क्राइम हो सकता है, अपराध नहीं

क्राइम हो सकता है, अपराध नहीं

किसी राज्य का मुख्यमंत्री जब यह कहता है कि वहां क्राइम हो सकता है, लेकिन अपराध नहीं, तो यह केवल शब्दों के चयन या जुबान फिसलने का मामला नहीं रह जाता। यह उस राजनीतिक दृष्टि और प्रशासनिक सोच का प्रश्न बन जाता है, जिसके आधार पर सरकार अपनी उपलब्धियों का मूल्यांकन करती है। बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी का अपराध और क्राइम के बीच अंतर बताने वाला बयान इसी कारण चर्चा में है। राज्य की कानून-व्यवस्था की तारीफ करते हुए मुख्यमंत्री ने जिस तरह अपराध को अंग्रेजी के शब्द क्राइम से अलग करके प्रस्तुत किया, उसने सरकार के दावे और जमीनी हकीकत के बीच की दूरी पर बहस छेड़ दी है।

इस बयान की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि अपराध का कोई हिंदी-अंग्रेजी संस्करण नहीं होता। किसी महिला के साथ यौन हिंसा हो, किसी बच्ची के साथ दुष्कर्म हो, किसी परिवार की हत्या हो, किसी व्यापारी से रंगदारी मांगी जाए या किसी कमजोर व्यक्ति की जमीन पर कब्जा किया जाए, पीड़ित के लिए उसका नाम क्राइम हो या अपराध, पीड़ा और अन्याय एक ही होते हैं। कानून की नजर में भी अपराध की पहचान भाषा से नहीं, बल्कि उसके कृत्य और कानूनी प्रावधानों से होती है।

मुख्यमंत्री का पद केवल सरकार की उपलब्धियां गिनाने का मंच नहीं है। यह जनता के प्रति जवाबदेही का संवैधानिक दायित्व भी है। मुख्यमंत्री के प्रत्येक सार्वजनिक वक्तव्य से प्रशासनिक तंत्र को दिशा मिलती है। इसलिए जब कानून-व्यवस्था जैसे संवेदनशील विषय पर ऐसी टिप्पणी आती है, तो उसका राजनीतिक और प्रशासनिक अर्थ तलाशना स्वाभाविक है। सवाल यह नहीं कि मुख्यमंत्री ने कौन-सा अंग्रेजी शब्द इस्तेमाल किया, सवाल यह है कि क्या राज्य में नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित है?

बिहार में अपराध को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच आरोप-प्रत्यारोप कोई नई बात नहीं है। सत्ता में बैठी हर सरकार कानून-व्यवस्था में सुधार का दावा करती है, जबकि विपक्ष घटनाओं को आधार बनाकर सरकार को घेरता है। लेकिन इस राजनीतिक बहस के बीच सबसे महत्वपूर्ण पक्ष आम नागरिक का है, जो सुरक्षित जीवन, निष्पक्ष पुलिस व्यवस्था और समय पर न्याय चाहता है। किसी सरकार की सफलता का पैमाना उसके भाषण या विज्ञापन नहीं, बल्कि नागरिकों का सुरक्षा-बोध होना चाहिए।

विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों के विरुद्ध होने वाले अपराध इस कसौटी को और गंभीर बना देते हैं। किसी बच्ची के साथ हिंसा की घटना केवल एक परिवार की त्रासदी नहीं होती, बल्कि वह पूरे समाज की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़ा करती है। महिलाओं के विरुद्ध अपराध की शिकायत दर्ज कराने से लेकर जांच, आरोपपत्र, सुनवाई और दोषसिद्धि तक की प्रक्रिया में यदि देरी होती है, तो पीड़िता को न्याय मिलने की उम्मीद कमजोर पड़ती है। कई बार सामाजिक दबाव, आर्थिक निर्भरता और बदनामी का भय भी शिकायत दर्ज कराने में बाधा बनते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में सरकार की प्राथमिकता अपराध की परिभाषा बदलना नहीं, बल्कि अपराध रोकने की व्यवस्था को प्रभावी बनाना होना चाहिए। लड़कियों की सुरक्षा केवल महिला हेल्पलाइन, सीसीटीवी कैमरे और जागरूकता अभियानों से सुनिश्चित नहीं हो सकती। इसके लिए स्कूलों, कॉलेजों, सार्वजनिक परिवहन, कार्यस्थलों और ग्रामीण इलाकों तक सुरक्षा का भरोसेमंद तंत्र विकसित करना होगा। पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराने का वातावरण ऐसा होना चाहिए, जहां पीड़िता को संदेह की नजर से न देखा जाए और न ही उसे समझौते के लिए मजबूर किया जाए।

कानून-व्यवस्था का अर्थ केवल अपराध होने के बाद पुलिस की कार्रवाई नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ अपराध की रोकथाम, त्वरित और निष्पक्ष जांच, गवाहों की सुरक्षा, अभियोजन की मजबूती और न्यायिक प्रक्रिया में पीड़ित के अधिकारों की रक्षा है। यदि अपराधी को राजनीतिक संरक्षण मिलने की धारणा बनती है, पुलिस की निष्क्रियता पर सवाल उठते हैं और प्रभावशाली लोगों के मामलों में कार्रवाई अलग दिखाई देती है, तो कानून का भय कमजोर पड़ता है। कानून का शासन तभी स्थापित होता है, जब उसकी निष्पक्षता पर जनता का विश्वास हो।

मुख्यमंत्री को यह भी समझना होगा कि अपराध के आंकड़े और आम लोगों का अनुभव, दोनों शासन की समीक्षा के लिए जरूरी हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े अपराध की प्रवृत्तियों को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार देते हैं, लेकिन केवल दर्ज मामलों की संख्या से पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। अपराध के पंजीकरण में वृद्धि का अर्थ कई बार शिकायत दर्ज कराने की बेहतर व्यवस्था भी हो सकता है, जबकि कम आंकड़े अपने आप में बेहतर कानून-व्यवस्था का प्रमाण नहीं होते। इसलिए आंकड़ों के साथ अपराध की प्रकृति, जांच की गुणवत्ता, आरोपपत्र दाखिल करने की स्थिति, दोषसिद्धि और लंबित मामलों का भी विश्लेषण जरूरी है।

बिहार जैसे बड़े और सामाजिक-आर्थिक विषमताओं से जूझते राज्य में यह चुनौती और व्यापक है। ग्रामीण क्षेत्रों में पुलिस की उपलब्धता, महिलाओं की सुरक्षा, दलितों और वंचित समुदायों के विरुद्ध हिंसा, जमीन विवाद, शराबबंदी से जुड़े अवैध कारोबार, साइबर अपराध और संगठित अपराध जैसे विषयों पर सरकार को गंभीरता से काम करना होगा। अपराध का स्वरूप बदल रहा है। अपराधी तकनीक और नए तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में पुलिस को भी आधुनिक संसाधनों, प्रशिक्षण और वैज्ञानिक अनुसंधान से लैस करना जरूरी है।

प्रशासनिक सुधार के साथ राजनीतिक इच्छाशक्ति भी उतनी ही आवश्यक है। पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित किए बिना कानून-व्यवस्था में स्थायी सुधार संभव नहीं है। थानों में आम नागरिकों की शिकायतों को गंभीरता से लेना, प्राथमिकी दर्ज करने में टालमटोल रोकना, जांच में निष्पक्षता बनाए रखना और राजनीतिक हस्तक्षेप से पुलिस को मुक्त रखना सरकार की जिम्मेदारी है। किसी प्रभावशाली व्यक्ति के विरुद्ध कार्रवाई हो या किसी कमजोर नागरिक की शिकायत, कानून का पैमाना एक ही होना चाहिए।

मुख्यमंत्री के बयान का एक दूसरा पहलू भी है। सार्वजनिक जीवन में भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती, वह नेतृत्व की संवेदनशीलता और प्राथमिकताओं को भी प्रकट करती है। जब राज्य में अपराध को लेकर नागरिकों की चिंता मौजूद हो, तब मुख्यमंत्री से अपेक्षा की जाती है कि वह पीड़ितों की पीड़ा को समझें, उनकी सुरक्षा का भरोसा दें और प्रशासन को जवाबदेह बनाएं। इसके विपरीत यदि बयान का अर्थ अपराध की गंभीरता को हल्का करके प्रस्तुत करने के रूप में लिया जाता है, तो सरकार को इस पर स्पष्टीकरण देना चाहिए।

राज्य की तारीफ करना मुख्यमंत्री का अधिकार है। सरकार अपनी उपलब्धियों को जनता के सामने रख सकती है। लेकिन उपलब्धियों के दावों की पुष्टि पारदर्शी आंकड़ों और स्वतंत्र मूल्यांकन से होनी चाहिए। यदि सरकार मानती है कि बिहार में कानून-व्यवस्था बेहतर हुई है, तो उसे अपराध के आंकड़े सार्वजनिक करने, जिलावार स्थिति बताने, महिलाओं के विरुद्ध अपराधों पर कार्रवाई का ब्योरा देने और पुलिस की जवाबदेही का हिसाब प्रस्तुत करने में संकोच नहीं करना चाहिए। आलोचना को राजनीतिक विरोध मानकर खारिज करने के बजाय उसे प्रशासनिक सुधार का अवसर समझना चाहिए।

मुख्यमंत्री के बयान के बाद सोशल मीडिया पर जिस तरह प्रतिक्रिया सामने आई है, वह भी इस बात का संकेत है कि जनता राजनीतिक भाषा और वास्तविक अनुभव के बीच संबंध तलाश रही है। किसी वायरल वीडियो के आधार पर पूरे राज्य की अपराध स्थिति का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा, लेकिन मुख्यमंत्री के सार्वजनिक वक्तव्य पर सवाल उठाना नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है। सरकार को भी आलोचना का उत्तर तथ्यों से देना चाहिए, न कि शब्दों की व्याख्या से।

बिहार की जनता को शब्दों का आश्वासन नहीं, सुरक्षा का भरोसा चाहिए। किसी मां को यह चिंता नहीं होनी चाहिए कि उसकी बेटी स्कूल या कॉलेज से सुरक्षित लौटेगी या नहीं। किसी परिवार को यह भय नहीं होना चाहिए कि अपराध की शिकायत करने पर उसे ही परेशान किया जाएगा। किसी गरीब को यह महसूस नहीं होना चाहिए कि न्याय केवल प्रभावशाली लोगों की पहुंच में है। यही सुशासन की असली कसौटी है।

मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के सामने अवसर है कि वे अपने बयान से पैदा हुए भ्रम को दूर करें और कानून-व्यवस्था पर सरकार का स्पष्ट पक्ष रखें। उन्हें बताना चाहिए कि महिलाओं और बच्चियों के विरुद्ध अपराध रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं, पुलिस की जवाबदेही कैसे तय हो रही है और अपराधियों को सजा दिलाने की प्रक्रिया में कितनी प्रगति हुई है।

लोकतंत्र में सरकार की प्रतिष्ठा आलोचना से नहीं गिरती, बल्कि जवाबदेही से मजबूत होती है। मुख्यमंत्री को यह याद रखना चाहिए कि अपराध का नाम बदलने से उसका चरित्र नहीं बदलता। पीड़ित के लिए क्राइम और अपराध में कोई अंतर नहीं है। उसके लिए जरूरी है न्याय, सुरक्षा और सम्मान। बिहार को भाषाई सफाई नहीं, कानून के राज की जरूरत है।

आलेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं। इससे जनलेख प्रबंधन का कोई सरोकार नहीं है।

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