रतिष्ठा को न्याय से ऊपर रखना स्वयं उस नैतिकता के विरुद्ध होगा जिसका दावा कोई संस्था करती है।
इस प्रकरण को केवल चर्च बनाम पीड़ित परिवारों के रूप में देखना भी अधूरा दृष्टिकोण होगा। फ्रांको का शासन एक तानाशाही व्यवस्था थी, जिसमें राजनीतिक स्वतंत्रता और नागरिक अधिकार सीमित थे। उस समय की सामाजिक रूढ़ियों, प्रशासनिक नियंत्रण और संस्थागत संबंधों ने महिलाओं तथा बच्चों की स्थिति को प्रभावित किया हो सकता है। इसलिए यह जाँचना आवश्यक है कि अस्पतालों का नियमन किस प्रकार होता था, जन्म और मृत्यु के अभिलेख कैसे रखे जाते थे तथा न्यायिक और प्रशासनिक संस्थाएँ शिकायतों पर कैसी प्रतिक्रिया देती थीं।
यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी बच्चे को गोद लेना अपने आप में अपराध नहीं है। अनेक दंपती निःसंतान होने के कारण बच्चों को अपनाते हैं और उन्हें स्नेहपूर्ण परिवार प्रदान करते हैं। प्रश्न उस स्थिति में उठता है जब गोद लेने की प्रक्रिया धोखाधड़ी, दबाव, अवैध भुगतान या जैविक माता-पिता की सहमति के उल्लंघन पर आधारित हो। किसी बच्चे का पालन-पोषण करने वाले परिवार की वास्तविक परिस्थिति जाने बिना उसे अपराधी मान लेना भी उचित नहीं होगा। लेकिन यदि उसे यह जानते हुए बच्चा सौंपा गया कि उसकी पहचान या जन्म का इतिहास छिपाया जा रहा है, तो उस भूमिका की भी जाँच आवश्यक है।
इसलिए न्याय की प्रक्रिया में बच्चों के जैविक परिवारों के साथ-साथ दत्तक परिवारों के अधिकारों और परिस्थितियों को भी संवेदनशीलता से समझना होगा। केंद्र में बच्चे की पहचान, गरिमा और हित होने चाहिए।
ऐसे मामलों में दशकों बाद न्याय प्राप्त करना कठिन होता है। अस्पतालों के अभिलेख नष्ट हो सकते हैं, संबंधित व्यक्तियों की मृत्यु हो सकती है और गवाहों की स्मृतियाँ कमजोर पड़ सकती हैं। समय बीतने के साथ प्रमाण जुटाना कठिन होता है, लेकिन इससे पीड़ित परिवारों की पीड़ा कम नहीं हो जाती।
स्पेन को ऐसे मामलों में पारदर्शी अभिलेख व्यवस्था, स्वतंत्र जाँच, आवश्यकतानुसार डीएनए परीक्षण और पीड़ित परिवारों को कानूनी सहायता उपलब्ध कराने पर ध्यान देना चाहिए। जिन लोगों को अपने जन्म, जैविक माता-पिता अथवा भाई-बहनों की पहचान जानने का अधिकार है, उनके लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जो निजता और कानूनी अधिकारों की रक्षा करते हुए सत्य तक पहुँचने में सहायता करे।
यदि किसी अपराध में संस्थागत मिलीभगत प्रमाणित होती है, तो जिम्मेदार व्यक्तियों के साथ संबंधित संस्थाओं की भूमिका की भी जाँच होनी चाहिए। जहाँ प्रमाण उपलब्ध न हों, वहाँ अनिश्चितता को स्वीकार करना भी न्यायपूर्ण दृष्टिकोण का हिस्सा है। किसी पीड़ित की गवाही को केवल इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि आरोप बहुत पुराने हैं। दूसरी ओर, किसी गंभीर आरोप को बिना पर्याप्त प्रमाण के अंतिम निष्कर्ष में बदलना भी न्याय की प्रक्रिया को कमजोर करता है।
स्पेन के कथित चोरी हुए बच्चों का प्रकरण आधुनिक समाज के सामने एक व्यापक प्रश्न रखता हैकृक्या धर्म, सत्ता, चिकित्सा अथवा समाजसेवा से जुड़ी संस्थाएँ स्वयं को जवाबदेही से ऊपर मान सकती हैं? किसी भी संस्था की उपयोगिता या प्रतिष्ठा उसे कानून से परे नहीं करती। जब सामाजिक नैतिकता के नाम पर महिलाओं के अधिकार सीमित किए जाते हैं, तब कमजोर लोगों के शोषण की आशंका बढ़ जाती है। जब संस्थाएँ अपने अभिलेखों और निर्णयों पर बाहरी निगरानी स्वीकार नहीं करतीं, तब अन्याय की पहचान और भी कठिन हो जाती है।
इस प्रकरण पर विचार करते समय दो अतियों से बचना आवश्यक है। पहली, कैथोलिक चर्च के विरुद्ध लगे सभी आरोपों को बिना जाँच सत्य मान लेना। दूसरी, धार्मिक संस्था की प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए पीड़ितों के अनुभवों और उपलब्ध प्रमाणों को महत्वहीन समझना। दोनों ही दृष्टिकोण सत्य की खोज में बाधा बनते हैं।
तीन लाख बच्चों की चोरी का दावा अभी जिस स्तर के प्रमाण की माँग करता है, उसे पूरा मान लेने का आधार नहीं है। लेकिन अवैध गोद लेने, माताओं पर दबाव और बच्चों की पहचान छिपाए जाने के आरोपों की गंभीरता भी कम नहीं आँकी जा सकती। इतिहास का दायित्व किसी संस्था को निर्दाेष या दोषी घोषित करने की जल्दबाजी करना नहीं, बल्कि प्रमाणों के आधार पर घटनाओं को समझना और पीड़ितों को न्याय दिलाने का मार्ग प्रशस्त करना है।
अंततः किसी भी समाज की नैतिकता की असली परीक्षा उसके शक्तिशाली संस्थानों की प्रतिष्ठा में नहीं, बल्कि सबसे कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा में होती है। स्पेन के इस प्रकरण में भी न्याय का रास्ता सनसनीखेज संख्या, धार्मिक पक्षधरता अथवा वैचारिक पूर्वाग्रह से नहीं, बल्कि स्वतंत्र जाँच, प्रमाण, पारदर्शिता और मानवीय गरिमा के प्रति प्रतिबद्धता से होकर गुजरता है।
